रुद्रपुर, काशीपुर, किच्छा, हल्द्वानी, हरिद्वार और देहरादून में यातायात व्यवस्था पर बढ़ता दबाव, मनमाने किराये, रात्रिकालीन संचालन और वाहनों की फिटनेस पर निगरानी की मांग
रुद्रपुर। दिल्ली में ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण के लिए प्रस्तावित नई योजना ने उत्तराखंड के मैदानी शहरों की यातायात व्यवस्था से जुड़े सवालों को भी चर्चा में ला दिया है। रुद्रपुर, काशीपुर, किच्छा, हल्द्वानी, हरिद्वार और देहरादून जैसे शहरों में ई-रिक्शा की बढ़ती तादाद, संकरी सड़कों पर अव्यवस्थित संचालन, निर्धारित किराया सूची का अभाव, चालकों के सत्यापन और वाहनों की फिटनेस की जांच जैसे मुद्दे गंभीर चिंता का विषय बन रहे हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू हुई ई-रिक्शा सेवा आज आम लोगों के आवागमन का महत्वपूर्ण साधन है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इससे सस्ती यात्रा की सुविधा मिलती है तथा हजारों लोगों की आजीविका भी जुड़ी है। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या रोजगार के नाम पर शहरों की यातायात व्यवस्था, यात्रियों की सुरक्षा और आम नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी की जा सकती है? जरूरत ई-रिक्शा बंद करने की नहीं, बल्कि इनका संचालन व्यवस्थित करने, संख्या का वैज्ञानिक निर्धारण करने और नियमों का सख्ती से पालन कराने की है।
दिल्ली का प्रस्ताव: 2.5 लाख ई-रिक्शा की सीमा और डिजिटल प्रमाणपत्र
दिल्ली सरकार ने 18 अक्टूबर 2026 को ‘दिल्ली ई-रिक्शा पंजीकरण एवं संचालन योजना, 2026’ का मसौदा जारी किया। इसमें राजधानी में ई-रिक्शा की अधिकतम संख्या 2.5 लाख निर्धारित करने, प्रत्येक वाहन के लिए डिजिटल ई-रिक्शा कंप्लायंस सर्टिफिकेट (ECC) अनिवार्य करने और आम जनता से 30 दिनों के भीतर सुझाव मांगने का प्रस्ताव है। मसौदे के अनुसार, ई-रिक्शा में चालक के अतिरिक्त अधिकतम चार यात्रियों के बैठने की व्यवस्था, 25 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति और 40 किलोग्राम तक सामान ले जाने की क्षमता होगी। वाहनों का परिवहन श्रेणी में पंजीकरण और चालक के वैध लाइसेंस सहित आवश्यक दस्तावेजों का विवरण भी जरूरी होगा। ECC की प्रस्तावित वैधता दो वर्ष है। ये प्रावधान अभी मसौदे का हिस्सा हैं और अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
दिल्ली का यह कदम उत्तराखंड के लिए भी एक नीतिगत संकेत है। दोनों राज्यों के शहरों की जनसंख्या, सड़क क्षमता और परिवहन जरूरतें अलग हैं। इसलिए दिल्ली की 2.5 लाख की सीमा को उत्तराखंड पर सीधे लागू करने के बजाय प्रत्येक शहर की जनसंख्या, सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन और यात्रियों की मांग के आधार पर ई-रिक्शा की संख्या तय की जानी चाहिए।
बाजारों से रेलवे स्टेशन तक जाम, आम जनता परेशान
रुद्रपुर, काशीपुर, किच्छा, हल्द्वानी, हरिद्वार और देहरादून में व्यस्त बाजारों, मुख्य चौराहों, बस अड्डों तथा रेलवे स्टेशन के आसपास ई-रिक्शा की अनियंत्रित आवाजाही यातायात प्रबंधन के लिए चुनौती बन सकती है। बीच सड़क पर सवारी बैठाने या उतारने, अचानक मुड़ने, निर्धारित स्थान के बजाय कहीं भी रुकने और सड़क किनारे बेतरतीब खड़े होने से पीछे आने वाले वाहनों को परेशानी होती है। तेज गति से चलने वाले चारपहिया और भारी वाहनों के बीच ई-रिक्शा चालकों की अचानक गतिविधियां दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ा सकती हैं।
