

बुरी नज़र या बहकता बचपन: जब पढ़ाई छूटे और भविष्य खतरे में पड़ जाए

आज समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ कई होनहार बच्चे अचानक पढ़ाई से मन हटाने लगते हैं। जो छात्र कल तक अनुशासित थे, वही आज जिद्दी हो जाते हैं, माँ–बाप की बात नहीं मानते, गलत संगत में पड़ जाते हैं और धीरे–धीरे नशे जैसी खतरनाक आदतों की ओर बढ़ने लगते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इसे लोग “नज़र लगना” भी कहते हैं। अचानक व्यवहार में यह बदलाव, बिना किसी ठोस कारण के, माता–पिता को अंदर तक झकझोर देता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में इसे नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नज़र का प्रभाव बताया जाता है। वहीं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह दौर किशोरावस्था, भावनात्मक असंतुलन, सोशल मीडिया का दबाव और गलत मित्र मंडली का भी हो सकता है। लेकिन परिणाम एक ही होता है—बच्चे का भविष्य जोखिम में पड़ जाता है।
संपादकीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि केवल इसे अंधविश्वास कहकर नज़रअंदाज़ करना भी खतरनाक है और केवल टोटकों पर निर्भर रहना भी पर्याप्त नहीं। आवश्यक है कि माता–पिता बच्चों को समय दें, संवाद बढ़ाएं, उनकी गतिविधियों पर नजर रखें और ज़रूरत पड़ने पर काउंसलिंग तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन—दोनों का संतुलित सहारा लें। तभी भटकता बचपन सही राह पर लौट सकता है।
आज के तेज़ रफ्तार, प्रतिस्पर्धात्मक और तनावपूर्ण जीवन में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ अदृश्य शक्तियों के प्रभाव को भी गहराई से महसूस कर रहा है। अचानक बिगड़ता स्वास्थ्य, व्यापार में गिरावट, घर-परिवार में कलह, बच्चों का बार-बार बीमार होना, मानसिक अवसाद, नींद न आना और निराशा—ये सभी समस्याएँ अब आम होती जा रही हैं। ज्योतिष, धर्मशास्त्र और लोक-मान्यताओं के अनुसार इन सबके पीछे “बुरी नज़र” और नकारात्मक ऊर्जा को भी एक बड़ा कारण माना जाता है।
क्या वास्तव में होती है बुरी नज़र?
भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि संसार केवल दृश्य पदार्थों से नहीं बना है, बल्कि ऊर्जा, स्पंदन और भावनाओं का भी एक विशाल संसार हमारे चारों ओर व्याप्त है। हर मनुष्य अपने विचारों, दृष्टि और भावनाओं से सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा बाहर प्रसारित करता है। जब कोई व्यक्ति ईर्ष्या, द्वेष या लालसा से किसी की खुशी, सफलता, सुंदरता या उन्नति को देखता है, तो उसकी नकारात्मक ऊर्जा सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। यही प्रभाव बुरी नज़र कहलाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बुरी नज़र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक अदृश्य टकराव है, जहाँ एक व्यक्ति की अशुभ भावना दूसरे की शुभ ऊर्जा को क्षीण कर देती है।
बुरी नज़र के तीन प्रमुख प्रकार
धार्मिक ग्रंथों, ज्योतिष शास्त्र और लोक मान्यताओं में बुरी नज़र को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है—
- अचेतन बुरी नज़र – जब कोई व्यक्ति बिना इरादे के किसी की प्रशंसा या आकर्षण में नकारात्मक ऊर्जा छोड़ देता है।
- सचेत बुरी नज़र – जब कोई व्यक्ति जानबूझकर ईर्ष्या, जलन या द्वेष से देखता है।
- अदृश्य बुरी नज़र – जिसे तांत्रिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है, जिसमें व्यक्ति की मानसिक तरंगें दूर से ही हानि पहुँचाती हैं।
कैसे पहचानें कि बुरी नज़र लग चुकी है?
