9 नवंबर 2026 | उत्तराखंड का 26वां स्थापना दिवसअवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुरअध्यक्ष: उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद, उत्तराखंड


9 नवंबर 2026 | उत्तराखंड का 26वां स्थापना दिवस
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
अध्यक्ष: उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद, उत्तराखंड
9 नवंबर 2000 का दिन उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन लंबे संघर्ष, जनआंदोलन, पुलिस की लाठियों, गोलियों, जेलों और 42 आंदोलनकारियों की शहादत के बाद उत्तराखंड देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। आज 26 वर्ष बाद जब हम उत्तराखंड का स्थापना दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल उत्सव और बधाइयों का अवसर नहीं है, बल्कि उन शहीदों, मातृशक्ति, युवाओं, कर्मचारियों, किसानों और आंदोलनकारियों को याद करने का दिन भी है, जिन्होंने अपने वर्तमान की चिंता किए बिना आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ी थी।
अलग राज्य की मांग का ऐतिहासिक संघर्ष
उत्तराखंड की अलग राज्य की मांग कोई अचानक पैदा हुई राजनीतिक मांग नहीं थी। पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां, दुर्गम गांव, रोजगार का अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, पलायन तथा प्रशासनिक उपेक्षा ने अलग राज्य की आवश्यकता को जन्म दिया था। पहाड़ की समस्याओं को लखनऊ में बैठकर समझना और उनका समाधान करना कठिन था। इसी कारण स्थानीय जनता लंबे समय से अलग प्रशासनिक व्यवस्था और अपने अधिकारों की मांग करती रही।
वर्ष 1938 में श्रीनगर गढ़वाल में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की आवश्यकता का समर्थन किया था। 26 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना ने इस आंदोलन को संगठित राजनीतिक दिशा दी। इंद्रमणि बडोनी, काशी सिंह ऐरी, विपिन चंद्र त्रिपाठी, डॉ. नारायण सिंह जंतवाल और अनेक संघर्षशील नेताओं ने अलग राज्य की आवाज को गांव-गांव तक पहुंचाया।
1994 का आंदोलन और 42 शहादतों का दर्द
वर्ष 1994 उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का सबसे निर्णायक और दर्दनाक वर्ष साबित हुआ। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार की आरक्षण संबंधी नीतियों के विरोध के साथ अलग राज्य की मांग ने व्यापक जनआंदोलन का रूप ले लिया। छात्र, युवा, कर्मचारी, महिलाएं, पूर्व सैनिक और आम नागरिक सड़कों पर उतर आए।
1 सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों पर पुलिस की गोली चली। कई आंदोलनकारियों ने अपनी जान गंवाई और अनेक घायल हुए। अगले दिन 2 सितंबर को मसूरी के झूलाघर में पुलिस की गोलीबारी ने आंदोलन को और अधिक आक्रोशित कर दिया। वहां भी आंदोलनकारियों और पुलिसकर्मियों की जान गई।
इसके बाद 2 अक्टूबर 1994 को गांधी जयंती के दिन मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर दिया। दिल्ली में अलग राज्य की मांग को लेकर प्रदर्शन करने जा रहे आंदोलनकारियों को पुलिस ने रोका। गोलीबारी में छह आंदोलनकारियों की मौत हुई। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप सामने आए। यह घटना उत्तराखंड के जनमानस में कभी न मिटने वाला घाव बन गई।
देहरादून, नैनीताल, श्रीनगर, ऋषिकेश और प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों में भी आंदोलनकारियों ने लाठियां खाईं, गिरफ्तारियां दीं और संघर्ष जारी रखा। विभिन्न घटनाओं में 42 आंदोलनकारियों की शहादत को उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
इन शहीदों का बलिदान केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा के शहीद स्मारक आज भी हमें याद दिलाते हैं कि इस राज्य की नींव में कितने परिवारों के आंसू और कितनी माताओं की ममता शामिल है।
ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल कराने का संघर्ष
उत्तराखंड राज्य निर्माण का इतिहास केवल पहाड़ी जिलों के संघर्ष तक सीमित नहीं रहा। राज्य की भौगोलिक और राजनीतिक संरचना में तराई के ऊधमसिंह नगर तथा हरिद्वार को शामिल कराना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती थी।
उस समय एक सुनियोजित विरोध के तहत ऊधमसिंह नगर को प्रस्तावित उत्तराखंड राज्य में शामिल किए जाने का विरोध किया गया। रुद्रपुर सहित तराई क्षेत्र में इस मुद्दे को लेकर आंदोलन और राजनीतिक विरोध की स्थिति बनी। मेरा मानना है कि यदि उस समय तराई के लोगों की आवाज मजबूती से नहीं उठाई जाती, तो ऊधमसिंह नगर के उत्तराखंड में शामिल होने का रास्ता और कठिन हो सकता था।
मैं, अवतार सिंह बिष्ट, उस संघर्ष का प्रत्यक्ष सहभागी रहा हूं। ऊधमसिंह नगर को उत्तराखंड में शामिल कराने के सवाल पर मेरे नाम से दर्ज एफआईआर इस संघर्ष की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है। आंदोलन के दौरान ऊधमसिंह नगर को उत्तराखंड में शामिल किए जाने के विरोध के बीच मैंने अपने साथियों के साथ संघर्ष किया और इस क्षेत्र को प्रस्तावित राज्य का हिस्सा बनाए रखने के लिए आवाज बुलंद की।
मेरे आंदोलनकारी जीवन का यह महत्वपूर्ण पक्ष है कि ऊधमसिंह नगर को उत्तराखंड में शामिल कराने के विरोध से जुड़े घटनाक्रम में मेरे नाम पर एफआईआर दर्ज हुई। मेरे अनुसार इस विषय में मेरे नाम पर दर्ज एफआईआर एकमात्र ऐसी एफआईआर थी, जो इस संघर्ष की विशेष पहचान बनी। मैं इसे व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि तराई की जनता के अधिकारों और उत्तराखंड की भौगोलिक एकता के लिए किए गए संघर्ष का प्रमाण मानता हूं।
