रविवार शाम 6 बजे चावला थिएटर में परिवार और बच्चों के साथ फिल्म देखने पहुंचे पर्वतीय समाज के लोग; पर्दे पर पहाड़ की संस्कृति, बुजुर्ग माता-पिता का दर्द, पलायन और रिश्तों की संवेदनाओं ने दर्शकों को भावुक किया।
विशेष संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
रुद्रपुर। कुछ फिल्में केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनतीं, वे इंसान को अपनी जड़ों, अपने समाज, अपने परिवार और अपने अतीत से जोड़ने का काम करती हैं। उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘पायर’ ऐसी ही एक संवेदनशील फिल्म है, जिसे देखने के बाद दर्शक केवल सिनेमाघर से बाहर नहीं निकलते, बल्कि अपने भीतर कई सवाल और भावनाएं लेकर घर लौटते हैं।
रविवार शाम रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म ‘पायर’ का शो ठीक 6 बजे शुरू हुआ। इस दौरान रुद्रपुर के पर्वतीय समाज के लोगों ने एक साथ पहुंचकर फिल्म देखी। सबसे खूबसूरत दृश्य यह था कि लोग अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार और बच्चों के साथ थिएटर में मौजूद थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा पहाड़ी परिवार एक साथ बैठकर अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपने जीवन की कहानी देख रहा हो।
मैं स्वयं चावला थिएटर में मौजूद रहकर यह फिल्म देख रहा था। पर्दे पर जैसे-जैसे पहाड़ के दृश्य, वहां की जीवनशैली, स्थानीय भाषा और बुजुर्गों की संवेदनाएं सामने आ रही थीं, वैसे-वैसे यह अनुभूति और गहरी होती जा रही थी कि यह किसी दूसरे की कहानी नहीं, बल्कि हमारे अपने समाज की कहानी है। हमने इस अवसर पर थिएटर में मौजूद अधिक से अधिक लोगों और इस सामूहिक सहभागिता के यादगार पलों को अपने कैमरे में कैद करने का प्रयास भी किया।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार विनोद कापड़ी की लेखन और निर्देशन में बनी ‘पायर’ उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन और पलायन की गंभीर समस्या को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने रखती है। फिल्म का केंद्र लगभग 80 वर्षीय पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी हैं। पदम सिंह की भूमिका पदम सिंह कापड़ी और तुलसी की भूमिका हीरा देवी ने निभाई है। दोनों कलाकारों का सहज और स्वाभाविक अभिनय फिल्म को वास्तविक जीवन के बेहद करीब ले जाता है।
एक बेटे का 28 वर्षों से इंतजार
फिल्म की कहानी में पदम सिंह और तुलसी का बेटा हरिया लगभग 28 वर्ष पहले रोजगार की तलाश में शहर चला गया था। समय गुजरता गया, लेकिन वह वापस नहीं लौटा। मां-बाप की आंखें हर दिन अपने बेटे की राह देखती रहीं। उम्र ढलती गई, शरीर कमजोर होता गया, गांव की आबादी कम होती गई, लेकिन बेटे के लौटने की उम्मीद खत्म नहीं हुई।
यह कहानी एक बड़ा सामाजिक सवाल खड़ा करती है। क्या बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित करने वाले माता-पिता का बुढ़ापा केवल इंतजार में गुजर जाना चाहिए? क्या रोजगार और तरक्की की दौड़ में हम उन लोगों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, जिन्होंने हमें चलना सिखाया और जीवन जीने का रास्ता दिखाया?
तुलसी की तबीयत खराब रहती है। उसे अस्पताल ले जाने के लिए पदम सिंह को दूसरों की मदद की जरूरत पड़ती है। पहाड़ के कठिन रास्ते, दूर अस्पताल और उम्र का तकाजा उनकी परेशानियों को और बढ़ा देते हैं। गांव में लक्ष्मण और जीवन नाम के दो युवा ही उनकी सहायता करते हैं। मगर इन दोनों के जीवन में भी बदलाव आने वाला है। एक की नौकरी लग जाती है और दूसरा भी परिवार के साथ गांव छोड़ने की तैयारी में है।
अब पदम सिंह के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। जिन दो लोगों के सहारे वह अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल ले जाता है, वे भी गांव से चले जाएंगे तो फिर उनका क्या होगा?
