छात्रसंघ चुनाव 2026: गढ़वाल में संगठन, कुमाऊं में निर्दलीयों की दस्तक; 2027 की राजनीति के लिए क्या संकेत?

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देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनाव 2026 के परिणामों ने प्रदेश की छात्र राजनीति में अलग-अलग क्षेत्रों की अलग तस्वीर सामने रखी है। गढ़वाल मंडल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) मजबूत स्थिति में दिखाई दी, जबकि कुमाऊं मंडल में निर्दलीय प्रत्याशियों ने अध्यक्ष पदों पर सबसे अधिक जीत दर्ज कर राजनीतिक दलों से अलग छात्र नेतृत्व की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। इन परिणामों को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना उचित नहीं होगा, लेकिन युवा मतदाताओं के बीच चल रही राजनीतिक प्रवृत्तियों को समझने के लिए ये चुनाव महत्वपूर्ण संकेत जरूर देते हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


ताजा उपलब्ध परिणामों के अनुसार गढ़वाल मंडल के 55 डिग्री कॉलेजों में अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के 23 प्रत्याशी जीते, एनएसयूआई के 17 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की, जबकि 15 कॉलेजों में अन्य प्रत्याशी विजयी रहे। कुमाऊं मंडल के 51 कॉलेजों में तस्वीर अलग रही। यहां 25 अध्यक्ष पदों पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए, 16 पर एबीवीपी तथा सात पर एनएसयूआई प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की।
यही अंतर इस बार के छात्रसंघ चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा सकता है—गढ़वाल में संगठन आधारित चुनावी ताकत दिखाई दी, जबकि कुमाऊं में छात्र मतदाताओं ने कई स्थानों पर प्रत्याशी की व्यक्तिगत स्वीकार्यता को प्राथमिकता दी।
एमबीपीजी हल्द्वानी से लेकर डीएसबी नैनीताल तक निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी
कुमाऊं की तस्वीर को हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज ने खास तौर पर बदल दिया। यहां निर्दलीय प्रत्याशी आर्यन बेलवाल ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्हें 1,723 वोट मिले, जबकि एनएसयूआई के मेहुल शाह को 1,257 तथा एबीवीपी के धीरज बिष्ट को 988 वोट मिले।
नैनीताल के डीएसबी परिसर में भी निर्दलीय भानु प्रताप सिंह चौहान ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। उन्हें 1,355 वोट मिले, जबकि शुभम कुमार को 873 तथा हिमांशु आर्य को 283 वोट मिले।
अल्मोड़ा के एसएसजे परिसर में एबीवीपी ने पांच साल बाद अध्यक्ष पद हासिल किया। रोहित कुमल्टा ने एनएसयूआई प्रत्याशी को 294 मतों से हराया।
रुद्रपुर के सरदार भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भी निर्दलीय प्रत्याशी गौरव कुशवाहा ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। उपलब्ध चुनाव अपडेट के अनुसार उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 391 वोटों के अंतर से हराया। कॉलेज में 7,718 पंजीकृत मतदाताओं में से 3,362 विद्यार्थियों ने मतदान किया। मतदान से पहले अध्यक्ष पद समेत विभिन्न पदों के लिए कई प्रत्याशियों ने नामांकन किया था।
इन परिणामों को जोड़कर देखें तो कुमाऊं में छात्र मतदाताओं ने एक ही राजनीतिक संगठन के पक्ष में एकरूपता नहीं दिखाई। कहीं एबीवीपी जीती, कहीं एनएसयूआई को समर्थन मिला, तो कई महत्वपूर्ण कॉलेजों में निर्दलीय प्रत्याशी अध्यक्ष बने।
गढ़वाल में एबीवीपी की स्थिति
गढ़वाल में एबीवीपी की स्थिति कुमाऊं की तुलना में मजबूत दिखाई दी। 55 कॉलेजों में 23 अध्यक्ष पद एबीवीपी के खाते में जाना छात्र राजनीति में उसके संगठनात्मक विस्तार को दर्शाता है। देहरादून, टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार तथा चमोली के परिणामों में एबीवीपी, एनएसयूआई तथा अन्य प्रत्याशियों के बीच अलग-अलग मुकाबले दिखाई दिए।
डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून में एबीवीपी के नवदीप राणा ने अध्यक्ष पद जीता। रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 1,759 वोट मिले, जबकि एनएसयूआई के सौरभ सेमवाल को 1,665 वोट मिले।
मसूरी के एमपीजी कॉलेज में एबीवीपी ने अध्यक्ष सहित तीन प्रमुख पदों पर जीत हासिल की।
इससे स्पष्ट है कि गढ़वाल में छात्र राजनीति में संगठन की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है।
2027 के लिए भाजपा के सामने छात्र राजनीति का संदेश
2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। हाल ही में राम माधव को उत्तराखंड का प्रभारी तथा बांसुरी स्वराज को सह-प्रभारी बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक तैयारियों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
छात्रसंघ चुनाव भाजपा के लिए दो तरह के संकेत देते हैं। पहला, गढ़वाल में एबीवीपी की उपलब्धियां उसके संगठित छात्र नेटवर्क की मौजूदगी बताती हैं। दूसरा, कुमाऊं में निर्दलीयों की 25 अध्यक्ष पदों पर जीत यह संकेत देती है कि केवल संगठन का समर्थन हर जगह जीत की गारंटी नहीं है।
