✍️ संपादकीय लेखउत्तराखंड की आपदाएं और विस्थापन की त्रासदी?उत्तराखंड की आपदाएं और सरकार का खोखला प्रबंधन

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✍️ संपादकीय लेखउत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि यह भूमि अब लगातार प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रही है। पहाड़ टूट रहे हैं, नदियां उफान मार रही हैं और गांव के गांव खाली हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार पिछले दो दशकों में ही लाखों लोग प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रभावित हुए हैं और हजारों परिवारों को सरकार द्वारा विस्थापित किया गया। चमोली की तपोवन त्रासदी, केदारनाथ की प्रलय, जोशीमठ का धंसाव, रुद्रपुर-बाजपुर की बाढ़ और पिथौरागढ़ की भूस्खलन घटनाएं इस त्रासदी की ताजा मिसालें हैं।सरकार हर आपदा के बाद राहत और पुनर्वास पैकेज की घोषणा करती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकतर विस्थापित परिवार स्थायी पुनर्वास की बाट ही जोहते रह जाते हैं। अस्थायी टेंट और किराए के मकान उनका स्थायी ठिकाना बन जाते हैं। आपदा के बाद जो गांव खाली होते हैं, वे कभी पुनर्जीवित नहीं हो पाते। यही कारण है कि पहाड़ के पलायन की सबसे बड़ी वजह प्राकृतिक आपदाएं बन चुकी हैं।आपदा के मूल कारण भी गंभीर चिंता का विषय हैं। बेतरतीब विकास, अंधाधुंध सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं की होड़, अनियंत्रित खनन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से भू-वैज्ञानिक असंतुलन पैदा हो गया है। पर्वतीय भूभाग में बिना वैज्ञानिक अध्ययन के निर्माण कार्यों ने खतरे को और बढ़ा दिया है।जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल मुआवजा बांटने की राजनीति न करे, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीति बनाए। स्थायी पुनर्वास, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण और पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना ही वास्तविक समाधान है।वरना, उत्तराखंड की तस्वीर लगातार बदलती जाएगी—गांव उजड़ते जाएंगे, शहरों पर दबाव बढ़ेगा और देवभूमि आपदाओं की भूमि बनकर रह जाएगी।


