2 अक्टूबर 1994 : उत्तराखंड आंदोलन का वह काला अध्याय, जिसे 32 साल बाद भी न्याय की तलाशरामपुर तिराहा से उठी चीख ने पहाड़ को झकझोरा, शहादतों और संघर्ष से मिला उत्तराखंड

Spread the love


उत्तराखंड/रुद्रपुर/मुजफ्फरनगर।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
2 अक्टूबर देशभर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के रूप में मनाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड के राज्य आंदोलनकारियों के लिए यह तारीख एक गहरे दर्द, संघर्ष और शहादत की याद भी लेकर आती है। 2 अक्टूबर 1994 का रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी राज्य आंदोलनकारी ‘काला दिवस’ के रूप में याद करते हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


गांधी जयंती के दिन ही अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली की ओर कूच कर रहे आंदोलनकारियों को तत्कालीन उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर रोक दिया गया। इसके बाद पुलिस कार्रवाई, गोलीबारी और महिला आंदोलनकारियों के साथ गंभीर आपराधिक घटनाओं के आरोपों ने पूरे पहाड़ को आंदोलित कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। न्यायिक प्रक्रिया आज भी कुछ मामलों में जारी है।
दिल्ली कूच कर रहा था उत्तराखंड
1994 में पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुकी थी। कुमाऊं और गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों से आंदोलनकारी बसों में सवार होकर दिल्ली में प्रदर्शन के लिए निकल रहे थे। न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार गढ़वाल क्षेत्र से आने वाले लगभग 300 बसों के काफिले में पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। आंदोलनकारियों का लक्ष्य दिल्ली पहुंचकर अपनी राज्य की मांग को केंद्र सरकार के सामने रखना था।
लेकिन 1 अक्टूबर की रात से ही रास्ते में पुलिस ने जगह-जगह काफिलों को रोकना शुरू कर दिया। गुरुकुल नारसन के बाद आंदोलनकारियों का काफिला रामपुर तिराहा पहुंचा, जहां सड़क को अवरुद्ध कर दिया गया।
रामपुर तिराहा पर क्या हुआ?
न्यायालय में प्रस्तुत रिकॉर्ड के मुताबिक रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बनी। लाठीचार्ज और आंसू गैस के बाद गोली चलने की घटना हुई। इस गोलीकांड में सात आंदोलनकारियों की मौत होने की बात विभिन्न रिपोर्टों में दर्ज है।
सबसे गंभीर आरोप महिला आंदोलनकारियों के साथ हुई कथित ज्यादती से जुड़े थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत सामग्री में महिलाओं से छेड़छाड़, लूट और दुष्कर्म के आरोपों का उल्लेख हुआ। हाईकोर्ट ने पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था।
‘फर्जी हथियार बरामदगी’ का मामला भी बना सवाल
रामपुर तिराहा कांड के बाद कुछ आंदोलनकारियों के खिलाफ हथियार बरामदगी के मुकदमे दर्ज किए गए। बाद में सीबीआई जांच में इस बरामदगी को फर्जी बताया गया और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा चला।
30 जून 2026 को मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने तत्कालीन पुलिस अधिकारी बृजकिशोर सिंह तथा पुलिसकर्मियों उमेश चंद और अनिल कुमार को फर्जी हथियार बरामदगी मामले में दोषी ठहराते हुए डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास और प्रत्येक पर 21 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रामपुर तिराहा की घटना को तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है।
दुष्कर्म मामले में भी हो चुका है फैसला
रामपुर तिराहा कांड से जुड़े दुष्कर्म, छेड़छाड़ और लूट के एक मामले में मार्च 2024 में दो सेवानिवृत्त पीएसी जवानों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। यह रामपुर तिराहा प्रकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला था।
