धर्म के नाम पर राजनीति से किसका फायदा, किसका नुकसान?धर्म के नाम पर राजनीति से किसका फायदा, किसका नुकसान?राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच हिंदू-मुस्लिम-ईसाई समाज के बीच बढ़ता अविश्वास बना गंभीर सवाल

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उत्तराखंड। भारत की सामाजिक संरचना सदियों से विविधता, सह-अस्तित्व और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के सम्मान पर टिकी रही है। हाल के वर्षों में धर्म से जुड़े मुद्दों के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर लगातार बहस तेज हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक भावनाओं को केंद्र में रखकर समाज को अलग-अलग खांचों में बांटने की कोशिशों से आखिर किसे राजनीतिक लाभ मिलता है और आम जनता के हिस्से में क्या आता है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


विश्लेषणों में राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया पर अफवाहों और भड़काऊ सामग्री तथा स्थानीय विवादों को सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में गिना जाता है। कई बार स्थानीय स्तर का विवाद धार्मिक पहचान से जुड़कर व्यापक तनाव का रूप ले लेता है। ऐसे वातावरण में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के बीच आपसी विश्वास प्रभावित होता है।
धर्म की मूल भावना पर भी सवाल
हिंदू धर्म की व्यापक परंपरा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और सह-अस्तित्व जैसे विचारों को विशेष महत्व दिया गया है। भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता इसकी बड़ी विशेषता रही है। अलग-अलग दर्शन, पूजा-पद्धतियां, लोक परंपराएं और सांस्कृतिक मान्यताएं इसके व्यापक स्वरूप का हिस्सा हैं।
ऐसे में जब धार्मिक पहचान को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया जाता है, तब सवाल केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर धर्म की सामाजिक छवि और उसके मूल मानवीय मूल्यों पर भी पड़ता है। धर्म आस्था, नैतिकता और आत्मिक शांति का माध्यम है, जबकि राजनीति का उद्देश्य शासन, नीति और जनकल्याण से जुड़ा होना चाहिए।
असली मुद्दे पीछे क्यों छूटते हैं?
धार्मिक विवादों के बीच शिक्षा, रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, युवाओं के भविष्य और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे अक्सर चर्चा के केंद्र से दूर चले जाते हैं।
जनता के सामने बड़ा सवाल यह है कि चुनाव के समय धर्म और पहचान से जुड़े मुद्दे इतनी तेजी से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा कैसे बन जाते हैं, जबकि आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याएं लंबे समय तक समाधान की प्रतीक्षा करती रहती हैं?
सोशल मीडिया ने बढ़ाई चुनौती
सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को बेहद तेज किया है। इसी के साथ अधूरी जानकारी, अफवाह और भड़काऊ सामग्री भी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। किसी घटना की पूरी जानकारी सामने आने से पहले ही उसके धार्मिक या राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगते हैं।
इस स्थिति में नागरिकों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। किसी पोस्ट या वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता जांचना और अफवाहों से दूरी रखना सामाजिक शांति के लिए आवश्यक है।
सवाल किसी धर्म का नहीं, राजनीति की दिशा का
हिंदू समाज हो, मुस्लिम समाज हो या ईसाई समाज—हर समुदाय के आम नागरिक शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन चाहते हैं। धार्मिक पहचान के आधार पर समाज को लगातार राजनीतिक खेमों में बांटने से आम नागरिकों के बीच दूरी बढ़ने का खतरा रहता है।
इसलिए सवाल यह होना चाहिए कि राजनीति धर्म को दिशा दे रही है या धर्म को राजनीति की दिशा तय करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपने विचार रखने का अधिकार है। जनता को भी यह अधिकार है कि वह सवाल पूछे कि उसके वोट का इस्तेमाल विकास और जनकल्याण के लिए हो रहा है या भावनात्मक ध्रुवीकरण के लिए।
भारत की ताकत उसकी विविधता है। इस विविधता को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय सामाजिक शक्ति के रूप में देखने की जरूरत है। धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विश्वास का विषय है और कानून, संविधान तथा नागरिक अधिकार पूरे समाज के लिए समान आधार हैं।
आखिर चुनाव आते-जाते रहेंगे, राजनीतिक दल बदलते रहेंगे, सत्ता का स्वरूप भी बदल सकता है—मगर समाज के बीच बनी दूरी को पाटना सबसे कठिन काम होता है। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है: धर्म के नाम पर राजनीति से जनता को क्या मिला और सामाजिक सौहार्द ने इसकी क्या कीमत चुकाई?


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