अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में सुधार की पहल का स्वागत, लेकिन वर्षों से स्वास्थ्य सुरक्षा की राह देख रहे पेंशनर्स की समस्या का समाधान भी जरूरी
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | रुद्रपुर।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने शिक्षा व्यवस्था में समानता सुनिश्चित करने और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसे महत्वपूर्ण विषय हैं। एक ओर सरकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को निर्धारित शैक्षिक मानकों के अनुरूप संचालित करने की दिशा में कदम उठा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य के करीब 35 हजार पेंशनर्स को गोल्डन कार्ड योजना से जोड़ने का सवाल एक बार फिर चर्चा में है। इन दोनों मुद्दों को साथ रखकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सुशासन का वास्तविक उद्देश्य नियमों की समानता के साथ-साथ नागरिकों की समस्याओं का समयबद्ध समाधान भी होना चाहिए।
मुख्यमंत्री धामी सरकार के सामने यह अवसर है कि वह शिक्षा सुधारों को आगे बढ़ाने के साथ बुजुर्ग पेंशनर्स की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का भी प्रभावी समाधान सुनिश्चित करे। सरकार की नीतियों का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलावों से होता है।
मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण, शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव
उत्तराखंड सरकार ने एक जुलाई 2026 से मदरसा बोर्ड की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत मुस्लिम समुदाय के साथ सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों के पात्र शिक्षण संस्थानों को भी निर्धारित नियमों के अनुरूप मान्यता देने की व्यवस्था की गई है। सरकार की मंशा शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता, गुणवत्ता और निर्धारित शैक्षिक मानकों को मजबूत करना है। आकाशवाणी की रिपोर्ट में भी नई व्यवस्था के उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है।
अब स्कूल के रूप में मान्यता प्राप्त मदरसों में शुक्रवार के स्थान पर रविवार को साप्ताहिक अवकाश रखने के निर्देश चर्चा में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, मान्यता प्राप्त और मान्यता के लिए आवेदन कर चुके कुल 206 संस्थानों पर इस बदलाव को लागू करने की बात कही गई है। प्राधिकरण ने शिक्षा विभाग को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, नई व्यवस्था में इन संस्थानों को शिक्षा विभाग के शैक्षिक कैलेंडर के अनुरूप संचालन करना होगा।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, चार जिलों में अब तक 76 संस्थानों को स्कूल के रूप में मान्यता दी गई है। इनमें देहरादून के छह, हरिद्वार के 44, नैनीताल के दो और ऊधमसिंह नगर के 24 संस्थान शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 114 आवेदन प्रक्रियाधीन बताए गए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आवश्यक मान्यता और निर्धारित नियमों का पालन करना संस्थानों के लिए जरूरी होगा।
इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था में समान नियम लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सकता है। बच्चों को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, गणित, भाषा और रोजगारपरक विषयों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। साथ ही, किसी भी समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं का सम्मान करते हुए नियमों के क्रियान्वयन में संवाद और पारदर्शिता बनाए रखना भी जरूरी है। शिक्षा सुधार का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब बच्चों को बेहतर शैक्षिक अवसर और भविष्य में आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों।
धामी सरकार की पहल का स्वागत, लेकिन पेंशनर्स की चिंता भी दूर हो
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के बीच उत्तराखंड के करीब 35 हजार पेंशनर्स को गोल्डन कार्ड योजना से दोबारा जोड़ने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना के तहत पात्र सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित शर्तों के अनुसार कैशलेस उपचार की सुविधा दी जाती है। लेकिन बड़ी संख्या में पेंशनर्स के योजना से बाहर रहने का सवाल लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।
21 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इन पेंशनर्स को गोल्डन कार्ड से दोबारा जुड़ने का अवसर देने की बात सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में आवेदन की अंतिम तारीख और पूरी प्रक्रिया से संबंधित आधिकारिक आदेश स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे सभी पेंशनर्स की समस्या का अंतिम समाधान मान लेना जल्दबाजी होगी। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट में भी दोबारा आवेदन करने के अवसर का उल्लेख किया गया है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेवानिवृत्ति के बाद उम्र बढ़ने के साथ चिकित्सा की जरूरतें बढ़ती हैं। पेंशनर्स ने वर्षों तक सरकारी सेवाओं में योगदान दिया है। ऐसे में यदि कोई पात्र पेंशनर अंशदान, प्रक्रिया या अन्य कारणों से गोल्डन कार्ड योजना से बाहर रह गया है, तो उसके लिए स्पष्ट और सरल प्रक्रिया उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह गोल्डन कार्ड से वंचित पेंशनर्स के लिए स्पष्ट समयसीमा घोषित करे। आवेदन की प्रक्रिया सरल बनाई जाए, आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी सार्वजनिक की जाए और संबंधित विभागों तथा कोषागार कार्यालयों को जिम्मेदारी सौंपी जाए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया जाए कि पात्रता, अंशदान और उपचार संबंधी शर्तें क्या होंगी, ताकि बुजुर्ग पेंशनर्स को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
सुशासन की असली कसौटी: फैसलों का लाभ आम जनता तक पहुंचे
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नियमों के पालन की दिशा में जो कदम उठा रही है, उनका मूल्यांकन सकारात्मक बदलावों के आधार पर होना चाहिए। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए निर्धारित शैक्षिक मानक लागू करना और सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का लक्ष्य महत्वपूर्ण है। इसी तरह, पेंशनर्स को स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है।
इन दोनों विषयों को किसी समुदाय के पक्ष या विपक्ष में खड़ा करने के बजाय शिक्षा, समान अवसर और जनकल्याण के व्यापक नजरिये से देखना चाहिए। नियमों की समानता का अर्थ यह है कि सभी संस्थान निर्धारित शैक्षिक मानकों का पालन करें। सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि पात्र बुजुर्गों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।
उत्तराखंड सरकार यदि नई शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी ढंग से लागू करने के साथ 35 हजार पेंशनर्स के गोल्डन कार्ड से जुड़े मामले का भी ठोस समाधान निकालती है, तो यह सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का मत: शिक्षा में सुधार और पेंशनर्स को स्वास्थ्य सुरक्षा, दोनों ही जनहित के विषय हैं। मदरसों में नई शैक्षिक व्यवस्था लागू करने की पहल का मूल्यांकन उसके परिणामों से होना चाहिए। वहीं, गोल्डन कार्ड से वंचित पेंशनर्स को केवल दोबारा आवेदन का आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट प्रक्रिया और समयबद्ध समाधान मिलना चाहिए। सरकार की वास्तविक उपलब्धि तभी मानी जाएगी, जब नीतिगत फैसलों का लाभ प्रदेश के हर पात्र नागरिक तक पहुंचे।
