कत्यूरी कौन थे? ताम्रपत्रों ने खोला राजवंश की वंश परंपरा का नया अध्याय, सूर्यवंशी परंपरा के दावे से इतिहास में फिर छिड़ी बहस
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष रिपोर्ट
रुद्रपुर। उत्तराखंड के इतिहास में सदियों से महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कत्यूरी राजवंश की उत्पत्ति को लेकर बहस एक बार फिर सामने आई है। सवाल यह है कि कत्यूरी शासकों की वास्तविक वंश परंपरा क्या थी और उनकी पहचान को किस ऐतिहासिक आधार पर समझा जाना चाहिए? इतिहास के उपलब्ध ताम्रपत्रों, शिलालेखों, लोकगाथाओं और विभिन्न इतिहासकारों के मतों को सामने रखते हुए चंदन सिंह मनराल ने कत्यूरी शासकों को सूर्यवंशी परंपरा से जोड़ने वाले प्रमाणों पर ध्यान आकर्षित किया है।
मनराल का तर्क है कि पांडुकेश्वर से प्राप्त एक ताम्रपत्र में राजा पद्मदेव से संबंधित वंश परंपरा में सगर, दिलीप, मांधाता और भगीरथ जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। उनका कहना है कि इन नामों का संबंध प्राचीन सूर्यवंशी परंपरा से रहा है। इसी आधार पर वह कत्यूरी शासकों को खस राजा बताने वाली धारणाओं पर सवाल उठाते हैं।
हालांकि कत्यूरी वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में एकमत मत कायम नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने कत्यूरी शासकों को कुणिंद, खस, शक अथवा अयोध्या के शालिवाहन राजघराने से जोड़ने के अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं।
एक राजवंश, कई पहचान और इतिहास का बड़ा सवाल
कत्यूरी राजवंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहास में अनेक सिद्धांत सामने आए हैं। कुछ विद्वानों ने उन्हें स्थानीय कुणिंद परंपरा से जोड़ा, कुछ ने खस मूल की संभावना व्यक्त की। राहुल सांकृत्यायन ने शक और खस परंपरा से संबंध की चर्चा की, जबकि बद्री दत्त पांडे ने कत्यूरी शासकों को अयोध्या के शालिवाहन राजघराने से जोड़ते हुए सूर्यवंशी परंपरा का उल्लेख किया।
ई.टी. एटकिंसन ने भी हिमालयन गजेटियर में कत्यूरी शासकों की स्थानीय उत्पत्ति से संबंधित संभावना पर विचार किया था।
इस प्रकार कत्यूरी वंश की उत्पत्ति स्वयं इतिहास शोध का विषय रही है। इसी बहस के बीच ताम्रपत्रों और शिलालेखों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
पांडुकेश्वर का ताम्रपत्र क्या बताता है?
पांडुकेश्वर क्षेत्र से प्राप्त ताम्रपत्रों में कार्तिकेयपुर से जुड़े शासकों और उनकी पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। एक ताम्रपत्र में देश्टदेव के पुत्र पद्मदेव का उल्लेख है, जबकि दूसरे में पद्मदेव के पुत्र सुभिक्षराज का नाम आता है।
पद्मदेव से संबंधित वंश परंपरा में सगर, दिलीप, मांधाता और भगीरथ जैसे नामों का उल्लेख किए जाने की बात मनराल ने सामने रखी है। उनका तर्क है कि इस तरह की वंश परंपरा सूर्यवंशी राजपरंपरा से जुड़ती है।
इसी आधार पर वह कहते हैं कि कत्यूरी राजाओं की सामाजिक पहचान पर चर्चा करते समय अभिलेखीय प्रमाणों को प्राथमिकता देकर अध्ययन किया जाना चाहिए।
तालेश्वर के ताम्रपत्रों ने सामने रखा ब्रह्मपुर का इतिहास
उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास में तालेश्वर ताम्रपत्रों का विशेष महत्व माना जाता है। इन ताम्रपत्रों में ब्रह्मपुर और पर्वताकार राज्य का उल्लेख मिलता है। पौरव वंश से जुड़े शासकों के रूप में विष्णुवर्म, वृषभवर्म, अग्निवर्म, द्युतिवर्म और विष्णुवर्म द्वितीय के नाम सामने आते हैं।
द्युतिवर्म के ताम्रपत्र में श्रीपुरूरव आदि पौर्व राजाओं की परंपरा का उल्लेख मिलता है। साथ ही शासकों को ‘सोमदिवाकर वंश’ से संबंधित बताया गया है।
मनराल के अनुसार ‘सोमदिवाकर’ शब्द की व्याख्या सूर्य और चंद्र परंपराओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि तालेश्वर ताम्रपत्र प्राचीन मध्य हिमालय की राजवंशीय परंपराओं के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्रोत बन जाते हैं।
क्या ब्रह्मपुर ही था प्राचीन राजनीतिक केंद्र?
