रुद्रपुर। प्रकाश पर्व दीपावली के पावन उपलक्ष्य में स्थानीय गांधी पार्क में एक भव्य और अलौकिक छह दिवसीय मेले का आयोजन गतिमान है। इस मेले में जहां एक ओर उत्सव की उमंग है, वहीं दूसरी ओर भारतीय सनातन संस्कृति और अध्यात्म की त्रिवेणी बह रही है। मेले में सैकड़ों की संख्या में सजे स्टॉल और वहां उमड़ती जनमेदिनी इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के बीच भी हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
इस महापर्व के अवसर पर संपूर्ण मेला क्षेत्र में सनातन परंपरा के प्रमुख स्तंभों—भगवान श्री गणेश, माता लक्ष्मी और धनपति कुबेर देव की आराधना का आध्यात्मिक माहौल बना हुआ है। आइए, इस पावन बेला पर इन दिव्य शक्तियों के स्वरूप और उनके आध्यात्मिक महत्व को समझें:
गौ माता के नाम पर दीपावली मेला, और सड़कों पर प्लास्टिक खाती गौ माता!
रुद्रपुर के गांधी पार्क में दीपावली मेले की रौनक के बीच नगर निगम, जिला प्रशासन और उत्तराखंड सरकार से एक सवाल—क्या गौ माता की सेवा सिर्फ मंचों, भाषणों और राजनीतिक आयोजनों तक सीमित रह गई है? हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने कई बार गौ माता को कूड़े के ढेर में भोजन तलाशते हुए तस्वीरों के साथ यह मुद्दा उठाया, लेकिन आज भी हालात नहीं बदले। गौ माता प्लास्टिक की थैलियां खाने को मजबूर है। दीपावली मेले की हार्दिक शुभकामनाएं! मगर गौ माता के नाम पर राजनीति करने वालों, पहले उसकी दुर्दशा तो देखिए। दीप जलाने से पहले गौ माता के जीवन में उजाला लाइए।
दिव्य त्रिदेवियां और देव: आध्यात्मिक स्वरूप
- प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश (विघ्नहर्ता और बुद्धि के दाता): किसी भी मांगलिक कार्य या उत्सव की शुरुआत भगवान गणेश की आराधना के बिना अधूरी है। वे बुद्धि, विवेक और रिद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं। दीपावली पर उनकी पूजा हमें यह संदेश देती है कि धन और ऐश्वर्य का उपभोग करने के लिए मनुष्य के पास शुद्ध बुद्धि और विवेक का होना अनिवार्य है।
- माता महालक्ष्मी (सुख, समृद्धि और वैभव की देवी): दीपावली की रात्रि को क्षीर सागर से प्रकट हुईं माता लक्ष्मी की विशेष साधना की जाती है। वे केवल भौतिक धन की देवी नहीं हैं, बल्कि अष्ट लक्ष्मी के रूप में वे यश, आयु, स्वास्थ्य, अन्न और संतानों का वरदान भी देती हैं। मेले में सजे मिट्टी के दीये और कलाकृतियां माता लक्ष्मी के उसी पावन आगमन की तैयारी को दर्शाती हैं।
धनपति कुबेर देव (धन के रक्षक और कोषध्यक्ष): देवताओं के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर धन के संचय और उसके सही प्रबंधन के प्रतीक हैं। आध्यात्मिक मान्यता है कि जहां माता लक्ष्मी धन का आगमन कराती हैं, वहीं कुबेर देव उस धन को सुरक्षित और स्थिर रखते हैं। दीपावली के इस पावन काल में उनका स्मरण जीवन में स्थिरता और दरिद्रता के नाश का मार्ग प्रशस्त करता है।
मेले की मुख्य विशेषताएं और आकर्षण
गांधी पार्क में लगा यह मेला अध्यात्म के साथ-साथ लोक कलाओं को भी जीवंत कर रहा है:
- स्वदेशी और हस्तशिल्प उत्पाद: मेले में स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित मिट्टी के सुंदर दीये, गणेश-लक्ष्मी की मनमोहक मूर्तियां और घर की सजावट के पारंपरिक सामान मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं।
- संस्कृति का रंग: संपूर्ण परिसर रंग-बिरंगी रोशनी से सराबोर है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय के पर्व दीपावली के संदेश को साक्षात साकार कर रहा है।
- मनोरंजन और आनंद: बच्चों के लिए लगे तरह-तरह के झूले और पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉल इस आध्यात्मिक उत्सव में उल्लास का रंग भर रहे हैं।
यह मेला आगामी 8 नवंबर तक श्रद्धालुओं और आम जनमानस के लिए खुला रहेगा, जहां आकर लोग न केवल त्योहार की खरीदारी कर रहे हैं, बल्कि सामूहिक उत्सव की ऊर्जा से सराबोर होकर अध्यात्म का सच्चा आनंद उठा रहे हैं।
