47 किलोमीटर तक पर्दे वाली बस दौड़ती रही, किसी पिकेट ने नहीं रोका!नोएडा से कश्मीरी गेट तक नाबालिग से दरिंदगी के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल—पर्दों के पीछे छिपी वारदात, निगरानी तंत्र कहां था?

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नई दिल्ली। चलती स्लीपर बस में कक्षा 11 की छात्रा के साथ दरिंदगी की घटना ने सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि परी चौक से कश्मीरी गेट तक करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करने वाली बस रास्ते में किसी पुलिस पिकेट, चेकिंग प्वाइंट या प्रभावी निगरानी तंत्र की नजर में क्यों नहीं आई?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


बस की खिड़कियों पर भारी पर्दे लगे थे। बाहर से भीतर की गतिविधियां देख पाना मुश्किल था। इसी बस में छात्रा के साथ अपराध हुआ और आरोपी उसे कश्मीरी गेट पर छोड़कर तिमारपुर पार्किंग तक पहुंच गए। इसके बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
घटना के सामने आने के बाद अब सवाल सिर्फ दो आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम आखिर जमीन पर कितने प्रभावी हैं?
वर्कशॉप से लौट रही थी बस, परी चौक पर मिली छात्रा
जानकारी के अनुसार स्लीपर बस में तकनीकी खराबी आने के बाद चालक कुलदीप और परिचालक संदीप उसे ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित वर्कशॉप ले गए थे। मरम्मत के बाद दोनों बस को लेकर उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर स्थित पार्किंग की ओर लौट रहे थे।
बताया जा रहा है कि परी चौक पर छात्रा अकेली खड़ी थी। बस देखकर उसने रुकने का इशारा किया। आरोप है कि छात्रा को अकेला पाकर दोनों ने उसे सेक्टर-63 ले जाने का झांसा दिया और बस में बैठा लिया। इसके बाद चलती बस में उसके साथ दरिंदगी की गई।
आरोपियों ने छात्रा को कश्मीरी गेट पर छोड़ दिया और बस लेकर तिमारपुर पार्किंग पहुंच गए। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया।
पर्दों ने छिपा दी वारदात, लेकिन पुलिस की नजर भी क्यों नहीं पड़ी?
परी चौक से कश्मीरी गेट तक बस ने करीब 47 किलोमीटर का सफर तय किया। यह रास्ता ग्रेटर नोएडा, नोएडा, चिल्ला बॉर्डर, मयूर विहार, गीता कॉलोनी फ्लाईओवर और पुरानी दिल्ली होते हुए कश्मीरी गेट तक पहुंचता है।
रूट पर प्रमुख चौराहे और दिल्ली-नोएडा सीमा जैसे संवेदनशील स्थान आते हैं। इसके बावजूद बस की जांच या प्रभावी निगरानी का कोई मामला सामने नहीं आया।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या पुलिस पिकेट केवल ट्रैफिक संभालने के लिए हैं या संदिग्ध वाहनों पर नजर रखने की जिम्मेदारी भी उनकी है?
निर्भया के बाद बने सुरक्षा नियमों की हकीकत क्या?
2012 के निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई कड़े प्रावधान किए गए। वाहनों में सुरक्षा उपकरण, निगरानी, चालक-परिचालक का सत्यापन और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े नियम लागू किए गए।
इस घटना ने इन व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पर्दे और विजिबिलिटी: बस के भीतर भारी पर्दे लगे होने से बाहर से अंदर की गतिविधियां दिखाई नहीं दे रही थीं।
पैनिक बटन और ट्रैकिंग: अगर वाहन में निर्धारित आपातकालीन सुरक्षा प्रणाली और प्रभावी निगरानी व्यवस्था सक्रिय थी तो घटना के दौरान कोई अलर्ट क्यों सामने नहीं आया?
सीसीटीवी: स्लीपर बसों में अंदरूनी निगरानी व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
चालक-परिचालक सत्यापन: निजी यात्री बसों के संचालन में चालक और परिचालक के सत्यापन तथा उनकी पहचान सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह भी जांच का विषय है।
खाली बस रात में दौड़ती रही, निगरानी तंत्र कहां था?
पुलिस का तर्क हो सकता है कि पूरे एक्सप्रेसवे और रिंग रोड पर प्रत्येक वाहन को रोककर जांच करना संभव नहीं है। इससे यातायात व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
मगर सवाल यह है कि क्या तकनीक, सीसीटीवी, वाहन ट्रैकिंग और पुलिस इंटेलिजेंस के जरिए संदिग्ध वाहनों की पहचान भी संभव नहीं है?
एक ऐसी स्लीपर बस, जिसकी खिड़कियों पर पर्दे लगे हों और जो रात के समय लंबा सफर तय कर रही हो, क्या वह किसी निगरानी प्रणाली के रडार पर आई?
पुलिस जांच में जुटी, फोरेंसिक साक्ष्य जुटाए
घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने पीड़िता के परिजनों को दिल्ली बुलाया। महिला पुलिसकर्मियों की देखरेख में पीड़िता की काउंसलिंग कराई गई और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई।
पुलिस ने दोनों आरोपियों का पोटेंसी टेस्ट कराया है। फोरेंसिक टीम ने बस से बाल और अन्य जैविक साक्ष्य जुटाए हैं। इन साक्ष्यों का डीएनए मिलान कराया जाएगा, जिससे जांच को वैज्ञानिक आधार मिल सके।
असली सवाल गिरफ्तारी के बाद शुरू होते हैं
दो आरोपियों की गिरफ्तारी पुलिस कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मगर इस घटना ने उससे बड़ा सवाल सामने रखा है—
47 किलोमीटर तक बस चलती रही। पर्दे लगे रहे। एक नाबालिग के साथ अपराध होता रहा। रास्ते में कई प्रमुख स्थान आए। फिर भी निगरानी तंत्र को भनक क्यों नहीं लगी?
अगर नियम मौजूद हैं तो उनका पालन कौन सुनिश्चित कर रहा है?
अगर बसों में सुरक्षा उपकरण अनिवार्य हैं तो वे सक्रिय थे या सिर्फ कागजों में दर्ज हैं?
और अगर पुलिस की निगरानी व्यवस्था मजबूत है तो एक पर्दे वाली स्लीपर बस इतनी लंबी दूरी तक जांच से कैसे निकल गई?
यह मामला सिर्फ एक बस और दो आरोपियों की कहानी बनकर समाप्त नहीं होना चाहिए। यह घटना दिल्ली-एनसीआर के सार्वजनिक परिवहन सुरक्षा तंत्र की पूरी व्यवस्था का ऑडिट मांगती है।


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