रुद्रपुर में 35.14 लाख की जमीन का कथित घोटाला: प्रिया शर्मा और सुधीर चावला पर फिर FIR, पुराने मामलों से भी जुड़ा रहा नामरजिस्ट्री के बाद भी खरीदार को कब्जा नहीं मिलने का आरोप;


रुद्रपुर में 35.14 लाख की जमीन का कथित घोटाला: प्रिया शर्मा और सुधीर चावला पर फिर FIR, पुराने मामलों से भी जुड़ा रहा नाम
रजिस्ट्री के बाद भी खरीदार को कब्जा नहीं मिलने का आरोप; एनएच-74 मुआवजा प्रकरण, कथित दस्तावेजी हेराफेरी और पुराने जमीन सौदों पर उठे सवाल—आखिर कब सामने आएगा पूरा सच?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
रुद्रपुर। जमीन की खरीद-फरोख्त में लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि खरीदार को अपनी ही जमीन का कब्जा न मिले, तो न्याय पाने के लिए उसे कितने साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी? रुद्रपुर में बिल्डर प्रिया शर्मा और सुधीर चावला से जुड़े ताजा जमीन विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है। शिकायतकर्ता गुरमीत सिंह का आरोप है कि उन्होंने 35.14 लाख रुपये देकर भूखंड खरीदा, रजिस्ट्री कराई और सरकारी शुल्क भी जमा किए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जमीन का कब्जा नहीं मिला।
28 अक्टूबर 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, इस मामले में रुद्रपुर कोतवाली में एफआईआर संख्या 0574/2026 दर्ज किए जाने की बात कही गई है। प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(2) और 318(4) का उल्लेख है। जांच उपनिरीक्षक महेश कांडपाल को सौंपी गई बताई गई है। अब सवाल यह है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच में क्या सामने आता है और खरीदार को जमीन का कब्जा दिलाने की दिशा में क्या कार्रवाई होती है?
35.14 लाख रुपये दिए, रजिस्ट्री कराई, फिर भी जमीन पर कब्जा क्यों नहीं?
शिकायत के अनुसार, हल्द्वानी के गोविंदपुरा निवासी गुरमीत सिंह ने 7 अक्टूबर 2017 को ग्राम कोलड़ा, तहसील रुद्रपुर स्थित खसरा संख्या 226/मि०/3 के अंतर्गत 9,122.5 वर्ग फीट भूखंड सुधीर चावला से 35,14,000 रुपये में खरीदा था।
शिकायतकर्ता का कहना है कि भुगतान आरटीजीएस और चेक के माध्यम से किया गया। रजिस्ट्री के समय 1,76,000 रुपये स्टाम्प शुल्क और 25,200 रुपये पंजीकरण शुल्क भी जमा किए गए। आरोप है कि भुगतान और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद उन्हें जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिला।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खरीदार के अनुसार रकम का भुगतान और रजिस्ट्री दोनों हो चुके थे, तो कब्जा देने में विवाद क्यों पैदा हुआ? क्या भूखंड के स्वामित्व, वास्तविक कब्जे या किसी अन्य कानूनी अड़चन को लेकर समस्या थी? इन सवालों का उत्तर जमीन के दस्तावेजों, राजस्व अभिलेखों और पुलिस जांच से ही सामने आ सकता है।
रेरा के आदेश के बाद भी विवाद जारी रहने का आरोप
शिकायतकर्ता के अनुसार, कब्जा नहीं मिलने पर उन्होंने रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा), देहरादून में शिकायत की थी। उपलब्ध विवरण में दावा किया गया है कि रेरा ने 6 जुलाई 2023 को कब्जा सौंपने का आदेश दिया था। इसके बाद अपीलीय अधिकरण में अपील खारिज होने और 26 फरवरी 2026 को निष्पादन आदेश जारी होने का भी उल्लेख है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन कार्यवाहियों के बावजूद उन्हें कब्जा नहीं मिल सका। यह भी आरोप लगाया गया है कि भूखंड पर किसी अन्य व्यक्ति को बैठाकर निर्माण कराया गया।
यदि ऐसा हुआ है, तो जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण किस आधार पर हुआ, संबंधित व्यक्ति के पास कौन-से दस्तावेज थे और जमीन के वास्तविक कब्जे की स्थिति क्या है। संबंधित आदेशों की प्रमाणित प्रतियों और उनके कानूनी प्रभाव की पुष्टि भी आवश्यक है।
एनएच-74 भूमि मुआवजा प्रकरण में भी सामने आया था नाम
प्रिया शर्मा और सुधीर चावला का नाम वर्ष 2018 में ऊधम सिंह नगर के चर्चित एनएच-74 भूमि मुआवजा प्रकरण से जुड़े मामलों में सामने आया था। उस समय की पुलिस कार्रवाई और न्यायालयीन कार्यवाही से संबंधित प्रकाशित रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों के खिलाफ कथित दस्तावेजी हेराफेरी और मुआवजा प्रकरण से जुड़े आरोपों पर कार्रवाई हुई थी। मार्च 2018 में उनकी गिरफ्तारी की खबरें भी प्रकाशित हुई थीं। बाद में प्रिया शर्मा को नवंबर 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से जमानत मिलने की खबर सामने आई थी।
