उत्तराखंड उत्तराखंड में मिशन 2027 की आहट के साथ राजनीतिक मौसम का तापमान बढ़ने लगा है। नेताओं के दौरे, बैठकों और जनसंपर्क कार्यक्रमों के बीच युवाओं के लिए भी एक नया रोजगारनुमा अवसर पैदा होता दिखाई दे रहा है—नेताओं की जय-जयकार करने का!
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
चुनावी मौसम में जैसे ही किसी नेता का काफिला गांव या मोहल्ले में पहुंचता है, युवाओं की अचानक मांग बढ़ जाती है। सोशल मीडिया ग्रुप में संदेश आता है—”भाइयों, पांच बजे कार्यक्रम है, संख्या पूरी चाहिए।”
इसके बाद शुरू होता है मिशन ‘भीड़ प्रबंधन’।
सुबह नारेबाजी, दोपहर में समोसा-चाय और शाम होते-होते कुछ खास कार्यक्रमों में ‘विशेष जलपान’ की चर्चा। युवा भी समझदार हो गए हैं। उनका कहना है कि राजनीति में विचारधारा अपनी जगह है और नाश्ता अपनी जगह।
एक युवा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “नेता जी आएंगे तो हम पूरे जोश से जयकारा लगाएंगे। आखिर लोकतंत्र में हमारी आवाज भी तो सुनाई देनी चाहिए। और अगर आवाज बैठ गई तो चाय किसलिए है?”
दूसरे युवा ने कहा, “मिशन 2027 में हमारा लक्ष्य स्पष्ट है—नेता जी का भाषण पूरा सुनना, सही समय पर तालियां बजाना और कार्यक्रम समाप्त होने से पहले समोसे की लाइन में लग जाना।”
राजनीतिक दलों के रणनीतिकार भी युवाओं की इस प्रतिभा से प्रभावित हैं। उनका मानना है कि उत्तराखंड का युवा बहुमुखी प्रतिभा का धनी है—वह बेरोजगारी पर सवाल भी उठा सकता है और मंच के सामने खड़े होकर पांच मिनट तक लगातार नारे भी लगा सकता है।
हालांकि कुछ जागरूक युवाओं ने इस पर सवाल भी उठाया है कि मिशन 2027 में युवा सिर्फ जय-जयकार के लिए हैं या टिकट, रोजगार, पलायन, शिक्षा और भविष्य की नीतियों पर अपनी हिस्सेदारी के लिए भी?
फिलहाल चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों की गाड़ियां दौड़ रही हैं, झंडे लहरा रहे हैं और युवाओं के मोबाइल पर लगातार संदेश आ रहे हैं।
उत्तराखंड का मिशन 2027 शायद यही संदेश दे रहा है—
नेताओं की जय-जयकार में आवाज आपकी हो सकती है,
मगर फैसला करते समय दिमाग भी आपका ही होना चाहिए!
और हां, समोसा-चाय का हिसाब कार्यक्रम आयोजक जाने…
लोकतंत्र में बिल आखिर जनता ही चुकाती है!