इसी तरह हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल कराने का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। रुद्रपुर में हरिद्वार को प्रस्तावित उत्तराखंड राज्य में शामिल किए जाने के विरोध के दौरान स्वर्गीय जेपी पांडे के नाम पर एफआईआर दर्ज हुई थी। जेपी पांडे ने भी इस विषय पर संघर्ष किया। उनके प्रयासों और आंदोलनकारियों की एकजुटता ने हरिद्वार को उत्तराखंड का हिस्सा बनाए रखने की लड़ाई को मजबूती दी।
आज जब हम हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को उत्तराखंड के अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं, तो हमें उन लोगों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने इन क्षेत्रों को राज्य से जोड़कर रखने के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाए। राज्य निर्माण में केवल बड़े मंचों पर भाषण देने वालों का योगदान नहीं था, बल्कि उन लोगों का भी योगदान था जिनके नाम पुलिस की एफआईआर और संघर्ष के दस्तावेजों में दर्ज हुए।
आंदोलन के प्रमुख नेताओं और साथियों का योगदान
मैंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन में काशी सिंह ऐरी, इंद्रमणि बडोनी, विपिन चंद्र त्रिपाठी और डॉ. नारायण सिंह जंतवाल जैसे नेताओं के साथ संघर्ष के विभिन्न चरणों में काम किया। आंदोलन के दौरान 24 घंटे, 36 घंटे और 72 घंटे के चक्काजाम, नागला रेलवे लाइन पर रेल रोकने, दिल्ली में फिरोजशाह कोटला से इंडिया गेट और संसद तक मार्च जैसे अनेक कार्यक्रमों में आंदोलनकारियों ने भाग लिया।
यह आंदोलन किसी एक संगठन, राजनीतिक दल या व्यक्ति का आंदोलन नहीं था। इसमें हर वर्ग और हर क्षेत्र के लोगों की भागीदारी थी। मातृशक्ति की भूमिका विशेष रूप से ऐतिहासिक रही। पहाड़ की महिलाओं ने अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ आंदोलन की कमान संभाली। युवाओं ने भविष्य की चिंता छोड़कर जेल यात्राएं कीं और कर्मचारियों ने अपनी नौकरियों की परवाह किए बिना आंदोलन का साथ दिया।
26 साल बाद भी अधूरे हैं शहीदों के सपने
आज उत्तराखंड को बने 26 वर्ष हो चुके हैं। राज्य ने शिक्षा, सड़क, पर्यटन, उद्योग, बिजली, खेल और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। ऊधमसिंह नगर का औद्योगिक विकास और सिडकुल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार भी महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य निर्माण के मूल उद्देश्य पूरे हुए?
आज भी पहाड़ से पलायन जारी है। अनेक गांव खाली हो चुके हैं। युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सड़क और संचार की चुनौतियां बनी हुई हैं। राज्य आंदोलनकारियों के चिह्नीकरण, उनके आश्रितों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण, सम्मानजनक पेंशन और अन्य मांगों पर भी सरकार को गंभीरता से काम करना चाहिए।
गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सपना भी आंदोलन की प्रमुख भावनाओं में शामिल रहा है। राज्य के संसाधनों पर यहां के लोगों का अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए। जल, जंगल, जमीन और रोजगार के सवालों पर ऐसी नीतियां बननी चाहिए, जिनसे पहाड़ और तराई दोनों क्षेत्रों का संतुलित विकास हो सके।
राज्य निर्माण आंदोलनकारियों को केवल स्थापना दिवस पर सम्मानित करने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। उनके त्याग का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब उनके परिवारों को न्याय, युवाओं को रोजगार और पहाड़ के गांवों को बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी।
शहीदों को नमन, उत्तराखंडवासियों को स्थापना दिवस की शुभकामनाएं
9 नवंबर का दिन हमारे लिए गर्व, सम्मान और आत्ममंथन का दिन है। हमें उन 42 अमर शहीदों को नमन करना चाहिए, जिन्होंने उत्तराखंड के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उन सभी आंदोलनकारियों, मातृशक्ति, युवाओं, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों का भी अभिनंदन करना चाहिए, जिनके संघर्ष से उत्तराखंड का सपना साकार हुआ।
मेरी प्रदेश सरकार से अपील है कि राज्य आंदोलन के इतिहास को पाठ्यक्रमों और सरकारी अभिलेखों में उचित स्थान दिया जाए। शहीदों के नाम और उनके बलिदान का पूरा विवरण संरक्षित किया जाए तथा उन आंदोलनकारियों को भी पहचान और सम्मान मिले, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर राज्य निर्माण की लड़ाई लड़ी।
आइए, इस स्थापना दिवस पर हम संकल्प लें कि उत्तराखंड को केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी मजबूत बनाएंगे। पहाड़ और तराई के बीच एकता, भाईचारा और विकास की भावना को आगे बढ़ाएंगे।
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, 42 शहादतों, लाखों लोगों के संघर्ष और हमारी अस्मिता का प्रतीक है। इस राज्य की एकता, अखंडता और स्वाभिमान की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है।
समस्त उत्तराखंडवासियों को 9 नवंबर राज्य स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
शहीदों को शत-शत नमन।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन अमर रहे।
जय उत्तराखंड! जय हिंद!
अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद, उत्तराखंड

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