उत्तराखंड में पशु बलि: धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी प्रतिबंधों का टकराव!

  • उत्तराखंड की शाक्त परंपरा और नवरात्रि में बलि प्रथा का इतिहास
  • देवभूमि की कुल परंपरा: उत्तराखंड में पशु बलि का धार्मिक महत्व

उत्तराखंड में नवरात्रि या अन्य विशेष अवसरों पर पशु बलि प्रथा का समर्थन करने वाले लोग इसे अपनी सदियों पुरानी धार्मिक आस्था, कुल परंपरा (कुलदेवी/कुलदेवता पूजा) और शाक्त परंपरा का अटूट हिस्सा मानते हैं। इस प्रथा के समर्थकों का तर्क है कि यह कोई अंधविश्वास या क्रूरता नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही एक पवित्र धार्मिक व्यवस्था है।

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर


बलि प्रथा के समर्थन में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क और मान्यताएं दी जाती हैं:

  • शाक्त परंपरा और तंत्र साधना: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मां दुर्गा और काली के उग्र रूपों (जैसे हाट कालिका, धारी देवी आदि) की पूजा ‘शाक्त पद्धति’ से की जाती है। इस परंपरा में शक्ति की देवी को रक्त की आहुति देना साधना और समर्पण का हिस्सा माना गया है।
  • मन्नत और कृतज्ञता: मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर संकट से उबरने या कोई बड़ी मन्नत पूरी होने की प्रार्थना करता है, तो वह देवी के चरणों में बकरे की बलि देने का संकल्प (मन्नत) लेता है। मन्नत पूरी होने पर इसे देवी के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है।
  • प्रसाद के रूप में ग्रहण करना: समर्थकों का यह भी मानना है कि बलि दिए गए पशु का मांस कोई साधारण भोजन नहीं, बल्कि देवी का ‘महाप्रसाद’ होता है। इसे पूरे नियम-धर्म के साथ पकाया जाता है और परिवार तथा समाज के लोगों में बांटा जाता है। इसे वे भोजन की सामान्य मांसाहारी आदतों से बिल्कुल अलग और पवित्र मानते हैं।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार: कई स्थानीय समुदायों और पुजारियों का तर्क है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। इसलिए वे इसे अपनी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा से जोड़कर देखते हैं।