हालांकि रामपुर तिराहा से जुड़े सभी कानूनी मामले समाप्त नहीं हुए हैं। सितंबर 2026 में एक मामले में सीबीआई द्वारा आरोपी की मृत्यु संबंधी रिपोर्ट अदालत में दाखिल किए जाने और अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख निर्धारित किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
खटीमा से मसूरी और रामपुर तिराहा तक संघर्ष
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल रामपुर तिराहा की घटना तक सीमित नहीं था। 1994 में आंदोलन ने खटीमा, मसूरी, देहरादून, हरिद्वार और प्रदेश के अनेक हिस्सों में व्यापक रूप लिया।
1 सितंबर 1994 को खटीमा, 2 सितंबर को मसूरी और उसके बाद रामपुर तिराहा जैसी घटनाओं ने आंदोलन को और अधिक उग्र तथा व्यापक बनाया। न्यायालय के रिकॉर्ड में आंदोलन के दौरान विभिन्न स्थानों पर गोलीबारी, मौत, गिरफ्तारी और अन्य घटनाओं का उल्लेख मिलता है।
उत्तराखंड सरकार भी आधिकारिक रूप से खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा की घटनाओं को राज्य निर्माण आंदोलन के महत्वपूर्ण और दर्दनाक अध्यायों के रूप में याद करती रही है।
शहादतों से बना उत्तराखंड, लेकिन सवाल आज भी बाकी
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तरांचल राज्य अस्तित्व में आया, जिसे बाद में उत्तराखंड नाम दिया गया। यह राज्य उन हजारों लोगों के लंबे संघर्ष का परिणाम था जिन्होंने पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलन किया।
लेकिन राज्य बनने के 26 वर्ष बाद भी आंदोलनकारियों के बीच कई मांगें पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण, 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, पेंशन, आश्रितों को सुविधाएं और अन्य मांगें समय-समय पर आंदोलन का विषय बनती रही हैं। सितंबर 2026 में चिन्हीकरण को लेकर आंदोलनकारियों ने 2 अक्टूबर को सम्मान पत्र लौटाने तक की चेतावनी दी थी।
यानी सवाल केवल इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि जिस आंदोलन के बलिदानों से राज्य अस्तित्व में आया, उस आंदोलन की विरासत और आंदोलनकारियों के अधिकारों को वर्तमान व्यवस्था किस तरह देखती है।
2 अक्टूबर क्यों बना ‘काला दिवस’?
राज्य आंदोलनकारियों के लिए 2 अक्टूबर इसलिए केवल गांधी जयंती नहीं है। यह वह तारीख है जब दिल्ली की ओर जा रहे आंदोलनकारियों का काफिला रामपुर तिराहा पहुंचा और वहां हुई पुलिस कार्रवाई ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया।
हर वर्ष इस दिन रामपुर तिराहा शहीद स्थल पर श्रद्धांजलि दी जाती है। उत्तराखंड सरकार ने भी रामपुर तिराहा शहीद स्थल के पुनर्विकास और संग्रहालय को भव्य रूप देने की घोषणा की है।
2 अक्टूबर 2026 को जब राज्य आंदोलनकारी काला दिवस मनाएंगे, तब उनके सामने केवल 1994 की यादें नहीं होंगी। उनके सामने तीन दशक से अधिक लंबी न्यायिक यात्रा, शहीदों की स्मृति और राज्य आंदोलन के अधूरे सवाल भी होंगे।
अखबार की कटिंग के लिए प्रमुख बॉक्स
रामपुर तिराहा कांड : एक नजर में
घटना: 1-2 अक्टूबर 1994 की रात
स्थान: रामपुर तिराहा, मुजफ्फरनगर
मांग: पृथक उत्तराखंड राज्य
गंतव्य: दिल्ली में प्रदर्शन
मृतक आंदोलनकारी: विभिन्न रिपोर्टों में 7
जांच: सीबीआई
2024: दो सेवानिवृत्त पीएसी जवानों को आजीवन कारावास
2026: फर्जी हथियार बरामदगी मामले में तीन पुलिसकर्मियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष की सजा
हर वर्ष: 2 अक्टूबर को शहीदों की स्मृति में कार्यक्रम और कई आंदोलनकारी संगठनों द्वारा काला दिवस
रिपोर्ट: अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | रुद्रपुर
उत्तर प्रदेश, संपूर्ण भारत, देश-विदेश, खेल, आध्यात्मिक, राजनीतिक और जन सरोकारों की खबरें


Spread the love