त्योहारी सीजन, बाजारों में खरीदारी के समय और ट्रेन आने-जाने के दौरान समस्या अधिक गंभीर हो सकती है। यात्रियों की भीड़ के बीच सवारी को लेकर विवाद और मनमाने किराये की शिकायतें भी सामने आती हैं। देहरादून जैसे व्यस्त शहर में भीड़भाड़ वाले मार्गों पर रूट निर्धारण और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है।
रुद्रपुर में रात 10 बजे के बाद चलने वाले ई-रिक्शा की जांच को लेकर भी सवाल उठते हैं। बिना नंबर प्लेट, संदिग्ध पंजीकरण, खराब हालत या दस्तावेजों की कमी वाले वाहनों के संचालन पर विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए। बिना सत्यापित पुलिस रिकॉर्ड के किसी खास शहर में अपराध या लूट की घटनाओं के लिए सभी ई-रिक्शा चालकों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
लाइसेंस, बीमा, फिटनेस और चालक सत्यापन अनिवार्य हो
मोटर वाहन अधिनियम और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के तहत ई-रिक्शा के पंजीकरण, चालक के लाइसेंस, बीमा तथा लागू फिटनेस संबंधी प्रावधानों का पालन जरूरी है। उत्तराखंड में आरटीओ और एआरटीओ को शहरवार अभियान चलाकर प्रत्येक ई-रिक्शा का पंजीकरण प्रमाणपत्र, वैध बीमा, लागू फिटनेस प्रमाणपत्र और चालक का वैध ड्राइविंग लाइसेंस जांचना चाहिए।
दूसरे राज्य, विशेषकर उत्तर प्रदेश के नंबर वाले वाहनों के दस्तावेजों और उत्तराखंड में उनके संचालन की वैधता की भी जांच होनी चाहिए। केवल दूसरे राज्य का नंबर होना अपराध नहीं है, लेकिन नियमों के विरुद्ध संचालन पर कार्रवाई जरूरी है।
रात में चलने वाले ई-रिक्शा चालकों का पुलिस सत्यापन, वाहन मालिक का विवरण, आपातकालीन संपर्क और शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था प्रभावी बनाई जानी चाहिए। बिना पंजीकरण या नंबर प्लेट के चलने वाले वाहनों पर नियमानुसार कार्रवाई हो। खराब ब्रेक, घिसे टायर, कमजोर चेसिस, खराब लाइट या अन्य सुरक्षा खामियों वाले वाहन फिटनेस जांच में असफल होने पर सड़कों से हटाए जाएं।
पांच वर्ष पुराने सभी ई-रिक्शा को स्वतः कबाड़ घोषित करने के बजाय सरकार को उनकी तकनीकी स्थिति, बैटरी, ब्रेक, चेसिस और सुरक्षा मानकों के आधार पर आयु-सीमा तय करने पर विचार करना चाहिए। यदि पुराने वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की नीति बने तो गरीब चालकों के लिए आर्थिक सहायता, पुराने वाहन के बदले प्रोत्साहन और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
मनमाने किराये पर लगे रोक, हर रूट की रेट लिस्ट जारी हो
ई-रिक्शा सेवा में यात्रियों की एक प्रमुख शिकायत मनमाने किराये की है। देहरादून में कुछ यात्रियों से विशेष परिस्थितियों में 300 से 800 रुपये तक की मांग किए जाने के आरोपों की जांच होनी चाहिए। इन रकमों को प्रमाणित औसत किराया या व्यापक रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।
रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, अस्पताल, बाजार और पर्यटन स्थलों पर किराये को लेकर विवाद रोकने के लिए आरटीओ को रूटवार किराया सूची निर्धारित करनी चाहिए। सूची वाहन के भीतर और बाहर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो तथा प्रमुख स्थानों पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहे। रात्रिकालीन सेवा के लिए अलग किराया तभी लागू हो, जब सक्षम प्राधिकरण इसकी अनुमति दे। यात्रियों से तय दर से अधिक वसूली की शिकायत के लिए हेल्पलाइन और कार्रवाई की व्यवस्था बनाई जाए।
