धार्मिक मान्यताओं में यह तिथि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आदर प्रकट करने का एक अत्यंत पवित्र अवसर है.
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
पूर्णिमा श्राद्ध का विशेष महत्व
पितृ पक्ष का मुख्य उद्देश्य पितरों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होता है. यद्यपि मुख्य पितृ पक्ष प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है, परंतु जो परिजन पूर्णिमा तिथि को देवलोकगमन कर चुके होते हैं, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है. माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन तर्पण और दान करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है.
पूजा विधि और तर्पण की प्रक्रिया
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं.
तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल, तिल, कुशा और पुष्प से पितरों का जल तर्पण किया जाता है.
ब्राह्मण भोजन व दान: इस दिन विद्वान ब्राह्मणों को आमंत्रित कर सात्विक भोजन (जैसे खीर, पूड़ी, सब्जी) कराया जाता है और सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, तिल व दक्षिणा दी जाती है.
पंचबलि भोग: भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते, कौए, चींटियों और देवताओं के लिए निकाला जाता है, जिसे पंचबलि कहा जाता है.
पितृ दोष से मुक्ति और दान का फल
जिन जातकों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए पूर्णिमा श्राद्ध के दिन विशेष पूजा-पाठ करना फलदायी माना गया है. इस दिन अन्न, वस्त्र, भू-दान, और तिल का दान अत्यंत शुभ फल देने वाला होता है. मान्यता है कि जब परिजन पूरी निष्ठा से तर्पण करते हैं, तो पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आयुष्मान, आरोग्यता और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. 26 सितंबर 2026 को पड़ने वाला पूर्णिमा श्राद्ध अपने पूर्वजों को नमन करने और सनातन संस्कृति की महान परंपरा से जुड़ने का एक पावन दिन है.
पितृ पक्ष 2026: 26 सितंबर से शुरू होगा महालय श्राद्ध, 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन
पितृ पक्ष 2026: 26 सितंबर से शुरू होगा महालय श्राद्ध, 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन
नई दिल्ली। सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष पर्व पितृ पक्ष 26 सितंबर 2026, शनिवार से शुरू होगा। भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध से प्रारंभ होकर यह अवधि 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या और पितृ विसर्जन के साथ संपन्न होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूर्वजों के निधन की तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। पूर्णिमा श्राद्ध केवल पूर्णिमा तिथि को दिवंगत हुए पितरों के लिए किया जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान तर्पण में जल अर्पित करने, पिंडदान में भोजन अर्पित करने और श्राद्ध में श्रद्धापूर्वक पूर्वजों का स्मरण करने की परंपरा है। 4 अक्टूबर को मातृ नवमी तथा 7 अक्टूबर को द्वादशी-मघा श्राद्ध रहेगा। 10 अक्टूबर को अमावस्या श्राद्ध, अज्ञात तिथि श्राद्ध और पितृ विसर्जन होगा।
धार्मिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म दिन में कुतप काल में करना, जरूरतमंदों को भोजन-वस्त्र दान करना और गाय तथा कौवे को भोजन कराना पुण्यकारी माना जाता है।
