किच्छा नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर शानदार जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने 19,508 वोट हासिल कर भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोरा ‘सोनू’ को 6,077 वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया। संदीप अरोरा को 13,431 वोट मिले। राजेश प्रताप सिंह की इस जीत से कांग्रेस खेमे में उत्साह है, जबकि भाजपा के लिए परिणाम बड़ा झटका माना जा रहा है। चुनाव परिणाम ने किच्छा की सियासी तस्वीर में नया संदेश दिया है।


किच्छा-सिरौलीकलां के नतीजे: भाजपा के लिए खतरे की घंटी, 2017 की पटकथा का अगला अध्याय?
किच्छा-सिरौलीकलां में बदली सियासी पटकथा: भाजपा के लिए खतरे की घंटी, 2027 का संकेत या सिर्फ निकाय चुनाव का संदेश?
किच्छा/सिरौलीकलां। ऊधम सिंह नगर की राजनीति में बुधवार का दिन सिर्फ दो नगर पालिकाओं के चुनाव परिणाम का दिन नहीं रहा, बल्कि 2027 की विधानसभा राजनीति के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत छोड़ गया। किच्छा नगर पालिका अध्यक्ष पद पर कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह ने 19,508 वोट हासिल कर भाजपा के संदीप अरोरा ‘सोनू’ को 13,431 वोटों पर रोकते हुए 6,077 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। दूसरी ओर सिरौलीकलां में भाजपा ने अध्यक्ष पद पर अपना प्रत्याशी ही मैदान में नहीं उतारा और निर्दलीय प्रत्याशी के समर्थन के सहारे चुनावी मैदान को साधने की कोशिश की। चुनाव से पहले ही भाजपा का प्रत्यक्ष मुकाबले से बाहर रहना अपने आप में चर्चा का विषय बना था।
दो पालिकाएं, दो झटके और भाजपा के सामने बड़ा सवाल
किच्छा को ऊधम सिंह नगर की सबसे हॉट राजनीतिक सीटों में गिना जाता है। यहां नगर पालिका चुनाव शुरू होते ही मुकाबला केवल अध्यक्ष पद तक सीमित नहीं रहा। यह चुनाव सीधे तौर पर कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा बन गया था। चुनाव के दौरान दोनों खेमों के बीच तनाव, स्ट्रांग रूम विवाद और फिर मतगणना पर रोक ने मुकाबले को प्रदेशभर में सुर्खियों में ला दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत के आदेश के बाद 7 अक्टूबर को मतगणना शुरू हुई।
मतपेटियां खुलीं तो भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ हार का नहीं, हार के अंतर का खड़ा हुआ। 6,077 वोटों की जीत यह बताती है कि किच्छा में कांग्रेस ने महज सीट नहीं जीती, बल्कि अपने राजनीतिक संदेश को भी मजबूती से स्थापित किया।
भाजपा के लिए मुश्किल यह भी रही कि चुनाव से पहले उसके अपने ही खेमे में टिकट को लेकर असंतोष सामने आया। अध्यक्ष पद के टिकट के बाद कई भाजपा नेताओं ने निर्दलीय नामांकन किया था। यह घटनाक्रम बताता है कि चुनावी मुकाबले से पहले संगठन के भीतर ही पूरी तरह एकजुटता नहीं बन पाई थी।
सिरौलीकलां में प्रत्याशी नहीं, समर्थन की राजनीति
सिरौलीकलां की कहानी भाजपा के लिए और भी अलग रही। यहां पार्टी ने अध्यक्ष पद पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। मुकाबला कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशी के बीच रहा और राजनीतिक चर्चाओं में निर्दलीय प्रत्याशी को भाजपा के समर्थन की बात सामने आती रही।
यानी एक तरफ किच्छा में भाजपा सीधे मुकाबले में उतरी और हार गई, दूसरी तरफ सिरौलीकलां में पार्टी प्रत्यक्ष प्रत्याशी के साथ मैदान में नहीं थी। राजनीतिक भाषा में इसे भाजपा के लिए दो अलग-अलग संदेशों वाला परिणाम कहा जा सकता है—एक जगह सीधी हार, दूसरी जगह अपनी राजनीतिक ताकत को दूसरे प्रत्याशी के सहारे आजमाने की मजबूरी।
यही वह बिंदु है जहां भाजपा के रणनीतिकारों को 2027 की पटकथा को लेकर गंभीरता से आत्ममंथन करना होगा।