एनएच-74 मामले में उस समय की जांच के दौरान जमीन के उपयोग में कथित बदलाव, दस्तावेजों और मुआवजे की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए थे। हालांकि, उस प्रकरण की वर्तमान कानूनी स्थिति और प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध आरोपों का अंतिम नतीजा संबंधित न्यायालयी रिकॉर्ड से ही निर्धारित किया जाना चाहिए।
किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना, गिरफ्तारी होना या जमानत मिलना अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। फिर भी, पुराने मामलों का सत्यापित रिकॉर्ड और वर्तमान शिकायत के दस्तावेज जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पुराने जमीन सौदों में भी उठे थे दस्तावेजों को लेकर सवाल
वर्ष 2018 में रामपुर रोड क्षेत्र की जमीन के एक सौदे को लेकर भी जांच और प्राथमिकी की खबरें सामने आई थीं। उस समय प्रकाशित विवरण में जमीन के स्वामित्व, बिक्री समझौते और भुगतान से जुड़े सवाल उठाए गए थे। प्रिया शर्मा और सुधीर चावला के नाम से जुड़े इस प्रकरण में कथित दस्तावेजी अनियमितताओं की जांच का उल्लेख किया गया था।
इन पुराने घटनाक्रमों का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है कि वर्तमान मामले में भी जमीन की खरीद, भुगतान, रजिस्ट्री और कब्जे को लेकर शिकायत की गई है। हालांकि, दोनों मामलों को एक ही तरह का अपराध मानना उचित नहीं होगा। पुलिस को प्रत्येक शिकायत के दस्तावेजों, संबंधित पक्षों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग जांच करनी होगी।
सवाल यह है कि क्या पुराने जमीन विवादों से जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा करते हुए वर्तमान मामले की भी गहराई से जांच की जाएगी? क्या संबंधित भूखंड के स्वामित्व और कब्जे की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जाएगी?
आलीशान कार्यालय और महंगी गाड़ियों से नहीं, वित्तीय रिकॉर्ड से सामने आएगा सच
रुद्रपुर के गाबा चौक स्थित कार्यालय, महंगी गाड़ियों और कथित बड़ी संपत्ति को लेकर भी चर्चा की जा रही है। लेकिन किसी व्यक्ति की संपत्ति को अवैध बताने के लिए केवल उसके रहन-सहन या कार्यालय की भव्यता पर्याप्त आधार नहीं है।
यदि वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में ठोस साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो संबंधित सक्षम एजेंसियां आय के स्रोत, संपत्ति के स्वामित्व, बैंक लेन-देन और कारोबारी गतिविधियों की जांच कर सकती हैं। ऐसी किसी कार्रवाई की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से ही होनी चाहिए।
पुलिस और संबंधित विभागों के सामने अहम सवाल
इस पूरे मामले में निम्न बिंदुओं की जांच महत्वपूर्ण है:
क्या 35.14 लाख रुपये के भुगतान और जमीन की रजिस्ट्री से संबंधित सभी दस्तावेज सही हैं?
शिकायतकर्ता को कब्जा नहीं मिलने की वास्तविक वजह क्या है?
रेरा के आदेशों के बाद भूखंड की स्थिति क्या रही?
जमीन पर कथित निर्माण किस आधार पर कराया गया?
क्या संबंधित पक्षों के पुराने जमीन विवादों के रिकॉर्ड की वर्तमान मामले के संदर्भ में समीक्षा आवश्यक है?
शिकायतकर्ता और नामजद पक्षों के दस्तावेजी दावों का निष्पक्ष परीक्षण कब पूरा होगा?
इन सवालों के जवाब पुलिस जांच, राजस्व अभिलेखों और प्रमाणित न्यायिक आदेशों से ही मिल सकते हैं।
खरीदार को न्याय कब मिलेगा?
गुरमीत सिंह के अनुसार, उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी शिकायत दी थी और अब उन्हें कार्रवाई की उम्मीद है। इस मामले में पुलिस की जिम्मेदारी होगी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करे, संबंधित पक्षों का बयान ले और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का सीधा सवाल: जमीन खरीदने वाला व्यक्ति यदि भुगतान और रजिस्ट्री के बाद भी कब्जे के लिए वर्षों तक संघर्ष करता रहे, तो उसकी समस्या का समयबद्ध समाधान कौन सुनिश्चित करेगा? क्या इस मामले में सभी दस्तावेजों और कथित निर्माण की जांच कर खरीदार को कानूनी राहत दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे?
फिलहाल, वर्तमान प्राथमिकी में लगाए गए आरोप जांच के अधीन हैं। प्रिया शर्मा और सुधीर चावला का पक्ष तथा संबंधित आदेशों की प्रमाणित प्रतियां सामने आने के बाद मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
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