उत्तराखंड की आपदाएं और सरकार का खोखला प्रबंधन

देवभूमि उत्तराखंड, जहां नदियां, पहाड़ और जंगल प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक हैं, आज आपदाओं की भूमि बनकर रह गया है। पिछले एक साल में ही प्रदेश ने ऐसी त्रासदियां झेली हैं जिन्होंने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया। चमोली के देवल ब्लॉक में बादल फटने से गांव तबाह हुए, पिथौरागढ़ और बागेश्वर,में भूस्खलन ने सैकड़ों घर निगल लिए, जबकि काशीपुर और रुद्रपुर में बाढ़ ने शहरी जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया।सरकार दावा करती है कि आपदा प्रबंधन उसकी प्राथमिकता है, लेकिन आंकड़े इसकी पोल खोलते हैं। वर्षभर में हजारों लोग प्रभावित हुए, सैकड़ों घर बह गए और सैकड़ों परिवार विस्थापित हुए। सरकार ने मुआवजा और पुनर्वास की घोषणाएं कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बदतर रहे। विस्थापित परिवार टेंट और किराए के मकानों में जिंदगी काटने को मजबूर हैं। कुछ गांव तो पूरी तरह खाली हो चुके हैं और सरकार अब भी फाइलों और बैठकों में उलझी हुई है।मुख्य सवाल यह है कि आखिर आपदा इतनी विकराल क्यों होती जा रही है? इसका जवाब विकास की अंधी दौड़ में छिपा है। बिना वैज्ञानिक अध्ययन के सड़कें काटी गईं, नदियों को रोका गया, पहाड़ों का सीना चीरकर जलविद्युत परियोजनाएं बनाई गईं। खनन और वनों की अंधाधुंध कटाई ने हालात और बिगाड़ दिए। जलवायु परिवर्तन की मार अलग है। लेकिन इन सब पर अंकुश लगाने के बजाय सरकार चुनावी मंचों पर केवल राहत पैकेज की घोषणाओं से वाहवाही लूटती रही।एक साल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि सरकार केवल आपदा आने पर तस्वीरें खिंचवाने और हवाई सर्वे करने तक सीमित है। न तो स्थायी पुनर्वास की ठोस योजना है और न ही आपदा प्रभावित गांवों के लिए सुरक्षित बसावट की कोई रोडमैप। यह रवैया केवल लापरवाही नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से खिलवाड़ है।आज जरूरत है कि सरकार आईना देखे और अपनी जिम्मेदारी निभाए। आपदा प्रबंधन का मतलब केवल मुआवजा बांटना नहीं, बल्कि जोखिम वाले क्षेत्रों को खाली कर स्थायी पुनर्वास करना है। विकास की परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को अनिवार्य शर्त बनाना होगा। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना होगा और चेतावनी तंत्र को मजबूत करना होगा।उत्तराखंड की जनता यह सवाल पूछ रही है—क्या हम हर साल इसी तरह अपने गांव, अपने घर और अपने परिजनों को खोते रहेंगे? अब समय है कि सरकार दिखावटी राजनीति छोड़कर असली समाधान की ओर कदम बढ़ाए। वरना आने वाली पीढ़ियां केवल खंडहर और उजड़े गांवों की विरासत पाएंगी।मैदानी उत्तराखंड में अतिक्रमण: आपदा का असली कारण उत्तराखंड को भले ही पहाड़ी राज्य कहा जाता हो, लेकिन इसकी मैदानी धरती भी आज उतनी ही त्रासदी का सामना कर रही है जितनी पहाड़। रुद्रपुर, काशीपुर, जसपुर, बाजपुर, हरिद्वार और देहरादून जैसे शहरों में हर साल बाढ़ और जलभराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। सवाल उठता है कि आखिर ये आपदाएं बार-बार क्यों आ रही हैं? जवाब सीधा है—नदी और नालों के तटों पर हुआ अंधाधुंध अतिक्रमण।नदियां सदियों से अपने प्राकृतिक प्रवाह और दायरे में बहती रही हैं। वैज्ञानिक मानकों के अनुसार किसी भी नदी की परिधि कम से कम 100 मीटर तक खाली रहनी चाहिए। यही नियम नहरों और सिंचाई कैनालों के लिए भी है, जहां कम से कम 60 फीट क्षेत्र खुला रखा जाना चाहिए। लेकिन राज्य गठन के बाद मैदानी क्षेत्रों में बाहरी प्रदेशों से आए लोगों ने सबसे पहले नदी-नालों के किनारे कब्जा जमाया। न सिर्फ झुग्गी-झोपड़ियां बनीं, बल्कि आलीशान टी-हाउस, महलनुमा इमारतें और दुकानों की कतारें भी खड़ी कर दी गईं।स्थिति इतनी भयावह है कि आज शहरों में नदियों के तटों पर लगभग 80% अतिक्रमण हो चुका है। नतीजा यह कि बरसात में जब नदी अपना असली रूप दिखाती है, तो उसका पानी शहरों और मोहल्लों में घुस आता है। रुद्रपुर में कल्याणी नदी हो या काशीपुर में ढेला, हर साल इनका पानी बस्तियों में तबाही मचाता है। सिंचाई की नहरें भी अब जल आपूर्ति से ज्यादा कूड़ा और गंदगी ढोने का साधन बन गई हैं।त्रासदी का मुख्य कारण यही है कि सरकार ने अतिक्रमण रोकने के लिए कभी गंभीरता से कार्रवाई नहीं की। राजस्व विभाग, नगर निगम और सिंचाई विभाग की मिलीभगत से नदी-नालों की जमीनें बेच दी गईं या कब्जे के लिए खुली छोड़ दी गईं। राजनीतिक दलों ने वोट बैंक की राजनीति के लिए अवैध बस्तियों को वैध बनाने के वादे किए। नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक जलमार्ग अवरुद्ध हो गए और हर साल बाढ़ की त्रासदी आम लोगों के सिर मढ़ दी गई।

अब सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है?

  1. नदी-नालों की परिधि का निर्धारण और चिन्हांकन – सरकार को तुरंत कार्रवाई करते हुए नदियों और नहरों के दायरे को वैज्ञानिक सर्वे से चिह्नित करना चाहिए।
  2. अतिक्रमण मुक्त अभियान – चाहे झुग्गी हो या महल, नदी-नालों के दायरे में बने सभी निर्माणों को चरणबद्ध तरीके से हटाना होगा।
  3. स्थायी पुनर्वास नीति – झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब परिवारों के लिए शहर के बाहर सुरक्षित आवासीय कॉलोनियां विकसित करनी होंगी, ताकि उन्हें जबरन बेघर न होना पड़े।
  4. नदी-नालों का पुनर्जीवन – केवल अतिक्रमण हटाना ही काफी नहीं, बल्कि इन जलधाराओं की सफाई, गहरीकरण और तटबंधों को मजबूत करना भी जरूरी है।
  5. कठोर कानून और जवाबदेही – जिन अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत से अतिक्रमण हुआ, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
  6. यदि सरकार ने अब भी आंखें मूंदे रखीं, तो मैदानी उत्तराखंड के शहर हर साल डूबते रहेंगे और जनता को बाढ़ के नाम पर मुआवजे और झूठे वादों का सहारा मिलता रहेगा। यह समय है जब राज्य सरकार को कठोर फैसले लेकर विकास और पर्यावरण का संतुलन साधना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियां नदी नहीं, केवल उसकी सूखी रेखाएं और त्रासदी की कहानियां देखेंगी।



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