

धामी सरकार का अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियान लगातार जारी है। देहरादून और उधमसिंह नगर के गदरपुर में प्रशासन ने एक-एक अवैध मजार की संरचना को ध्वस्त कर दिया। सरकार के अनुसार यह कार्रवाई सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने, नोटिस की प्रक्रिया पूरी करने और नियमों के अनुपालन के तहत की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट संदेश है—उत्तराखंड में सरकारी भूमि पर कब्जे का खेल नहीं चलेगा। आंकड़ों के मुताबिक अब तक राज्यभर में 570 अवैध मजारें हटाई जा चुकी हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
प्रशासनिक पक्ष अपनी जगह है—नोटिस, समय-सीमा, जवाब न मिलने पर कार्रवाई। देहरादून में हरिद्वार रोड पर सड़क के बीच बनी अवैध संरचना हटाने की कार्रवाई भी इसी दायरे में बताई गई। यातायात बाधा, सार्वजनिक मार्ग और कानून—सब तर्क मौजूद हैं।
लेकिन यहीं से सवाल खड़ा होता है बराबरी और न्याय का।
राज्य के कई हिस्सों में हजारों हिंदू परिवार ऐसे भी हैं, जो 30–40 वर्षों से अपने आशियाने बनाकर रह रहे थे। अचानक उन पर भी बुलडोज़र चला दिया गया। एक अवैध मजार के बदले यदि सौ घर उजाड़ दिए जाएं, तो क्या इसे समान कार्रवाई कहा जाएगा? क्या वर्षों से बसे गरीब परिवारों के पुनर्वास, वैकल्पिक व्यवस्था और मानवीय पक्ष पर सरकार की नीति उतनी ही सख्त और स्पष्ट है जितनी बुलडोज़र चलाने में?
सरकार यदि अतिक्रमण हटाने को लेकर जीरो टॉलरेंस की बात करती है, तो यह भी ज़रूरी है कि वह जीरो डिस्क्रिमिनेशन पर उतनी ही दृढ़ दिखे। कानून सब पर समान रूप से लागू हो—यह लोकतंत्र की बुनियाद है। लेकिन समानता सिर्फ ढांचा गिराने में नहीं, बल्कि पुनर्वास, संवेदनशीलता और न्याय में भी दिखनी चाहिए।
यह सवाल आज सड़क पर है, समाज में है और जनमानस के भीतर भी—
क्या उत्तराखंड में बुलडोज़र की धार सबके लिए एक-सी है, या कहीं न कहीं तराजू का पलड़ा भारी-हल्का हो रहा है?
सरकार को चाहिए कि वह कार्रवाई के साथ-साथ विश्वास भी कायम करे, ताकि अतिक्रमण हटाने का अभियान न्याय का प्रतीक बने, न कि असमानता का।




