₹22 हजार करोड़ के दावे पर ₹6.5 करोड़!कर्ज समाधान या पूंजीपतियों के लिए ‘नई अर्थव्यवस्था’?

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उत्तराखंड ;भारत की अर्थव्यवस्था में इन दिनों एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने बैंकिंग व्यवस्था, दिवाला कानून और बड़े कारोबारियों के प्रति सरकारी नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एस्सेल समूह के संस्थापक और जी ग्रुप के चेयरमैन रहे सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी ने ऐसी पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ का भुगतान होगा। इसका अर्थ है कि कर्जदाताओं की वसूली लगभग 0.03 प्रतिशत और हेयरकट करीब 99.97 प्रतिशत बैठता है।
यहीं से वह सवाल जन्म लेता है, जिसे देश के करोड़ों बैंक खाताधारकों, छोटे कारोबारियों, किसानों और मध्यम वर्ग की ओर से पूछा जाना चाहिए—क्या भारत की कर्ज समाधान व्यवस्था सबके लिए समान है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


यह समझना भी जरूरी है कि ₹22,006 करोड़ का आंकड़ा सुभाष चंद्रा द्वारा स्वयं लिया गया व्यक्तिगत कर्ज भर नहीं है। यह मुख्य रूप से उन कंपनियों से जुड़ी देनदारियों पर दी गई पर्सनल गारंटी के आधार पर स्वीकार किए गए दावों का आंकड़ा है। मामला वर्ष 2022 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की ओर से शुरू हुई कार्यवाही से आगे बढ़ा। मूल मामला करीब ₹170 करोड़ के उस ऋण से जुड़ा था, जिसकी व्यक्तिगत गारंटी चंद्रा ने दी थी।
फिर अलग-अलग वित्तीय संस्थानों के दावे इस प्रक्रिया में जुड़ते गए और स्वीकार किए गए दावों की राशि ₹22,006.57 करोड़ तक पहुंच गई। एनसीएलटी ने अंततः पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार योजना में ₹6.25 करोड़ कर्जदाताओं के लिए और ₹25 लाख दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए रखे गए हैं। योजना को कर्जदाताओं के मतदान में करीब 80.81 प्रतिशत वोटिंग शेयर का समर्थन मिला।
सवाल यह है कि बैंक का पैसा किसका है?
बैंक में जमा पैसा किसी उद्योगपति, किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल का निजी पैसा नहीं होता। यह आम जनता की बचत होती है। लाखों परिवार अपनी मेहनत की कमाई बैंकों में जमा करते हैं। उसी धन से उद्योगों को कर्ज मिलता है। जब हजारों करोड़ की देनदारी के सामने कुछ करोड़ रुपये की वसूली होती है, तो सबसे पहला सवाल उस आम जमाकर्ता के अधिकार का बनता है।
एनसीएलटी ने अपने फैसले में उस व्यावहारिक स्थिति को भी ध्यान में रखा कि यदि पुनर्भुगतान योजना मंजूर नहीं होती और मामला पूर्ण दिवाला प्रक्रिया में जाता, तो कर्जदाताओं को मिलने वाली राशि और कम हो सकती थी।
कानून की दृष्टि से यह तर्क अपनी जगह है। मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के साथ-साथ नीति की नैतिकता पर भी बहस जरूरी है।
भाजपा सरकार से सवाल क्यों?
यहां भाजपा सरकार को सीधे यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि उसने सुभाष चंद्रा का ₹22,000 करोड़ का कर्ज माफ किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फैसला एनसीएलटी की दिवाला प्रक्रिया में हुआ है और कुछ वित्तीय संस्थान इस फैसले को चुनौती देने पर विचार कर रहे हैं। एचडीएफसी बैंक ने विरोध किया था और अब एनसीएलएटी में अपील की संभावना जताई है।
मगर केंद्र की भाजपा सरकार से सवाल फिर भी बनता है।
क्या सरकार ऐसी व्यवस्था को आदर्श मानती है जिसमें बड़े कारोबारी समूहों की देनदारियों में 99.97 प्रतिशत तक का हेयरकट संभव हो सकता है?
क्या सरकार यह बताएगी कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ऐसे मामलों में वास्तविक नुकसान कितना उठाना पड़ता है?
क्या सरकार देश के सामने यह स्पष्ट करेगी कि बड़े उद्योगपतियों के कर्ज समाधान और छोटे कारोबारी के कर्ज समाधान की प्रक्रिया में व्यवहारिक अंतर क्यों दिखाई देता है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कर्ज समाधान का उद्देश्य केवल खाते बंद करना है या जनता के धन की अधिकतम वसूली करना भी है?
विजय माल्या की टिप्पणी ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
इस फैसले के बाद भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर टिप्पणी करते हुए अपने मामले की तुलना सुभाष चंद्रा प्रकरण से की। माल्या ने दावा किया कि सरकार और बैंकों ने उनसे ₹6,203 करोड़ की न्यायिक देनदारी के मुकाबले ₹14,100 करोड़ की वसूली की बात कही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य बड़े कर्जदार कम रकम पर समझौते कर रहे हैं तो उनके मामले में अलग रवैया क्यों अपनाया गया।
माल्या की बात को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं एक विवादित वित्तीय मामले के आरोपी और भारत के भगोड़े आर्थिक अपराधियों की सूची में शामिल व्यक्ति हैं। फिर भी उनका सवाल व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण तुलना का प्रश्न जरूर खड़ा करता है—क्या समान परिस्थितियों में सभी कर्जदारों के लिए समान मापदंड लागू होते हैं?
