देवभूमि से ‘बैंकॉक’ तक? बदलते उत्तराखंड की बेचैन करती तस्वीर
बदलता उत्तराखंड: स्पा संस्कृति, पर्यटन और पहचान का संकट
उत्तराखंड… यह नाम सुनते ही मन में हिमालय की चोटियां, गंगा का उद्गम, केदारनाथ और बदरीनाथ की घंटियों की ध्वनि, ऋषियों की तपोभूमि और प्रकृति की निर्मल गोद का चित्र उभर आता है। कभी इसे ऊर्जा प्रदेश कहा गया, कभी पर्यटन प्रदेश और सबसे अधिक इसे देवभूमि के नाम से सम्मान मिला। लेकिन आज एक नया प्रश्न समाज के सामने खड़ा है—क्या उत्तराखंड अपनी पहचान बदल रहा है? क्या विकास की दौड़ में हम अपनी सांस्कृतिक आत्मा को पीछे छोड़ रहे हैं?
आज राज्य के मैदानी क्षेत्रों में स्पा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सरकार इन्हें रोजगार, निवेश और सेवा क्षेत्र के विस्तार के रूप में देखती है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि वैध और नियमों के अनुरूप चलने वाले स्पा सेंटर स्वास्थ्य और वेलनेस सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन जब समाज में यह धारणा बनने लगे कि कुछ स्थानों पर स्पा की आड़ में अनैतिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो समय-समय पर छापेमारी और कार्रवाई की खबरें क्यों सामने आती हैं? यदि कहीं अवैध गतिविधियां चल रही हैं, तो उन पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती? और यदि अधिकांश संस्थान नियमों के अनुरूप हैं, तो उनकी साख खराब करने वाले अवैध कारोबारियों पर सरकार निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं करती?
विडंबना देखिए। एक ओर उत्तराखंड को आध्यात्मिक पर्यटन का केंद्र बनाने की बातें होती हैं, दूसरी ओर शहरों में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच ऐसे कारोबार भी बढ़ रहे हैं जिन पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जनता पूछती है कि क्या केवल लाइसेंस जारी कर देना ही सरकार का दायित्व है, या फिर यह सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है कि लाइसेंस का दुरुपयोग न हो?
उत्तराखंड की पहचान हर कुछ वर्षों में बदलती दिखाई देती है। कभी ऊर्जा प्रदेश, कभी पर्यटन प्रदेश, कभी निवेश प्रदेश और अब लोगों की चर्चाओं में नए-नए उपनाम जुड़ने लगे हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील नागरिक को चिंतित करती है। विकास का अर्थ केवल बाजार का विस्तार नहीं होता, बल्कि सामाजिक मूल्यों और कानून के शासन को भी मजबूत करना होता है।
सरकार अक्सर कहती है कि पर्यटन से राजस्व बढ़ता है। यह सही भी है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि पर्यटन की सफलता उसकी गुणवत्ता और छवि पर निर्भर करती है। यदि किसी प्रदेश की पहचान प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के बजाय विवादित गतिविधियों से बनने लगे, तो यह पर्यटन नहीं, बल्कि पहचान का संकट बन जाता है।
अब उत्तराखंड की नई पहचान तय करने की होड़ लगी है। पहले लोग कहते थे—चलो देवभूमि चलते हैं। अब कहीं ऐसा न हो कि लोग पूछने लगें—वह वही प्रदेश है न, जहां हर गली में स्पा सेंटर खुल रहे हैं? यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, समाज से भी है।
बाजार का अपना चरित्र होता है। जहां मांग होगी, वहां कारोबार भी होगा। लेकिन कानून का भी अपना चरित्र होना चाहिए। यदि कोई व्यवसाय वैध है, तो उसे पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए। यदि कोई अवैध गतिविधि कर रहा है, तो उस पर बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यही सुशासन की पहचान है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल लाइसेंस जारी करने तक सीमित न रहे। नियमित निरीक्षण, पारदर्शी व्यवस्था, शिकायतों की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई हो। इससे न केवल कानून का सम्मान बढ़ेगा, बल्कि वैध कारोबार करने वाले प्रतिष्ठानों की साख भी सुरक्षित रहेगी।
उत्तराखंड पहाड़ों की आस्था, संस्कृति और विश्वास का प्रतीक है। यहां की पहचान बाजार से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों से बनी है। यदि विकास की दिशा ऐसी होगी जिसमें नैतिकता और कानून पीछे छूट जाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी कि क्या हमने कुछ करों और कुछ निवेश के लिए अपनी पहचान दांव पर लगा दी?
अंततः प्रश्न यही है—हम कैसा उत्तराखंड चाहते हैं? वह उत्तराखंड जिसे दुनिया देवभूमि के नाम से जाने, या वह उत्तराखंड जिसकी चर्चा विवादों और सनसनी से हो? चुनाव सरकार को भी करना है, समाज को भी और हम सबको भी।
उत्तराखंड की आत्मा उसकी नदियों, पर्वतों और मंदिरों में बसती है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की कीमत पहचान नहीं होनी चाहिए। यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में इतिहास यह दर्ज करेगा कि हमने विकास तो किया, पर अपनी विशिष्टता खो दी।
देवभूमि की पहचान को बचाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। क्योंकि प्रदेश का भविष्य सड़कों, भवनों, चरित्र, संस्कृति और कानून के सम्मान से तय होता है।
