रुद्रपुर,उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने के संकल्प और धरातल पर दिखाई देने वाली तस्वीर के बीच आखिर इतनी बड़ी खाई क्यों है? एक तरफ सरकार नशे के खिलाफ अभियान चलाने, युवाओं को नशे से बचाने और देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ शराब की दुकानों, कथित अवैध शराब के कारोबार और मादक पदार्थों की उपलब्धता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड नशामुक्ति की दिशा में आगे बढ़ रहा है या नशे की उपलब्धता गांव-गांव तक पहुंच रही है?
पिंडर घाटी में राशन की दुकानों पर शराब बिक्री के आरोप, पुलिस कार्रवाई की मांग
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
पिंडर घाटी के लंगड़ी और बोरागाढ़ क्षेत्र में राशन की कुछ दुकानों से कथित तौर पर खुलेआम शराब बेचे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। आरोप है कि नशे की बढ़ती उपलब्धता से युवा नशे के दलदल में फंस रहे हैं। स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग को मामले की निष्पक्ष जांच कर अवैध बिक्री पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। सवाल है कि राशन की दुकानों पर शराब बिकने के आरोपों की जांच कब होगी और युवाओं को नशे से कौन बचाएगा?
एक भट्टी से कई दुकानें, फिर गांवों तक शराब का कारोबार!
शराब की एक भट्टी से दो से चार अतिरिक्त दुकानें खुलने की बात हो या पहाड़ के दूरदराज इलाकों में शराब की पहुंच बढ़ने की शिकायतें, सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। यदि गांवों में राशन की दुकानों के आसपास या अन्य स्थानों पर शराब की बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो प्रशासन को उनकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। राशन गरीब परिवारों की जरूरत है, जबकि नशे का प्रसार सामाजिक और पारिवारिक संकट को जन्म दे सकता है। दोनों के बीच की मर्यादा और कानून का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
शराब, चरस, गांजा, हेरोइन और स्मैक—आखिर नियंत्रण किसका?
उत्तराखंड में नशे की समस्या केवल शराब तक सीमित नहीं है। अवैध शराब, चरस, गांजा, हेरोइन और स्मैक जैसे मादक पदार्थों को लेकर भी समय-समय पर चिंता जताई जाती है। सवाल यह है कि यदि इन पदार्थों की तस्करी और बिक्री पर रोक लगाने के लिए अभियान चल रहे हैं, तो युवाओं तक इनकी पहुंच रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
पुलिस की कार्रवाई में गिरफ्तारी और बरामदगी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन क्या कार्रवाई के बाद पूरे नेटवर्क की जांच होती है? क्या नशे के कारोबार से जुड़े बड़े आपूर्तिकर्ताओं और वित्तीय लेनदेन तक जांच पहुंचती है? क्या सीमावर्ती क्षेत्रों, परिवहन मार्गों और संवेदनशील इलाकों में नियमित निगरानी हो रही है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
नौकरशाही और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही कहां है?
सरकार की नीतियां केवल कागजों और मंचों पर दिए गए भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आबकारी विभाग, पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के बीच समन्वय का परिणाम जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में अवैध शराब या मादक पदार्थों की बिक्री की शिकायत बार-बार सामने आती है, तो यह जांचना जरूरी है कि कार्रवाई क्यों प्रभावी नहीं हो पा रही। क्या विभागों के पास पर्याप्त निगरानी व्यवस्था है? क्या शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होती है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाती है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा पुलिस या प्रशासनिक तंत्र निष्क्रिय है, क्योंकि नशे के विरुद्ध कार्रवाई भी होती रहती है। लेकिन कार्रवाई की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि नशे की आपूर्ति और युवाओं की पहुंच में वास्तव में कितनी कमी आई।
आबकारी राजस्व बड़ा या युवाओं का भविष्य?
राज्य सरकार के सामने राजस्व जुटाने की जरूरत हो सकती है, लेकिन क्या राजस्व की नीति और नशामुक्ति के संकल्प के बीच संतुलन स्पष्ट है? यदि शराब की दुकानों की संख्या या उपलब्धता बढ़ती है, तो उसके सामाजिक प्रभावों का आकलन कौन करेगा?
देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल पर्यटन, तीर्थाटन और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं है, बल्कि यहां की संस्कृति, परिवारों और युवाओं के भविष्य से भी है। पहाड़ के गांवों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है। ऐसे में नशे की बढ़ती पहुंच की शिकायतें सरकार के लिए गंभीर चेतावनी होनी चाहिए।
सरकार से सीधे सवाल—क्या जवाब मिलेगा?
उत्तराखंड सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि नशामुक्ति अभियान के मापने योग्य परिणाम क्या हैं। कितने नशा तस्करों के नेटवर्क पर कार्रवाई हुई? कितने युवाओं को उपचार और पुनर्वास से जोड़ा गया? अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए क्या व्यवस्था है? शराब की दुकानों के विस्तार और उनके सामाजिक प्रभावों का आकलन किस आधार पर किया जाता है?
नशामुक्त उत्तराखंड का सपना केवल नारे लगाने से पूरा नहीं होगा। इसके लिए शराब की उपलब्धता और अवैध बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण, मादक पदार्थों की तस्करी पर कठोर कार्रवाई, नशे के आदी लोगों के उपचार, युवाओं के लिए रोजगार और जनजागरूकता की जरूरत है।
सरकार, नौकरशाही और पुलिस प्रशासन को यह तय करना होगा कि प्राथमिकता केवल राजस्व और कार्रवाई के आंकड़े हैं या उत्तराखंड की अगली पीढ़ी का सुरक्षित भविष्य भी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सरकार नशामुक्त उत्तराखंड का संकल्प लेती है, तो क्या उसकी नीतियां, आबकारी व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई भी उसी लक्ष्य की दिशा में चल रही हैं? या फिर नशामुक्ति का सपना और नशे की उपलब्धता, दोनों एक साथ चलते रहेंगे?
अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