2017 की पटकथा याद करिए…
किच्छा की राजनीति में 2017 का चुनाव आज भी महत्वपूर्ण संदर्भ है। उस समय भाजपा के राजेश शुक्ला ने कांग्रेस के हरीश रावत को 2,127 वोटों के अंतर से हराया था। भाजपा को 40,363 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को 38,236 वोट मिले।
लेकिन पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 2022 में कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ ने भाजपा के राजेश शुक्ला को 10,077 वोटों के बड़े अंतर से पराजित कर किच्छा की सत्ता कांग्रेस के पक्ष में कर दी।
अब 2026 के नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह की 6,077 वोटों की जीत ने उसी बदलते राजनीतिक क्रम को और चर्चा में ला दिया है।
2017 में भाजपा की संकरी जीत, 2022 में कांग्रेस की बड़ी वापसी और 2026 में नगर पालिका अध्यक्ष पद पर कांग्रेस की स्पष्ट जीत—इन तीन पड़ावों को साथ रखकर देखें तो किच्छा की राजनीति में सत्ता के समीकरणों का बदलाव साफ दिखाई देता है।
भाजपा के लिए खतरे की घंटी क्यों?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि नगर पालिका चुनाव का परिणाम सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का परिणाम तय कर देगा। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
किच्छा में कांग्रेस ने एक स्पष्ट राजनीतिक मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल की है। भाजपा के सामने अब संगठन को एकजुट रखने, स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल बनाने, टिकट वितरण में असंतोष रोकने और जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की चुनौती है।
दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह परिणाम उत्साह बढ़ाने वाला है। खासकर तब, जब किच्छा को लंबे समय से ऊधम सिंह नगर की हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट माना जाता रहा है।
ऊधम सिंह नगर से कुमाऊं तक जाएगा असर?
किच्छा का चुनाव परिणाम केवल किच्छा की चारदीवारी में बंद रहने वाला परिणाम नहीं है। ऊधम सिंह नगर की राजनीति का असर तराई से लेकर कुमाऊं की व्यापक राजनीतिक रणनीति तक दिखाई देता है।
2027 में विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टियां केवल एक सीट का हिसाब नहीं लगाएंगी। वे यह भी देखेंगी कि किस क्षेत्र में संगठन मजबूत है, किस दल के पक्ष में स्थानीय माहौल बन रहा है और कौन सा नेतृत्व मतदाताओं को अपने साथ जोड़ पा रहा है।
ऐसे में किच्छा-सिरौलीकलां का परिणाम भाजपा के लिए एक चेतावनी संकेत जरूर है।
असली परीक्षा अब 2027 की
राजनीति में चुनाव परिणाम के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है—अगला चुनाव किसके पक्ष में जाएगा?
किच्छा में कांग्रेस की जीत ने भाजपा के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 2017 वाली राजनीतिक मजबूती वापस लाई जा सकती है या 2022 और 2026 के परिणाम किसी बड़े बदलाव की शुरुआत हैं?
भाजपा के लिए यह समय जश्न से ज्यादा समीक्षा का है। संगठन को यह देखना होगा कि आखिर वह किच्छा जैसी महत्वपूर्ण सीट पर नगर पालिका अध्यक्ष पद क्यों नहीं बचा सकी और सिरौलीकलां में उसे अपने प्रत्याशी के बजाय समर्थन की रणनीति क्यों अपनानी पड़ी।
2027 अभी दूर है, लेकिन किच्छा की मतपेटियों ने घंटी बजा दी है। अब यह भाजपा पर निर्भर है कि वह इसे सामान्य चुनावी शोर समझती है या आने वाले विधानसभा चुनाव की चेतावनी।
और यदि ऊधम सिंह नगर में यही राजनीतिक रुझान आगे बढ़ता है, तो 2027 में इसकी गूंज केवल किच्छा तक सीमित रहने के बजाय पूरे तराई और कुमाऊं की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकती है।