यही सवाल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
पूंजीपति का विकास और जनता का भरोसा
बदलते भारत में पूंजी का विस्तार जरूरी है। बड़े उद्योग रोजगार पैदा करते हैं, निवेश बढ़ाते हैं और अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। समस्या पूंजी के विकास में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब जोखिम का लाभ निजी हाथों में और नुकसान का बोझ सार्वजनिक व्यवस्था पर आने लगे।
यदि कोई उद्योगपति हजारों करोड़ का कारोबार खड़ा करता है, तो सफलता का श्रेय उसके प्रबंधन और कारोबारी कौशल को मिलता है। उसी व्यवस्था में विफलता होने पर कर्ज का बड़ा हिस्सा बैंकिंग तंत्र पर छोड़ दिया जाए और अंततः बैंक अपने नुकसान की भरपाई जनता के धन, ऊंची फीस, ब्याज दरों या सरकारी पूंजी से करें, तो सवाल उठेंगे ही।
भारत ने दिवाला और दिवालियापन संहिता यानी IBC इसलिए बनाई थी कि फंसे हुए कर्ज का समयबद्ध समाधान हो, कंपनियों की संपत्ति का बेहतर मूल्य प्राप्त हो और बैंकिंग व्यवस्था में पैसा वापस आए। मगर ₹22,006 करोड़ के दावे के सामने ₹6.5 करोड़ की वसूली का आंकड़ा इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर बहस को और तेज करता है।
जनता पूछ रही है—हेयरकट की सीमा कौन तय करेगा?
एक साधारण व्यक्ति बैंक से छोटा कर्ज लेता है तो उसे ईएमआई, ब्याज, पेनल्टी और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। छोटा व्यापारी कर्ज चुकाने में चूक जाए तो उसकी संपत्ति तक कार्रवाई पहुंच सकती है। किसान का ऋण भी उसके लिए भारी मानसिक और आर्थिक दबाव बन जाता है।
ऐसे माहौल में जब बड़े कारोबारी विवादों में हजारों करोड़ के दावों के सामने कुछ करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान राशि दिखाई देती है, तो आम आदमी के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या कानून की किताब एक है, मगर उसके परिणाम अलग-अलग हैं?
यह धारणा लोकतंत्र और बैंकिंग व्यवस्था दोनों के लिए खतरनाक है।
सरकार को आगे आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए
भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर पारदर्शिता का अवसर है। सरकार को संसद और जनता के सामने स्पष्ट आंकड़े रखने चाहिए—कितने बड़े कॉर्पोरेट कर्ज मामलों में कितना मूलधन वसूल हुआ, कितने मामलों में कितना हेयरकट दिया गया और बैंकों को वास्तविक नुकसान कितना हुआ।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि व्यक्तिगत गारंटी देने वाले प्रमोटरों की वास्तविक संपत्ति का मूल्यांकन कैसे किया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार चंद्रा की संपत्ति के मूल्यांकन को लेकर भी कर्जदाताओं ने सवाल उठाए थे। कुछ रिपोर्टों में 2018 के लगभग ₹40,000 करोड़ के नेटवर्थ आकलन और बाद में बताए गए लगभग ₹31 करोड़ के नेटवर्थ के बीच बड़े अंतर का उल्लेख है। इन दावों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच जनता का भरोसा मजबूत कर सकती है।
सवाल सुभाष चंद्रा से अधिक व्यवस्था का है
यह मामला केवल सुभाष चंद्रा बनाम बैंक का मामला मान लेना आसान होगा। असली प्रश्न उससे कहीं बड़ा है।
यह प्रश्न है कि भारत की आर्थिक व्यवस्था में पूंजी और कानून का रिश्ता कैसा होगा?
यह प्रश्न है कि बैंकिंग व्यवस्था में जोखिम का बोझ किसके कंधे पर आएगा?
यह प्रश्न है कि छोटे कर्जदार और बड़े कर्जदार के लिए व्यवस्था का व्यवहार कितना समान रहेगा?
और यह प्रश्न भाजपा सरकार से भी है कि वह देश को ऐसी आर्थिक व्यवस्था देना चाहती है जिसमें उद्योगपति आगे बढ़ें, निवेश बढ़े और रोजगार पैदा हों—मगर साथ ही बैंकों और जनता के पैसे की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता रहे।
₹22,006 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के सामने ₹6.5 करोड़ का भुगतान कानूनी प्रक्रिया का परिणाम हो सकता है, मगर लोकतंत्र में हर कानूनी फैसले की सार्वजनिक समीक्षा भी होती है। यही समीक्षा तय करेगी कि यह व्यवस्था वास्तव में कर्ज संकट का समाधान है या भविष्य में बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्ट के लिए एक ऐसा रास्ता तैयार कर रही है जिसमें जोखिम का बड़ा हिस्सा आखिरकार जनता और बैंकिंग व्यवस्था के हिस्से आए।
बदलते भारत में पूंजीपतियों का विकास स्वागत योग्य है, मगर जनता के धन की कीमत पर पूंजी का विकास लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था की कसौटी पर गंभीर सवाल जरूर खड़े करेगा।
अब समय है कि सरकार, बैंक और नियामक मिलकर देश को एक साफ जवाब दें—
₹22 हजार करोड़ के दावे के सामने ₹6.5 करोड़ की वसूली को आम आदमी किस नाम से समझे—कर्ज समाधान, कानूनी समझौता या व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा?


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