उत्तराखंड,/रुद्रपुर।रात का सन्नाटा… सुनसान सड़क… झाड़ियों के बीच पड़ा एक शव… कोई पहचान नहीं… कोई अपना लेने वाला नहीं… पुलिस पहुंचती है, पंचनामा होता है, पोस्टमार्टम होता है और फिर एक सामाजिक संस्था उस अज्ञात इंसान को अंतिम विदाई देती है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
लेकिन कहानी यहीं खत्म हो जाती है या यहीं से असली कहानी शुरू होती है?
रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों में अज्ञात एवं लावारिस शव मिलने की घटनाएं लगातार चिंता पैदा कर रही हैं। कभी किच्छा क्षेत्र में शव मिलता है, कभी लालपुर के पास, कभी काशीपुर रोड पर, कभी हाईवे किनारे, कभी झाड़ियों में और कभी सुनसान स्थानों पर।
हर बार एक ही सवाल सामने आता है—
“आखिर यह लोग यहां तक पहुंचे कैसे?”
और उससे भी बड़ा सवाल—
“इनकी मौत के पीछे की सच्चाई कौन तलाशेगा?”
एक-एक करके सामने आ रही गुमनाम मौतें
हाल ही में रुद्रपुर की कौशल्या कॉलोनी में सरकारी शिक्षिका सुषमा पंत की जलकर मौत हुई। पोस्टमार्टम के बाद जब परिवार की ओर से शव लेने के लिए कोई आगे नहीं आया तो उनकी करीब 80 वर्षीय मां ने भारत सेवा टीम से अंतिम संस्कार करने का आग्रह किया।
भारत सेवा टीम ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया। कौशल्या समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र गंगवार ने संस्कार के लिए लकड़ी की सेवा की।
यह घटना कई सवाल छोड़ गई।
एक मां की बेटी चली गई, मगर अंतिम विदाई देने के लिए परिवार के लोग कहां थे?
इसी बीच किच्छा क्षेत्र में एक अज्ञात व्यक्ति का शव मिला। पहचान के प्रयास किए गए, मगर पहचान सामने नहीं आई। पुलिस प्रशासन और भारत सेवा टीम ने अंतिम संस्कार किया।
काशीपुर रोड क्षेत्र में एक व्यक्ति की दर्दनाक मौत हुई। पहचान नहीं हो सकी। शव को चित्रशिला घाट, रानीबाग ले जाया गया और हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कराया गया।
लालपुर क्षेत्र में भी एक लावारिस शव मिला। भारत सेवा टीम की एंबुलेंस उसे पोस्टमार्टम हाउस लेकर पहुंची। काफी प्रयास के बाद भी पहचान सामने नहीं आई।
सवाल यह है कि क्या ये सभी अलग-अलग घटनाएं हैं या इनके पीछे कोई साझा कहानी भी छिपी हो सकती है?
भारत सेवा टीम का दावा—1000 लोगों को अंतिम विदाई
भारत सेवा टीम से जुड़े ललित बिष्ट ने अपने फेसबुक पेज पर दावा किया है कि टीम अब तक करीब 1000 ऐसे लोगों का अंतिम संस्कार कर चुकी है, जिनका कोई अपना अंतिम संस्कार करने वाला नहीं था।
यदि यह आंकड़ा संस्था के रिकॉर्ड से पुष्ट होता है तो यह केवल सेवा का आंकड़ा नहीं है।
यह कानून व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा संकेत हो सकता है।
क्यों?
क्योंकि हर अज्ञात शव के पीछे एक इंसान है।
हर इंसान के पीछे एक परिवार हो सकता है।
हर परिवार के पीछे गुमशुदगी की कहानी हो सकती है।
और कुछ मामलों में मौत के पीछे अपराध की संभावना भी हो सकती है।
रहस्य गहराता जा रहा है—शव मिलते कहां हैं?
शहर के बाहरी हिस्से।
झाड़ियां।
पुलों के नीचे।
जंगल।
हाईवे किनारे।
सिडकुल के आसपास के सुनसान इलाके।
ऐसे स्थानों पर शव मिलने की घटनाओं को लेकर अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इन स्थानों का चयन संयोग से होता है?
