लाटू देवता मंदिर: आँखों और मुँह पर पट्टी बाँधकर क्यों पूजा करते हैं पुजारी?माँ नंदा देवी के सच्चे रक्षक: बाण गाँव के लाटू देवता की पौराणिक कथा

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  • लाटू देवता मंदिर: आँखों और मुँह पर पट्टी बाँधकर क्यों पूजा करते हैं पुजारी?
  • देवभूमि का सबसे बड़ा रहस्य: लाटू देवता और मंदिर की वो ‘चमकीली मणि’
  • जहाँ कपाट खोलते ही आँखों पर बाँधनी पड़ती है पट्टी: लाटू देवता का अनोखा धाम

धार्मिक और आस्था से जुड़े शीर्षक (Spiritual & Traditional):

  • माँ नंदा देवी के सच्चे रक्षक: बाण गाँव के लाटू देवता की पौराणिक कथा
  • लाटू देवता: बहन नंदा देवी के धर्म भाई और दुर्गम हिमालय के क्षेत्रपाल
  • नंदा राजजात यात्रा के सच्चे मार्गदर्शक और रक्षक: लाटू देवता

उत्तराखंड के चमोली जिले के देवाल विकासखंड में स्थित बाण (वांण) गाँव का लाटू देवता मंदिर भारत के सबसे रहस्यमयी और अनोखे मंदिरों में से एक माना जाता है। नंदा देवी के “सच्चे रक्षक” और धर्म भाई के रूप में पूजे जाने वाले लाटू देवता का यह धाम अपनी अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य: आँखों और मुँह पर पट्टी

  • पुजारी भी नहीं देख सकते स्वरूप: इस मंदिर की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसके अंदर किसी भी भक्त का जाना पूरी तरह वर्जित है. यहाँ तक कि मुख्य पुजारी भी आँखों पर काली पट्टी और मुँह पर कपड़ा बाँधकर मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं।

रहस्यमयी मणि और नागराज: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लाटू देवता इस मंदिर के अंदर नागराज के रूप में एक दिव्य और चमकीली मणि के साथ निवास करते हैं। उस मणि का प्रकाश इतना तीव्र है कि कोई भी सामान्य इंसान उसे देखकर अंधा हो सकता है

मुँह पर पट्टी क्यों? पुजारी मुँह पर कपड़ा इसलिए बाँधते हैं ताकि उनके मुँह की गंध से देवता रुष्ट न हों और नागराज की विषैली सांसों या गंध का असर पुजारी के स्वास्थ्य पर न पड़े।

साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट

  • लाटू देवता मंदिर के कपाट साल भर बंद रहते हैं और यह केवल एक दिन, वैशाख महीने की पूर्णिमा को खुलता है। [1]
  • इसी दिन पुजारी आँखों पर पट्टी बाँधकर कपाट खोलते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु मंदिर के प्रांगण से या लगभग 75 फीट की दूरी से ही हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। इसके बाद मार्गशीर्ष अमावस्या को कपाट दोबारा बंद कर दिए जाते हैं।

माँ नंदा देवी से रिश्ता और पौराणिक कथा

  • अनजाने में किया अपराध: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती (नंदा देवी) का विवाह हुआ, तो माँ नंदा को विदा करने के लिए उनके भाई भी कैलाश की ओर चल पड़े, जिनमें चचेरे भाई लाटू भी थे।
  • श्राप और बाण गाँव में वास: रास्ते में अत्यधिक प्यास लगने के कारण लाटू ने एक कुटिया में रखे मटके से पानी समझकर मदिरा पी ली। नशे की हालत में जब वे उत्पात मचाने लगे, तो क्रोधित होकर माँ नंदा ने उन्हें कैद करने का आदेश दिया और श्राप दे दिया। लाटू देवता के अत्यधिक पश्चाताप करने पर माँ ने भावुक होकर वरदान दिया कि बाण गाँव में उनका मंदिर होगा और वे इस पूरे क्षेत्र के क्षेत्रपाल (रक्षक) कहलाएंगे।

नंदा देवी राजजात यात्रा के “सच्चे रक्षक” और अगुवा

  • दुर्गम रास्तों के मार्गदर्शक: हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक नंदा देवी राजजात यात्रा जब बाण गाँव (12वें पड़ाव) पहुँचती है, तो यहाँ से आगे की व्यवस्था लाटू देवता ही संभालते हैं।
  • हेमकुंड तक साथ: बाण गाँव के आगे निर्जन पहाड़ियां और ग्लेशियर शुरू हो जाते हैं। परंपरा के अनुसार, लाटू देवता अपनी बहन नंदा देवी की डोली की रक्षा करते हुए उन्हें आगे होमकुंड/हेमकुंड तक विदा करने स्वयं साथ जाते हैं। उनके आशीर्वाद के बिना इस कठिन यात्रा को पूरा करना असंभव माना जाता है। [1, 2]

5. पर्यावरण और सामाजिक चेतना का प्रतीक

  • विशाल देवदार और सुराई के वृक्ष: यह छोटा सा प्राचीन मंदिर चारों ओर से सुराई और विशाल देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है, जिसमें से एक देवदार के पेड़ का व्यास करीब 5 मीटर तक फैला है।
  • बलि प्रथा पर पूर्ण रोक: आस्था के इस केंद्र में अब स्थानीय ग्रामीणों और मंदिर समिति की सर्वसम्मति से पशु बलि प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है, जो इस पावन धाम की सात्विक और शांतिपूर्ण परंपरा को दर्शाता है।

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