2027 में भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि छात्र राजनीति में दिखाई दे रहे व्यक्तिगत नेतृत्व, स्थानीय मुद्दों तथा युवा अपेक्षाओं को वह व्यापक राजनीतिक संवाद में किस तरह शामिल करती है। छात्रसंघ चुनाव विधानसभा चुनाव नहीं हैं, इसलिए इनके आधार पर भाजपा की सीटों या सरकार बनने की स्थिति का अनुमान लगाना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
कांग्रेस के लिए क्या संदेश?
कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने भी गढ़वाल में 17 अध्यक्ष पद हासिल किए। कुमाऊं में सात अध्यक्ष पद एनएसयूआई के खाते में गए।
यह आंकड़ा कांग्रेस के लिए छात्र राजनीति में मौजूद आधार को दिखाता है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि छात्र मतदाताओं के बीच कांग्रेस का प्रभाव सभी क्षेत्रों में समान नहीं है।
2027 में कांग्रेस के सामने युवा मतदाताओं तक स्थानीय मुद्दों के माध्यम से पहुंच बनाने की चुनौती रहेगी। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं, उच्च शिक्षा, फीस, छात्रावास, पलायन, रोजगार तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े सवाल युवा राजनीति के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं।
जून 2026 की राजनीतिक रिपोर्टों में भी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्गठन तथा चुनावी तैयारियों को लेकर चर्चा सामने आई थी।
इसलिए छात्रसंघ चुनाव का परिणाम कांग्रेस के लिए केवल सीटों का आंकड़ा नहीं है; यह संगठन को विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर विधानसभा क्षेत्रों तक युवा संवाद मजबूत करने का अवसर भी दिखाता है।
उत्तराखंड क्रांति दल के लिए अलग संकेत
उत्तराखंड क्रांति दल की स्थिति राष्ट्रीय स्तर की दो बड़ी पार्टियों से अलग है। छात्रसंघ चुनाव में उसका छात्र संगठन उत्तराखंड स्टूडेंट फेडरेशन चौंकुटिया कॉलेज में अध्यक्ष पद जीतने में सफल रहा।
यह संख्या बड़ी राजनीतिक तस्वीर तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति के लिए इसका अपना महत्व है। राज्य गठन की भावनाएं, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन तथा पहाड़ के संसाधनों से जुड़े प्रश्न उत्तराखंड क्रांति दल के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
2027 में यूकेडी की भूमिका का आकलन करते समय केवल छात्रसंघ के परिणाम देखना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को अपने संगठन का विस्तार, युवा नेतृत्व की मौजूदगी तथा स्थानीय मुद्दों पर प्रभावी राजनीतिक अभियान जैसे पहलुओं पर कितना काम मिलता है, यह अधिक महत्वपूर्ण होगा।
छात्रसंघ चुनाव का सबसे बड़ा संदेश—युवा अपनी पसंद खुद तय कर रहे हैं?
2026 के छात्रसंघ चुनाव की सबसे उल्लेखनीय तस्वीर कुमाऊं से सामने आई है। 51 कॉलेजों में 25 अध्यक्ष पद निर्दलीय प्रत्याशियों का जीतना यह दिखाता है कि छात्र राजनीति में व्यक्तिगत नेतृत्व की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रुद्रपुर में गौरव कुशवाहा, हल्द्वानी में आर्यन बेलवाल तथा नैनीताल में भानु प्रताप सिंह चौहान जैसे परिणाम इस प्रवृत्ति को अलग-अलग कॉलेजों में सामने लाते हैं।
साथ ही गढ़वाल में एबीवीपी की 23 जीत यह बताती है कि संगठन आधारित राजनीति की ताकत भी कायम है। एनएसयूआई की 17 जीत यह बताती है कि कांग्रेस की छात्र इकाई भी कई परिसरों में मुकाबले में मौजूद है।
इसलिए 2026 के छात्रसंघ चुनाव को किसी एक राजनीतिक दल की भविष्य की जीत या हार का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। इसे युवा मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताओं की एक झलक के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
संपादकीय ;उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण होगा। 2026 के छात्रसंघ चुनाव ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि प्रदेश के युवा मतदाताओं के बीच राजनीतिक पसंद एकरूप नहीं है। कहीं संगठन प्रभावी है, कहीं व्यक्तिगत प्रत्याशी, कहीं एनएसयूआई ने स्थान बनाया है, तो कहीं क्षेत्रीय विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों को समर्थन मिला है।
भाजपा के लिए छात्र राजनीति संगठन की मजबूती के साथ स्थानीय स्तर की स्वीकार्यता का प्रश्न सामने रखती है। कांग्रेस के लिए युवा संपर्क, संगठन तथा छात्र राजनीति में प्रभाव बढ़ाने की चुनौती दिखाई देती है। उत्तराखंड क्रांति दल के लिए क्षेत्रीय मुद्दों को नई पीढ़ी से जोड़ना महत्वपूर्ण विषय रहेगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि छात्रसंघ चुनाव में दिखाई देने वाली यह नई राजनीतिक ऊर्जा 2027 के विधानसभा चुनाव तक किस रूप में विकसित होती है। इसका उत्तर चुनावी मैदान में उम्मीदवार, मुद्दे, संगठन, स्थानीय समीकरण तथा मतदाताओं के अंतिम निर्णय से ही मिलेगा।


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