ई-रिक्शा यूनियनों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्हें चालकों को नियमों के प्रति जागरूक करना चाहिए और यात्रियों के साथ विवाद, दुर्व्यवहार तथा अवैध वसूली रोकने में सहयोग देना चाहिए। यूनियन का गठन किसी चालक को नियमों से छूट नहीं देता।
व्यापार मंडल, पुलिस और आरटीओ की संयुक्त जिम्मेदारी
व्यापार मंडल अध्यक्षों, नगर निगम, यातायात पुलिस, स्थानीय प्रशासन और आरटीओ को मिलकर शहरों की यातायात योजना तैयार करनी चाहिए। प्रमुख बाजारों में ई-रिक्शा के लिए निर्धारित स्टैंड, पिकअप प्वाइंट, नो-पार्किंग क्षेत्र और प्रतिबंधित मार्ग चिन्हित किए जाएं। रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगमन और प्रस्थान के समय अतिरिक्त यातायात प्रबंधन किया जाए। भीड़भाड़ वाले मार्गों पर ई-रिक्शा की आवाजाही को समय और मार्ग के अनुसार नियंत्रित करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
सरकार शहरवार सर्वे कराकर यह पता लगाए कि कुल कितने ई-रिक्शा पंजीकृत हैं, कितने नियमित रूप से चलते हैं, किन मार्गों पर उनकी मांग है और सड़कें कितने वाहनों का भार सह सकती हैं। इसके आधार पर अनुमत संचालन संख्या निर्धारित की जाए। दिल्ली के प्रस्तावित ECC मॉडल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी डिजिटल अनुपालन प्रमाणपत्र और वाहन से जुड़े चालक का सत्यापित रिकॉर्ड लागू करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
दुर्घटनाओं और अपराधों के आंकड़े सार्वजनिक हों
उत्तराखंड में ई-रिक्शा से संबंधित दुर्घटनाओं और अपराधों का वास्तविक आकलन करने के लिए पुलिस तथा परिवहन विभाग को अलग से आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इनमें यह जानकारी होनी चाहिए कि ई-रिक्शा से संबंधित कितनी दुर्घटनाएं हुईं, कितने लोगों की जान गई, कितने लोग घायल हुए और कितने मामलों में चालक के पास लाइसेंस, बीमा या वैध पंजीकरण नहीं था। इसी प्रकार ई-रिक्शा के जरिए हुई प्रमाणित लूट, चोरी, यात्रियों से अवैध वसूली और अन्य आपराधिक घटनाओं का विवरण भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
राज्य की कुल सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों को ई-रिक्शा से हुई दुर्घटनाओं के आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। अलग-अलग आंकड़े सार्वजनिक होने से समस्या की वास्तविक गंभीरता सामने आएगी और उसी आधार पर कार्रवाई की प्राथमिकताएं तय की जा सकेंगी।
सरकार अब जिम्मेदारी से पीछे न हटे
उत्तराखंड सरकार को दिल्ली के प्रस्ताव से सीख लेते हुए मैदानी शहरों के लिए स्पष्ट ई-रिक्शा नीति तैयार करनी चाहिए। रोजगार और जनसुविधा जरूरी हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा, यातायात अनुशासन और यात्रियों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अब सवाल यह है कि उत्तराखंड के परिवहन विभाग, यातायात पुलिस, नगर निकाय और व्यापार मंडल कब संयुक्त रूप से कार्रवाई करेंगे? शहरों की क्षमता के अनुरूप ई-रिक्शा की संख्या, चालक सत्यापन, वैध लाइसेंस, बीमा, फिटनेस, रूटवार किराया सूची और रात्रिकालीन निगरानी सुनिश्चित करना समय की जरूरत है। नियमों का पालन करने वाले चालकों को संरक्षण मिले और उल्लंघन करने वालों पर निष्पक्ष कार्रवाई हो। आम जनता की सुरक्षा से समझौता किए बिना ही ई-रिक्शा सेवा को व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