फिल्म में एक बेहद भावुक प्रसंग तब सामने आता है, जब पदम सिंह गांव में बचे लोगों को रोकने के लिए अपनी बकरियां तक देने को तैयार हो जाते हैं। यह दृश्य केवल एक बुजुर्ग की बेबसी नहीं दिखाता, बल्कि उस पहाड़ की पीड़ा को सामने रखता है, जहां कभी घरों में चहल-पहल रहती थी, आंगनों में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं और गांव के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे।
आज उन्हीं गांवों में मकान तो हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं हैं। खेत हैं, लेकिन खेती करने वाले हाथ कम होते जा रहे हैं। रास्ते हैं, लेकिन उन पर चलने वाले कदम गायब होते जा रहे हैं।
जब जीवन से बड़ा सवाल बन जाता है अकेलापन
फिल्म की शुरुआत ही दर्शकों को झकझोर देती है। पदम सिंह और तुलसी अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर हैं। अकेलापन, बीमारी और भविष्य की चिंता उनके जीवन को कठिन बना देती है। वे जीवन समाप्त करने तक का विचार करते हैं। यह प्रसंग दर्शाता है कि जब इंसान को अपने ही जीवन में सहारा दिखाई देना बंद हो जाए तो उसकी मानसिक स्थिति कितनी पीड़ादायक हो सकती है।
फिल्म का शीर्षक ‘पायर’ भी अपने भीतर एक गंभीर अर्थ समेटे हुए है। पायर का अर्थ चिता है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े इन बुजुर्गों की चिंता केवल बीमारी या आर्थिक परेशानी नहीं, बल्कि यह भी है कि उनके जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा? उनके शव को कंधा देने वाला कौन होगा? उनकी चिता को मुखाग्नि कौन देगा?
यह सवाल किसी एक गांव का नहीं है। उत्तराखंड के अनेक गांवों में पलायन के कारण ऐसी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, जहां युवा पीढ़ी रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में मैदानों तथा महानगरों की ओर चली गई है।
अभिनय नहीं, जैसे वास्तविक जीवन पर्दे पर उतर आया
फिल्म में पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी का अभिनय विशेष उल्लेख के योग्य है। उनके चेहरों पर उम्र की लकीरें, बातचीत की सहजता, पहाड़ी जीवन की सादगी और एक-दूसरे के प्रति लगाव कहानी को वास्तविकता के करीब ले जाते हैं।
फिल्म में भारी-भरकम संवादों और बनावटी नाटकीयता के बजाय रोजमर्रा के जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को महत्व दिया गया है। कई बार एक बुजुर्ग का चुप रहना, अपनी पत्नी की चिंता करना या किसी परिचित के गांव छोड़ने की बात सुनकर मायूस हो जाना सैकड़ों शब्दों से अधिक प्रभाव छोड़ता है।
निर्देशक विनोद कापड़ी ने पहाड़ की इस पीड़ा को किसी राजनीतिक भाषण का रूप नहीं दिया, बल्कि पात्रों के जीवन और उनकी परिस्थितियों के माध्यम से दर्शकों के सामने रखा है। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता है।
चावला थिएटर में एक परिवार जैसा माहौल
रुद्रपुर में इस फिल्म को देखने का अनुभव इसलिए भी खास रहा क्योंकि पर्वतीय समाज के लोगों ने सामूहिक रूप से अपनी सहभागिता दर्ज कराई। रविवार शाम चावला थिएटर में परिवारों और बच्चों की मौजूदगी ने एक अलग ही वातावरण बना दिया था।
जब पर्दे पर पहाड़ी बोली सुनाई देती, पुराने मकान दिखाई देते और बुजुर्गों के जीवन की कठिनाइयां सामने आतीं, तो ऐसा महसूस होता था कि हर परिवार कहीं न कहीं अपनी ही कहानी देख रहा है।
यह केवल फिल्म देखना नहीं था, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी बोली, अपने संस्कार और अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने जैसा अनुभव था। सबसे सुखद बात यह रही कि नई पीढ़ी भी अपने माता-पिता के साथ इस कहानी की साक्षी बनी।
आज महानगरों में रहने वाले अनेक परिवारों के बच्चे अपनी मातृभाषा, गांव और पारंपरिक जीवनशैली से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में परिवार के साथ इस तरह की फिल्म देखना उनके लिए भी एक सीख है। उन्हें समझने का अवसर मिलता है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी किस परिवेश से आए हैं और पहाड़ के लोगों ने किन परिस्थितियों में अपना जीवन गुजारा है।
उत्तराखंड के नीति-निर्माताओं के लिए भी एक संदेश
‘पायर’ केवल दर्शकों का मनोरंजन करने वाली फिल्म नहीं है। यह उत्तराखंड की सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने भी कई सवाल रखती है।
आखिर गांव खाली क्यों हो रहे हैं? पहाड़ में रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं हैं? बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उनके घरों के नजदीक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं? जिन माता-पिता के बच्चे बाहर रहते हैं, उनकी देखभाल और सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई है?