या कोई व्यक्ति जानबूझकर सुनसान जगहों का इस्तेमाल करता है?
क्या शव कहीं और से लाकर यहां फेंके जाते हैं?
क्या कुछ मौतें दुर्घटना हैं और कुछ के पीछे अपराध की कहानी छिपी है?
क्या नशे से जुड़े विवादों का कोई संबंध है?
क्या लूटपाट अथवा आपसी रंजिश का कोई एंगल है?
इन सवालों को आरोप के रूप में नहीं, जांच के विषय के रूप में देखा जाना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल—अज्ञात शवों की जांच कितनी गहराई तक जाती है?
किसी शव के मिलने के बाद पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी पहचान और मौत के कारण का पता लगाना है।
मगर जनता जानना चाहती है—
क्या सभी अज्ञात शवों का डीएनए रिकॉर्ड तैयार होता है?
क्या उनकी फोटो और फिंगरप्रिंट देशभर के गुमशुदा लोगों के रिकॉर्ड से मिलाए जाते हैं?
क्या मोबाइल फोन और डिजिटल साक्ष्यों की जांच होती है?
क्या आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जाती है?
क्या हाईवे और सिडकुल के कैमरों का डेटा देखा जाता है?
क्या दूसरे राज्यों की पुलिस को मृतकों का विवरण भेजा जाता है?
क्या पुराने अज्ञात शवों और वर्तमान गुमशुदगी के मामलों का मिलान किया जाता है?
यदि यह सब हो रहा है तो उसका परिणाम जनता के सामने आना चाहिए।
और यदि कहीं कमी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए।
नशे का साया—क्या यह भी किसी कड़ी से जुड़ा है?
रुद्रपुर और ऊधम सिंह नगर में नशे के खिलाफ पुलिस कार्रवाई होती रही है।
ऐसे में अज्ञात शवों के मामलों में यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि कितने मृतकों की मौत नशीले पदार्थों के सेवन अथवा ओवरडोज से हुई।
क्या मृतकों में नशे के आदी लोग थे?
क्या किसी नशे के नेटवर्क से जुड़े विवाद सामने आए?
क्या नशे के कारोबार में पैसे अथवा आपसी विवाद को लेकर हिंसा हुई?
इन सवालों का जवाब पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच से मिल सकता है।
सिर्फ आशंका से किसी को अपराधी ठहराना उचित नहीं, मगर आशंका की जांच रोक देना भी उचित नहीं।
क्या रुद्रपुर की भीड़ में कुछ लोग गायब हो रहे हैं?
यह सबसे गंभीर सवालों में से एक है।
रुद्रपुर औद्योगिक शहर है। यहां रोज हजारों लोग रोजगार की तलाश में आते हैं।
कई लोग अकेले रहते हैं।
कई मजदूर दूसरे राज्यों से आते हैं।
कई परिवारों से दूर रहते हैं।
ऐसे लोगों के लापता होने पर क्या उनकी शिकायत समय पर दर्ज होती है?
क्या उनका डेटा किसी केंद्रीय सिस्टम में पहुंचता है?
क्या पुलिस गुमशुदगी और अज्ञात शवों का स्वतः मिलान करती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी परिवार का सदस्य किसी दूसरे शहर में लापता है और रुद्रपुर में किसी अज्ञात शव के रूप में उसका अंतिम संस्कार हो चुका हो?
यह संभावना भले ही छोटी हो, मगर इसकी जांच आवश्यक है।
भारत सेवा टीम कंधा दे रही है, अब पुलिस को जवाब तलाशना होगा
भारत सेवा टीम का कार्य इंसानियत की मिसाल है।
जिस मृतक के पास अंतिम समय में कोई अपना नहीं होता, उसके लिए टीम परिवार बनकर खड़ी होती है।
एम्बुलेंस से शव लाना।
पोस्टमार्टम तक साथ रहना।
पहचान के प्रयास करना।
अंतिम संस्कार करना।
अस्थियां प्रवाहित करना।
यह सेवा समाज के लिए प्रेरणा है।
मगर एक सवाल टीम की सेवा से आगे जाकर प्रशासन से पूछा जाना चाहिए—
“आपने शव का अंतिम संस्कार तो करा दिया, मगर उसकी मौत का रहस्य कितना सुलझाया?”