ब्रह्मपुर की पहचान को लेकर भी इतिहासकारों में अलग-अलग मत रहे हैं। पुरातत्वविद अलेक्जेंडर कनिंघम ने पश्चिमी रामगंगा क्षेत्र के वैराटपट्टन अथवा लखनपुर-बैराट को प्राचीन ब्रह्मपुर से जोड़ने का मत प्रस्तुत किया था।
तालेश्वर से ताम्रपत्रों की प्राप्ति ने इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को लेकर शोध को नया आधार दिया। मनराल के अनुसार तालेश्वर और चौखुटिया क्षेत्र की भौगोलिक निकटता भी इस विषय में विचारणीय है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में भी ब्रह्मपुर का उल्लेख मिलता है। उसने सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा की थी। उसके विवरण में ब्रह्मपुर के लिए ‘पो-लो-कि-मो’ नाम का उल्लेख होने की बात इतिहासकारों ने कही है।
कत्यूरी शासकों की लंबी सूची अभिलेखों में दर्ज
बागेश्वर के शिलालेख और पांडुकेश्वर के ताम्रपत्रों से जिन शासकों के नाम सामने आते हैं, उनमें वसंतदेव, खड़पाड़देव, कल्याणराजदेव, त्रिभुवनराजदेव, निम्बारतदेव, ईष्टराणादेव, ललितेश्वरदेव, भूदेव, सलोनादित्य, इच्छत्देव, देश्टदेव, पद्मदेव और सुभिक्षराज जैसे नाम शामिल हैं।
बागेश्वर के शिलालेख में भूदेव के साथ उनके पूर्वजों का उल्लेख मिलता है। शिलालेख में इन शासकों के लिए ‘गिरिराज चक्रचूड़ामणि’ जैसी उपाधि का प्रयोग किए जाने की बात भी सामने आती है।
यह अभिलेखीय सामग्री बताती है कि कत्यूरी काल का अध्ययन केवल लोकगाथाओं तक सीमित विषय नहीं है। मंदिरों, ताम्रपत्रों और शिलालेखों में दर्ज सामग्री भी इसके अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार है।
जागर परंपरा भी देती है अलग तस्वीर
कत्यूरी इतिहास की चर्चा में उत्तराखंड की जागर परंपरा का भी अपना महत्व है। मनराल का कहना है कि लोकजागरों में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और राजसत्ता के जो संकेत मिलते हैं, उन्हें आधुनिक जातिगत ढांचे के चश्मे से देखने की बजाय उस समय की परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए।
उनके अनुसार जागर परंपरा में कत्यूरी राजाओं से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी जीवित हैं और इनका तुलनात्मक अध्ययन अभिलेखीय स्रोतों के साथ किया जाना चाहिए।
रणचूलीकोट पर क्रचल्ल के आक्रमण की कहानी
मनराल ने डोटी क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए शाके 1145 में खस राजा क्रचल्ल के कत्यूर क्षेत्र पर आक्रमण का प्रसंग सामने रखा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस संघर्ष का संबंध रणचूलीकोट से था और इसे कार्तिकेयपुर की राजनीतिक शक्ति के कमजोर होने की घटनाओं में गिना जाता है।
डोटी के साना गांव में मिले सोने के भंडार से जुड़ी लोकमान्यता भी इसी प्रसंग से जोड़ी जाती है। स्थानीय इतिहास परंपरा इसे रणचूलीकोट से लूटे गए धन का हिस्सा मानती है। इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र पुरातात्विक और अभिलेखीय शोध की आवश्यकता बनी हुई है।
