उत्तराखंड/पिथौरागढ़ में फर्जी डीएलएड प्रमाणपत्रों के सहारे 43 युवाओं द्वारा सहायक अध्यापक की नौकरी हासिल करने का मामला उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। अब समय आ गया है कि राज्य गठन के बाद हुई तमाम सरकारी नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच हो।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों के नाम पर फर्जी प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों के सहारे नियुक्तियां हासिल करने का सिलसिला प्रदेश की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ऊधमसिंह नगर और नैनीताल के बाद अब सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में डीएलएड के फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर 43 युवाओं द्वारा सहायक अध्यापक की नौकरी हासिल करने का मामला सामने आना बेहद चिंताजनक है। दूसरे राज्यों के प्रमाणपत्रों और कथित फर्जी स्थायी निवास दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी हासिल करने का यह मामला केवल 43 अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसकी जड़ तक पहुंचना जरूरी है।
इस पूरे प्रकरण को उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के आईने में भी देखना होगा। राज्य गठन के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों दलों की सरकारें सत्ता में रही हैं। अलग-अलग कार्यकालों में हुई सरकारी भर्तियों की पारदर्शिता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में किसी एक सरकार या राजनीतिक दल को दोषी ठहराने के बजाय राज्य गठन के बाद हुई सभी संदिग्ध नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
इस संदर्भ में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार द्वारा भर्ती घोटालों और नकल माफिया के खिलाफ उठाए गए कदमों की सराहना करना जरूरी है। मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई, जांच और दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसने की दिशा में जो इच्छाशक्ति दिखाई है, उसने भ्रष्ट भर्ती तंत्र के सामने चुनौती खड़ी की है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों को बेचने और फर्जी दस्तावेजों के सहारे पद हासिल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई प्रदेश के युवाओं के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, यह भी सच है कि भ्रष्टाचार की जड़ें अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सवाल केवल फर्जी प्रमाणपत्र लगाने वाले अभ्यर्थियों का नहीं है। सवाल उन अधिकारियों, कर्मचारियों और जिम्मेदार तंत्र का भी है, जिनकी निगरानी में दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और नियुक्तियां दी गईं। आखिर बिना विभागीय सत्यापन और संभावित मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा कैसे संभव हुआ? क्या संबंधित अधिकारियों ने अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन किया? यदि नहीं, तो उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
अब उत्तराखंड में एक व्यापक एसआईटी जांच की आवश्यकता है। राज्य गठन के बाद विभिन्न विभागों में हुई नियुक्तियों, शैक्षिक प्रमाणपत्रों, स्थायी निवास प्रमाणपत्रों, जाति प्रमाणपत्रों, अनुभव प्रमाणपत्रों और अन्य दस्तावेजों की नियमानुसार जांच कराई जानी चाहिए। जहां भी फर्जीवाड़े के प्रमाण मिलें, वहां नियुक्ति निरस्त करने के साथ दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई हो। जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मिले, उनकी संपत्ति की वैधानिक तरीके से जांच हो और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत प्रमाणित होती है तो उसे भी किसी कीमत पर संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
उत्तराखंड की मूल अवधारणा रोजगार, सम्मान, पारदर्शिता और स्थानीय युवाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बनी थी। राज्य के नौजवान वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, अपने परिवार की आर्थिक स्थिति से संघर्ष करते हैं, लेकिन जब फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे कोई दूसरा व्यक्ति उनकी मेहनत और अवसरों पर कब्जा कर लेता है तो यह केवल एक नौकरी की चोरी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य के साथ अन्याय है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने अब इस व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। वर्ष 2027 के बाद प्रदेश की सत्ता जिस किसी के हाथों में जाए, उसे भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध इसी तरह की दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। उत्तराखंड को किसी एक व्यक्ति या सरकार पर निर्भर रहने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत संस्थागत प्रणाली चाहिए जहां फर्जीवाड़े की गुंजाइश ही समाप्त हो जाए।
धामी सरकार के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब फर्जी नियुक्तियों के पीछे छिपे पूरे नेटवर्क और उसे संरक्षण देने वाले जिम्मेदार चेहरों तक कानून का हाथ पहुंचेगा। जरूरत पड़ने पर भ्रष्टाचार से अर्जित अवैध संपत्ति पर कानूनी कार्रवाई हो और दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड सुनिश्चित किया जाए।
उत्तराखंड के युवाओं को अब आश्वासन नहीं, न्याय चाहिए। राज्य की नौकरियां किसी की निजी जागीर नहीं हैं। ये प्रदेश के योग्य और मेहनती युवाओं का अधिकार हैं। राज्य निर्माण की मूल भावना तभी साकार होगी, जब सरकारी नौकरी में योग्यता का सम्मान और भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार होगा।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट, उत्तराखंड देश-दुनिया की खबरों पर नजर।
