संपादकीय | नेहा बोरा के नाम रुद्रपुर से एक आवाज!दिल्ली की सड़कों पर स्वाभिमान की हुंकार, रुद्रपुर में उजड़े दुकानदारों की पुकार आखिर कौन सुनेगा?


एक तरफ लोकतंत्र की लड़ाई लड़ती छात्रा नेहा बोरा, दूसरी तरफ उजड़े आशियानों और छिनी आजीविका के बीच टेंट लगाकर बैठे रुद्रपुर के लोग!
लेखक: अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
लोकतंत्र केवल सत्ता के गलियारों में भाषण देने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली अर्थ उस गरीब की आवाज सुनना है, जिसकी दुकान उजड़ गई हो, जिसके घर पर बुलडोजर चल गया हो, जिसकी रोजी-रोटी छिन गई हो और जिसे अपने परिवार का पेट पालने के लिए सड़क पर बैठकर संघर्ष करना पड़ रहा हो।
आज उत्तराखंड के रुद्रपुर में ऐसे ही सवाल खड़े हो रहे हैं। जिन लोगों की दुकानें टूटीं, जिनके घरों पर बुलडोजर चला, जिनकी आजीविका छिनी और जिन्हें बेबसी में सड़क पर आना पड़ा, वे आज टेंट लगाकर धरने पर बैठे हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उनकी सुनवाई कौन करेगा?
क्या गरीब होना गुनाह है? क्या छोटी दुकान चलाकर अपने बच्चों का पेट पालना अपराध है? क्या किसी परिवार की रोजी-रोटी उजाड़ने से पहले उसके भविष्य के बारे में सोचना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?
रुद्रपुर में दुकानों के आवंटन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रभावित लोगों का आरोप है कि कुछ लोगों को दुकानें आवंटित की गईं, लेकिन देसी बंगाली समाज और पहाड़ी समाज के प्रभावित परिवारों को उनका हक नहीं मिला। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दुकान आवंटन की प्रक्रिया, पात्रता और लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
आखिर प्रभावित परिवारों को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि किस आधार पर दुकानें आवंटित हुईं और किस आधार पर उन्हें वंचित रखा गया?
रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में देसी समाज की बड़ी आबादी है। बंगाली समाज और पहाड़ से आकर बसे परिवार भी इस शहर की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इन लोगों ने अपनी मेहनत से यहां कारोबार खड़े किए, परिवार बसाए और शहर के विकास में योगदान दिया। आज यदि इन्हीं परिवारों को अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए सड़कों पर बैठना पड़ रहा है, तो जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल सीधा है—जब गरीब की दुकान टूटती है, तब उसका दर्द सुनने कौन आता है?
नेहा बोरा ने दिल्ली में उठाई आवाज, रुद्रपुर के लोग कब जगेंगे?
दिल्ली में छात्र राजनीति से जुड़ी नेहा बोरा के विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक हलकों में चर्चा पैदा की है। जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक अधिकारों और सत्ता के रवैये को लेकर उठने वाली आवाज ने यह संदेश दिया है कि सवाल पूछने का साहस किसी बड़े पद या राजनीतिक ताकत का मोहताज नहीं होता।
राहुल गांधी हों, प्रियंका गांधी हों, अखिलेश यादव हों या दूसरे बड़े राजनीतिक चेहरे—जब किसी आंदोलन की गूंज राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचती है, तो राजनीतिक दल भी उसके साथ खड़े होने की कोशिश करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे आम नागरिकों को भी ऐसा ही राजनीतिक समर्थन मिलता है?
नेहा बोरा एक छात्रा हैं। उनकी आवाज को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है। दूसरी तरफ रुद्रपुर में ऐसे परिवार हैं, जो अपनी दुकान और घर बचाने की चिंता के बीच धरने पर बैठे हैं। उनके पास न बड़ी राजनीतिक ताकत है, न सत्ता के गलियारों तक पहुंच और न ही राष्ट्रीय मीडिया का वैसा ध्यान।
क्या किसी आंदोलन की ताकत इस बात से तय होगी कि उसके पीछे कौन-सा बड़ा नेता खड़ा है, या इस बात से कि उसकी मांग कितनी जायज है?