1590-91 का बघाणगढ़ी संघर्ष और सकालदेव
मनराल ने 1590-91 के आसपास चंद राजा रुद्रचंद्र और गढ़वाल के राजा बलभद्र शाह से जुड़े बघाणगढ़ी संघर्ष का भी उल्लेख किया है।
उनके अनुसार उस समय कत्यूर क्षेत्र में सकालदेव का प्रभाव था। स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा में सकालदेव और गढ़वाल पक्ष के बीच संबंधों तथा बाद में रुद्रचंद्र से संघर्ष का वर्णन मिलता है।
इसी प्रसंग में पुरखु पंत और कत्यूर के दीवान एवं सेनापति रातूपड़ियार से जुड़े युद्ध प्रसंग का भी उल्लेख किया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार युद्ध में रातूपड़ियार की भूमिका महत्वपूर्ण रही और बाद की घटनाओं में पड़ियार परिवार को गढ़वाल क्षेत्र में जागीर मिलने की कथा प्रचलित है।
नंदा राजजात से जुड़ती है एक और ऐतिहासिक परंपरा
बघाण क्षेत्र नंदा राजजात यात्रा मार्ग से भी जुड़ा है। मनराल के अनुसार स्थानीय परंपराओं में चंद्रवंशी राजाओं की सीमा सुरक्षा, लाटू नामक वीर योद्धा और नंदा देवी से जुड़ी कथाएं आज भी प्रचलित हैं।
अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में स्थापित प्रतिमा को लेकर भी स्थानीय इतिहास में एक परंपरा मिलती है कि चंद शासक इसे बघाण क्षेत्र से लेकर आए थे। इन परंपराओं की पुष्टि के लिए पुरातात्विक और अभिलेखीय स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
कत्यूरी इतिहास का निष्कर्ष ताम्रपत्रों से निकलेगा या लोकगाथाओं से?
कत्यूरी वंश की उत्पत्ति और पहचान का सवाल अभी भी इतिहास शोध का विषय है। एक ओर ताम्रपत्र और शिलालेख राजाओं, उनकी उपाधियों, राजधानी, प्रशासन और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देते हैं, वहीं दूसरी ओर जागर, मंदिर परंपराएं और स्थानीय स्मृतियां इस इतिहास को लोकजीवन से जोड़ती हैं।
चंदन सिंह मनराल का जोर इस बात पर है कि कत्यूरी शासकों को खस, शक, कुणिंद या सूर्यवंशी परंपरा से जोड़ने वाले विभिन्न मतों का अध्ययन उपलब्ध प्राथमिक स्रोतों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कत्यूरी इतिहास की सबसे बड़ी पहेली शायद यही है—एक ही राजवंश के बारे में अलग-अलग ऐतिहासिक परंपराएं क्यों बनीं और ताम्रपत्रों में दर्ज वंश संकेत इस पहेली को कितना सुलझाते हैं?
यही सवाल उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास पर आगे होने वाले शोध के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
कत्यूरी कौन थे? ताम्रपत्रों ने खोला राजवंश की वंश परंपरा का नया अध्याय, सूर्यवंशी परंपरा के दावे से इतिहास में फिर छिड़ी बहस हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट की| विशेष रिपोर्ट