रुद्रपुर के पर्वतीय समाज के परिवारों को फिल्म ‘पायर’ दिखाने के लिए पूरे चावला थिएटर के शो की टिकट बुक कराकर सराहनीय पहल करने वाले समाजसेवी एवं उद्यमी महेश कांडपाल तथा उनकी अर्धांगिनी नीलम कांडपाल का हृदय से आभार एवं धन्यवाद। उनके इस प्रयास से पर्वतीय समाज के लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ एकजुट होकर पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और संवेदनाओं से जुड़ी फिल्म देख सके। यह पहल समाज की एकता और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम का सुंदर उदाहरण है।
राज्य निर्माण के समय उत्तराखंड के लोगों ने जिस खुशहाल पहाड़ का सपना देखा था, उसमें गांवों की आबादी बचाना भी महत्वपूर्ण लक्ष्य था। विकास का अर्थ केवल सड़क, भवन और बड़ी योजनाएं नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ तब पूरा होगा, जब पहाड़ का युवा अपने गांव में सम्मानजनक रोजगार पा सकेगा और बुजुर्ग माता-पिता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन से नहीं जूझेंगे।
‘पायर’ क्यों देखनी चाहिए?
मेरे विचार से उत्तराखंड के प्रत्येक परिवार को यह फिल्म देखनी चाहिए। विशेष रूप से उन बच्चों को, जो अपने माता-पिता से दूर महानगरों में रहते हैं। यह फिल्म किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में घर छोड़ना भी जीवन की वास्तविकता है, लेकिन इस दौड़ में पीछे छूट जाने वाले माता-पिता की भावनाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
विनोद कापड़ी ने पहाड़ के जिस दर्द को पर्दे पर उतारा है, वह केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। यह देश के हर उस गांव की कहानी है, जहां से युवा शहरों की ओर चले गए और पीछे बुजुर्गों के हिस्से में इंतजार रह गया।
आज चावला थिएटर से बाहर निकलते समय मन में यही विचार था कि हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा रोजगार और बेहतर भविष्य देने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि हमारे माता-पिता को भी जीवन के अंतिम पड़ाव में हमारे समय, साथ और स्नेह की उतनी ही जरूरत होती है?
अंत में इतना ही कि ‘पायर’ की असली सफलता यही है कि फिल्म समाप्त होने के बाद भी इसकी कहानी मन में चलती रहती है। पर्दा गिर जाता है, रोशनी जल जाती है, दर्शक अपने घर लौट जाते हैं, लेकिन पदम सिंह और तुलसी का इंतजार दिल में रह जाता है।
रुद्रपुर के चावला थिएटर में पर्वतीय समाज की सामूहिक उपस्थिति ने यह भी साबित किया कि पहाड़ से दूर रहने के बावजूद पहाड़ लोगों के दिलों में आज भी जीवित है। अपनी संस्कृति और अपनी मिट्टी से जुड़ने के लिए किसी विशेष अवसर की जरूरत नहीं होती, बस मन में अपनी पहचान के प्रति सम्मान होना चाहिए।
‘पायर’ देखिए, अपने माता-पिता को याद कीजिए और अपनी मिट्टी से जुड़े रहिए। क्योंकि पहाड़ केवल हमारी जन्मभूमि नहीं, हमारी पहचान है।
अवतार सिंह बिष्ट | संपादकीय
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