यही वह सवाल है, जिस पर रुद्रपुर के लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
रुद्रपुर! आज वे सड़क पर हैं, कल तुम्हारी बारी भी आ सकती है!
आज जिनकी दुकानें टूटी हैं, हो सकता है कल किसी दूसरे दुकानदार की बारी हो। आज जिनके घरों पर बुलडोजर चला है, कल कोई दूसरा परिवार अपने आशियाने को लेकर चिंतित हो सकता है। आज जो लोग टेंट लगाकर बैठे हैं, कल उनकी जगह कोई और खड़ा हो सकता है।
इसलिए यह केवल कुछ दुकानदारों का मामला नहीं है। यह आजीविका, पुनर्वास, पारदर्शिता, नागरिक अधिकारों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का सवाल है।
यदि अतिक्रमण हटाना जरूरी है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन प्रभावित परिवारों की सुनवाई, पात्र लोगों के पुनर्वास और आजीविका के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब कार्रवाई के साथ न्याय और मानवीय संवेदना भी दिखाई देगी।
रुद्रपुर के लोगों से हमारा सवाल है—क्या हम केवल तमाशबीन बने रहेंगे? क्या हम तब तक इंतजार करेंगे, जब तक संकट हमारे अपने दरवाजे तक नहीं पहुंच जाता?
उठो रुद्रपुर! अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनो। अपनी आवाज बुलंद करो। अपने शहर के उन परिवारों के साथ खड़े हो, जो आज अपनी आजीविका और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं।
यह संघर्ष किसी जाति, धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों के अधिकारों, निष्पक्ष व्यवस्था और जवाबदेही के पक्ष में होना चाहिए।
दिसंबर में हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स करेगा अधिकारों की आवाज बुलंद करने का आह्वान
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर दिसंबर माह में प्रभावित दुकानदारों, परिवारों और आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक जनजागरण अभियान का आह्वान करेगा।
इस अभियान का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों की समस्याओं को सामने लाना, उनकी सुनवाई सुनिश्चित कराने की मांग करना, दुकान आवंटन में पारदर्शिता की मांग उठाना और पुनर्वास एवं आजीविका के सवालों पर जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासन को जवाबदेह बनाना होगा।
हम चाहते हैं कि जिन लोगों की दुकानें टूटी हैं, जिनके घर प्रभावित हुए हैं और जिनकी आजीविका संकट में पड़ी है, उनकी बात सुनी जाए। पात्र प्रभावितों को न्याय मिले और किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव की शिकायत सामने आए, तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।
यह अभियान शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आगे बढ़ाने का आह्वान होगा।
रुद्रपुर के नागरिकों, व्यापारियों, युवाओं और सामाजिक संगठनों को तय करना होगा कि वे अपने शहर के प्रभावित परिवारों की आवाज बनना चाहते हैं या उनकी पीड़ा को अनसुना होते देखते रहेंगे।
नेहा बोरा के नाम यह संपादकीय एक संदेश है—आवाज उठाने का साहस किसी बड़े पद का मोहताज नहीं होता। और रुद्रपुर के नाम यह आह्वान है कि अपने अधिकारों के लिए जागरूक बनिए, संगठित होइए और अन्याय के विरुद्ध संवैधानिक रास्ते पर चलिए।
दिसंबर में हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स इस जनजागरण अभियान को आगे बढ़ाने का आह्वान करेगा।
एक आवाज, एक सवाल, एक संघर्ष—रुद्रपुर में बुलडोजर कार्रवाई से प्रभावित परिवारों को न्याय कब मिलेगा?
अगली खबर, अगला सवाल और अधिकारों की अगली आवाज—हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर से।
अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर