

रुद्रपुर,उत्तराखंड बारिश तो बहाना है। असलियत यह है कि उत्तराखंड का पहाड़ हर साल विकास और आस्था के बीच मारा जाता है। ताजा खबर केदारनाथ यात्रा मार्ग की है, जहां सोनप्रयाग-गौरीकुण्ड के बीच मुनकटिया में रास्ता ध्वस्त हो गया। 40 से ज्यादा श्रद्धालुओं को एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने रेस्क्यू किया। मगर यह कोई नई बात नहीं। पिछले दस दिनों में दूसरी बार केदारनाथ यात्रा रोकनी पड़ी। सवाल यह है — आखिर कब तक?

संवाददाता,शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स /उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट
उत्तराखंड की यह कहानी सिर्फ लैंड स्लाइड या प्राकृतिक आपदाओं की नहीं है। यह कहानी है विकास के नाम पर किए जा रहे सुनियोजित विध्वंस की। राज्य गठन के बाद उम्मीद थी कि लोग राहत की सांस लेंगे, पहाड़ बचे रहेंगे, नौजवानों को गांव छोड़कर बाहर नहीं भागना पड़ेगा। मगर नतीजा उलटा निकला। विकास पहाड़ों पर चढ़ाई करने वाली सेना की तरह आया — डोजर, विस्फोट, सीमेंट, सरिया और ठेकेदारों के काफिलों के साथ।
कहते हैं, पहाड़ भगवान के घर हैं। मगर अब पहाड़ इन्वेस्टर्स के फार्म हाउस, रिज़ॉर्ट्स, बड़े-बड़े होटल्स और रेस्टोरेंट्स के प्लॉट्स बनते जा रहे हैं। देहरादून, ऋषिकेश, मसूरी, नैनीताल, पौड़ी, अल्मोड़ा — हर जगह रीयल एस्टेट का तामझाम है। राजस्थान, बिहार, दिल्ली, हरियाणा तक के इन्वेस्टर्स यहां आकर जमीनें खरीद रहे हैं। मंत्री, विधायक, पार्षद, प्रधान, जिला पंचायत सदस्य, बीडीसी मेंबर — सबकी चांदी कट रही है। बाहर से आई कंपनियों को खुलेआम जमीनें दी जा रही हैं। ठेका-पट्टा सिस्टम ने उत्तराखंड के संसाधनों को लूट का अड्डा बना डाला है।
जहां लाखों रुपये के मशीनी काम होते हैं, वहीं गरीब पहाड़ी को मलबा हटाने के लिए झाड़ू, फावड़ा और तसला थमा दिया जाता है। विकास का यह मॉडल, पहाड़ों की बर्बादी का मॉडल है।
पिछले साल, 31 जुलाई 2024 को भी केदारनाथ यात्रा मार्ग पर आपदा आई थी। सोनप्रयाग-गौरीकुण्ड के बीच 6 किमी हाईवे जगह-जगह ध्वस्त हो गया। हजारों यात्री फंसे थे। रेस्क्यू ऑपरेशन चला। लाखों-करोड़ों की लागत से सड़कें फिर बनीं। और इस साल फिर वही कहर। सवाल है — जो सड़कें साल भर भी नहीं टिकतीं, क्या वह विकास है या ठेकेदारों के लिए बोनस सीजन?
मौत के आंकड़े, जो सरकारें भूल गईं
- उत्तराखंड राज्य गठन (2000) के बाद से आज तक भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ जैसी आपदाओं में लगभग 9,500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। (राज्य आपदा प्रबंधन विभाग, विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स)
- अकेले 2013 की केदारनाथ त्रासदी में ही लगभग 4,000 लोग मारे गए या लापता हुए।
- 2023-24 में सिर्फ मानसून सीजन में 130+ लोगों की मौत हुई।
- धार्मिक यात्राओं (चारधाम, हेमकुंड, कावड़, कुमाऊं के तीर्थ) में हर साल 300-400 लोगों की जान जाती है — कभी हृदयाघात, कभी दुर्घटना, कभी आपदा।
- उत्तराखंड में पलायन — 2018 तक की सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 16,793 गांवों में से करीब 1,053 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
- रोजगार की तलाश में लगभग 20 लाख युवा राज्य से बाहर काम कर रहे हैं।
- स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल — उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ में दर्जनों PHC और CHC खाली पड़ी हैं। डॉक्टर नहीं, दवाएं नहीं।
- शिक्षा — दूरदराज के गांवों में 400 से ज्यादा स्कूल बंद हुए पिछले 10 साल में।
धर्म के नाम पर बलि का बकरा
धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक पर्यटन को सरकारें सिर्फ आंकड़ों की तरह बेच रही हैं। चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालु बुलाए जाते हैं। मगर सड़कें वही जर्जर, पहाड़ वही कमजोर। ज्यादा भीड़ का सीधा मतलब — ज्यादा हादसे, ज्यादा मौतें। बड़ी-बड़ी टनल्स, चौड़ी सड़कें, हेलीपैड — सब पर हजारों करोड़ फूंके जा रहे हैं। मगर हर साल केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री के रास्तों पर लैंडस्लाइड और मौतें जारी हैं।
सवाल ये भी है — चारधाम यात्रा सिर्फ श्रद्धा है या सरकारों की कमाई का नया मॉडल?
