उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यह पहचान हिमालय की चोटियों, पवित्र नदियों और चारधाम की दिव्य परंपरा से बनी है। बद्रीनाथ धाम उस आस्था का सर्वोच्च केंद्र है, जहां करोड़ों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, विश्वास और जीवनभर की कमाई का अंश भगवान श्रीहरि के चरणों में समर्पित करते हैं। श्रद्धालु यह सोचकर दान देते हैं कि उनका अर्पण धर्म, सेवा और जनकल्याण में लगेगा। ऐसे पवित्र धाम से चढ़ावे में कथित अनियमितताओं की चर्चा उठना पूरे समाज के लिए पीड़ादायक है।
यदि किसी कर्मचारी, अधिकारी अथवा व्यवस्था से जुड़ी किसी कड़ी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो सत्य सामने आना ही चाहिए। दोषी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए। साथ ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूरे उत्तराखंड के सामने खड़ा है—क्या देवभूमि का सबसे बड़ा संकट केवल बद्रीनाथ धाम का यह विवाद है, या फिर वर्षों से फैले संगठित भ्रष्टाचार का वह जाल, जिसने सरकारी व्यवस्था की जड़ों तक अपनी पकड़ बना ली है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
राज्य के अनेक हिस्सों में नजूल भूमि पर कब्जों की शिकायतें उठती रहीं। गोचर भूमि पर निर्माण के आरोप सामने आते रहे। तालाबों की भूमि तक प्रभावशाली लोगों के कब्जे की चर्चाएं होती रहीं। अवैध खनन को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे। शिक्षा विभाग में नियुक्तियों और वित्तीय अनियमितताओं पर बहस होती रही। पर्यटन विभाग की परियोजनाओं पर प्रश्न उठे। वन, उद्यान, राजस्व, खाद्यान्न तथा अनेक विभागों की कार्यप्रणाली को लेकर जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने समय-समय पर चिंता व्यक्त की। इन विषयों पर भी उतनी ही तीव्रता से कार्रवाई की अपेक्षा जनता लंबे समय से करती रही है।
बद्रीनाथ धाम के पुजारी और तीर्थ पुरोहित सदियों पुरानी परंपरा के संरक्षक हैं। उनका जीवन पूजा, सेवा और धार्मिक दायित्वों से जुड़ा रहता है। किसी एक कर्मचारी पर लगे आरोपों की छाया पूरे पुरोहित समाज पर डालना न्यायसंगत दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता। आस्था के इन सेवकों की प्रतिष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी मंदिर की व्यवस्था की पारदर्शिता।
मुख्यमंत्री द्वारा उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन स्वागत योग्य कदम है। यदि जांच पूरी निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्ध तरीके से संपन्न होती है तो श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा। इसी के साथ जनता की अपेक्षा यह भी है कि ऐसी ही गंभीरता राज्य के अन्य चर्चित मामलों में भी दिखाई दे। सरकारी भूमि से जुड़े विवाद, अवैध कब्जे, खनन, वित्तीय अनियमितताएं तथा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग से जुड़े प्रत्येक मामले की स्वतंत्र जांच समयबद्ध रूप से होनी चाहिए।
लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा दायित्व समान न्याय है। एक मामले में तीव्र कार्रवाई और दूसरे मामले में वर्षों तक मौन, जनविश्वास को कमजोर करता है। जनता चाहती है कि प्रभावशाली पद, राजनीतिक पहुंच या प्रशासनिक ताकत किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर स्थान प्राप्त कराने का माध्यम कभी न बने।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान राजनीतिक बयान भी चर्चा का विषय बने। भाजपा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित अनेक नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी। दूसरी ओर विपक्ष ने भी सरकार से कठोर कार्रवाई की मांग उठाई। लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक प्रक्रिया है, फिर भी जनता का ध्यान आज एक बड़े प्रश्न पर केंद्रित है—क्या उत्तराखंड में हर भ्रष्टाचार के मामले पर समान गंभीरता दिखाई जाएगी, अथवा कुछ चुनिंदा प्रकरण ही राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनेंगे?
आज देवभूमि के नागरिक यह मांग कर रहे हैं कि राज्य के प्रत्येक बड़े आर्थिक मामले की निष्पक्ष समीक्षा हो। जिन अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे हैं, उनकी वैधानिक जांच हो। जिन जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में असामान्य वृद्धि के आरोप सार्वजनिक चर्चा का विषय बने हैं, उनकी भी कानून के अनुसार पड़ताल हो। जिस किसी ने सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया हो, उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।
भ्रष्टाचार किसी एक विभाग तक सीमित विषय भी नहीं है। यदि कहीं भूमि से जुड़ी अनियमितता हुई है तो जांच हो। यदि खनन में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय हो। यदि शिक्षा, पर्यटन, राजस्व, खाद्यान्न, वन, उद्यान अथवा किसी अन्य विभाग में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं तो दोषियों पर कानून का शिकंजा समान रूप से कसना चाहिए। जनता की अपेक्षा केवल यही है कि न्याय का तराजू हर व्यक्ति के लिए एक समान रहे।
बद्रीनाथ धाम की पवित्रता राजनीति का मंच बनने के स्थान पर आध्यात्मिक मर्यादा का प्रतीक बनी रहे, यही प्रत्येक श्रद्धालु की भावना है। मंदिरों की व्यवस्था आधुनिक तकनीक से सुदृढ़ हो। दान और चढ़ावे की डिजिटल निगरानी हो। नियमित वित्तीय ऑडिट हो। प्रत्येक प्रक्रिया सार्वजनिक विश्वास के अनुरूप पारदर्शी बने। ऐसे सुधार भविष्य के विवादों को भी कम करेंगे।
देवभूमि की असली शक्ति उसकी आध्यात्मिक विरासत है। उस विरासत की रक्षा तभी संभव है जब शासन व्यवस्था भी उतनी ही पवित्र और उत्तरदायी बने। जनता आज किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अभियान से अधिक व्यापक सुधार चाहती है। उत्तराखंड की आत्मा यह संदेश देती है कि ईश्वर के दरबार में सभी समान हैं। उसी भावना का प्रतिबिंब शासन व्यवस्था में भी दिखाई देना चाहिए।
आज समय आ गया है कि उत्तराखंड एक नई शुरुआत करे। हर घोटाले की निष्पक्ष जांच हो। हर प्रभावशाली व्यक्ति कानून के दायरे में आए। हर विभाग में पारदर्शिता बढ़े। सार्वजनिक धन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बने। देवभूमि की प्रतिष्ठा तभी सुरक्षित रहेगी जब आस्था, प्रशासन और न्याय—तीनों एक साथ खड़े दिखाई देंगे।