रुद्रपुर को चाहिए ‘अज्ञात शव जांच अभियान’
अब समय आ गया है कि ऊधम सिंह नगर पुलिस पिछले वर्षों में मिले सभी अज्ञात शवों की विशेष समीक्षा करे।
एक-एक शव की फाइल निकाली जाए।
मृतक की उम्र।
मौत का कारण।
शव मिलने का स्थान।
कपड़े।
मोबाइल।
फिंगरप्रिंट।
डीएनए।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट।
विसरा रिपोर्ट।
सीसीटीवी।
गुमशुदगी के रिकॉर्ड।
और दूसरे राज्यों से मिले मामलों का मिलान किया जाए।
हो सकता है इन फाइलों में कोई ऐसी कड़ी छिपी हो जो अब तक दिखाई नहीं दी।
क्या रुद्रपुर में कोई अदृश्य कड़ी काम कर रही है?
यही सबसे बड़ा रहस्य है।
क्या ये मौतें केवल दुर्घटनाओं का परिणाम हैं?
क्या नशा इनमें बड़ी भूमिका निभा रहा है?
क्या कमजोर और अकेले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है?
क्या कुछ शव दूसरे स्थानों से लाकर यहां छोड़े जाते हैं?
क्या परिवारों से कटे लोगों की पहचान व्यवस्था कमजोर है?
या फिर इन सभी घटनाओं के पीछे कोई अलग-अलग कारण हैं?
इन सवालों का जवाब पुलिस जांच ही दे सकती है।
रुद्रपुर की सड़कें जवाब मांग रही हैं
आज भारत सेवा टीम किसी अज्ञात शव को मुखाग्नि देती है।
कल किसी दूसरे अज्ञात शव की सूचना आती है।
फिर पोस्टमार्टम।
फिर पहचान की कोशिश।
फिर अंतिम संस्कार।
और फिर एक नई फाइल।
क्या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?
या कभी ऐसी विशेष जांच होगी जो इन गुमनाम मौतों के पीछे छिपी वास्तविक कहानी सामने लाएगी?
रुद्रपुर की जनता को डर फैलाने वाली अफवाहें नहीं चाहिए।
जनता को सच्चाई चाहिए।
यदि मौतें दुर्घटनाएं हैं तो कारण सामने आएं।
यदि नशा कारण है तो नेटवर्क सामने आए।
यदि अपराध है तो अपराधी सामने आएं।
यदि व्यवस्था में कमी है तो वह कमी सामने आए।
और यदि ये सभी अलग-अलग घटनाएं हैं तो आंकड़ों के साथ यह स्पष्ट किया जाए।
क्योंकि हर लावारिस शव सिर्फ एक मृत शरीर नहीं—कानून व्यवस्था के सामने रखा हुआ एक सवाल है।
और अब रुद्रपुर पूछ रहा है—
“लाशें तो मिल रही हैं साहब… मगर इनके पीछे छिपे राज कब मिलेंगे?”
भारत सेवा टीम को मानवता की इस सेवा के लिए नमन। अब जरूरत है कि प्रशासन इन गुमनाम मौतों की पूरी कहानी जनता के सामने लाए।
“लाशें मिलती रहीं… राज दफन होते रहे! रुद्रपुर में गुमनाम मौतों का रहस्य”
“झाड़ियों से हाईवे तक मौत का रहस्य: रुद्रपुर में कौन छोड़ जाता है लावारिस शव?”
“1000 अंतिम संस्कार… फिर भी सवाल कायम: रुद्रपुर में आखिर हो क्या रहा है?”
“एक शव, सौ सवाल: रुद्रपुर की खामोश सड़कों पर कौन लिख रहा है मौत की कहानी?”
“रुद्रपुर में मौत का अनसुलझा नेटवर्क? पुलिस के सामने खड़े होते जा रहे गंभीर सवाल।
“भारत सेवा टीम दे रही लाशों को कंधा… अब कानून व्यवस्था मौतों का राज खोले!”