लाखों श्रद्धालु आएं, उनके खर्च पर सरकारों का रेवेन्यू बढ़े, होटल वालों की कमाई बढ़े, मगर आम पहाड़ी आदमी को क्या मिला? सिर्फ टूटी सड़कें, मलबा, पहाड़ों से गिरते पत्थर और घरों में घुसता पानी।
विकास या सुनियोजित लूट?
सरकारें हर बार दावा करती हैं कि “हम विकास कर रहे हैं।” मगर विकास के नाम पर सिर्फ पहाड़ों की खुदाई हो रही है। टनल बन रही है, सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है, मगर वही सड़कें अगले साल फिर बह जाती हैं। क्यों? क्योंकि ठेका-पट्टा मॉडल में सस्ता काम, घटिया निर्माण और जल्दी पेमेंट का खेल चलता है।
आज उत्तराखंड की असली तस्वीर यह है — पहाड़ लुट रहे हैं, लोग मर रहे हैं, नौजवान पलायन कर रहा है, और नेताओं के काफिले लंबी-लंबी गाड़ियों में घूम रहे हैं।
जिन प्रधानों, पार्षदों, बीडीसी मेंबरों को गांवों की चिंता करनी चाहिए, वो भी विकास यात्रा के नाम पर सिर्फ सेमिनार, गोष्ठी और सरकारी टूर पर खर्च हो रहे हैं। मंत्री-विधायक तो और बड़े खेल में हैं। जमीनों के सौदे, होटल परमिशन, माइनिंग, टेंडर — सबमें हिस्सेदारी।
अगर ग्राम पंचायत सदस्य पांच साल में ही लाखों की गाड़ी बदल सकता है, तो सोचिए विधायक और मंत्री का क्या स्केल होगा। सवाल उठाना ही पड़ेगा — “ये पैसा कहां से आता है?”
एक और आंदोलन की जरूरत
उत्तराखंड आंदोलन ने हमें राज्य दिया, मगर असली मकसद था — गांव बचे रहें, लोग बचे रहें, संस्कृति बचे। आज उसी पहाड़ को बेचा जा रहा है। सरकारों को पूछने वाला कोई नहीं। मीडिया में भी बस “चारधाम यात्रा पर भक्तों की भारी भीड़” जैसे हेडलाइन ही छपती हैं, मौतों पर कोई चर्चा नहीं होती।
अब एक और आंदोलन चाहिए — सिस्टम को जगाने के लिए।
- ऐसा आंदोलन जो सवाल पूछे — कौन लूट रहा है पहाड़?
- ऐसा आंदोलन जो कहे — पहाड़ों की खुदाई बंद करो।
- ऐसा आंदोलन जो पूछे — धर्म के नाम पर बलि का बकरा क्यों बना रहे हो जनता को?
- ऐसा आंदोलन जो कहे — पहाड़ के विकास पर पहाड़ के लोगों का हक हो।
क्योंकि अगर अभी भी नहीं चेते, तो अगले साल फिर कोई सोनप्रयाग-गौरीकुण्ड टूटेगा, फिर श्रद्धालु मलबे में दबेंगे, फिर लाशें गिनी जाएंगी, और सरकार फिर कहेगी — “सब कंट्रोल में है।”
पर पहाड़ तो हर साल टूटता जा रहा है।
और पहाड़ी आदमी हर साल और अकेला होता जा रहा है।
उत्तराखंड के लिए यह लड़ाई ज़िंदा रखना जरूरी है। नहीं तो एक दिन ये देवभूमि सिर्फ इन्वेस्टर्स की रिज़ॉर्ट-भूमि बनकर रह जाएगी।
क्या आप तैयार हैं फिर से आवाज़ उठाने के लिए?