यदि जीवन में बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार ये समस्याएँ उत्पन्न हो रही हों, तो इसे बुरी नज़र का संकेत माना जाता है—
- बार-बार सिर दर्द, घबराहट, घुटन और बेचैनी
- नींद का पूरी तरह न आना
- अचानक स्वास्थ्य बिगड़ना
- काम में असफलता और बार-बार नुकसान
- घर में बिना कारण झगड़े
- बच्चों का अचानक रोना, डरना या बीमार पड़ना
- धन का टिककर न रहना
- पूजा-पाठ में मन न लगना
विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि जिन लोगों की कुंडली में लग्नेश और चंद्रमा राहु से पीड़ित होते हैं, उन पर बुरी नज़र का प्रभाव अधिक पड़ता है।
व्यापार और धन पर बुरी नज़र का प्रभाव
आज व्यापार जगत में यह धारणा और अधिक प्रबल हो गई है कि जब बिना किसी आर्थिक कारण के अचानक नुकसान होने लगे, ग्राहक घट जाएँ, कानूनी अड़चनें बढ़ जाएँ, तब इसके पीछे नकारात्मक ऊर्जा भी एक कारण हो सकती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दुकानों, फैक्ट्रियों और घरों के बाहर अब भी नींबू-मिर्च, काला धागा, हनुमान ध्वज और स्वस्तिक चिह्न देखने को मिलते हैं।
बच्चों पर बुरी नज़र का प्रभाव
धार्मिक मान्यताओं में बच्चों को सबसे अधिक संवेदनशील माना गया है। बच्चों के लगातार बीमार होने, डरने, रात में चौंकने, दूध न पीने या अचानक शरीर का कमजोर हो जाना—इन सबको भी नज़र दोष से जोड़ा जाता है। इसलिए जन्म से ही बच्चों को काजल लगाना, काला धागा बांधना और रुद्राक्ष पहनाना आज भी प्रचलित है।
हनुमान जी: नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध सबसे बड़ा कवच
जब बुरी नज़र, ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जा के निवारण की बात आती है, तो भगवान हनुमान को सबसे शक्तिशाली देवता माना जाता है। हनुमान जी को संकट-मोचन, नकारात्मक शक्तियों के नाशक, और भय से रक्षा करने वाला देव कहा गया है।
हनुमान भक्ति क्यों मानी जाती है सबसे प्रभावशाली?
हनुमान जी स्वयं वायु पुत्र हैं, यानी वे ऊर्जा के देवता हैं। वे अशुभ शक्तियों, प्रेत बाधा, तंत्र-मंत्र, ग्रह बाधा और नज़र दोष—हर प्रकार की नकारात्मकता को नष्ट करने की अद्भुत शक्ति रखते हैं।
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा से—
- हनुमान चालीसा
- बजरंग बाण
- सुंदरकांड
- हनुमान रक्षा कवच
का नियमित पाठ करता है, उसके जीवन से बुरी नज़र स्वतः ही दूर हो जाती है।
हनुमान जी के प्रमुख मंत्र जो बुरी नज़र से रक्षा करते हैं
1.
ॐ हं हनुमते नमः
यह सबसे सरल और शक्तिशाली मंत्र है। इसके नियमित जाप से भय, रोग, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक तनाव समाप्त होता है।
2.
ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा
यह मंत्र रोग, शत्रु बाधा और मानसिक पीड़ा से मुक्ति दिलाता है।
3.
ॐ ऐं भ्रीम हनुमते श्री रामदूताय नमः
यह बीज मंत्र आत्मबल, शारीरिक शक्ति और रक्षा प्रदान करता है।
4.
ॐ हं हनुमते रक्ष-रक्ष स्वाहा
यह मंत्र विशेष रूप से सुरक्षा कवच के रूप में प्रयोग किया जाता है।
मंगलवार और शनिवार को इन मंत्रों का 108 बार जाप करना विशेष फलदायी माना गया है।
ज्योतिषीय उपाय जो नज़र दोष से बचाते हैं
- बुधवार को सप्त धान्य का दान
- राहु यंत्र की स्थापना
- नौ मुखी रुद्राक्ष धारण
- काले धागे का प्रयोग
- घर में हनुमान जी का चित्र
- शुद्ध देसी घी का दीपक प्रतिदिन जलाना
बुरी नज़र उतारने के पारंपरिक टोटके
- एक रोटी केवल एक तरफ से सेंककर, उस पर तेल, नमक और लाल मिर्च डालकर सात बार सिर से घुमाकर चौराहे पर रखना
- काली मिर्च और सरसों के दाने जलाना
- बच्चों के ऊपर नमक और मिर्च घुमाकर अग्नि में डालना
- पीली कौड़ी या मोती चांद का लॉकेट पहनाना
आधुनिक जीवन में बुरी नज़र: विज्ञान और आध्यात्म का संतुलन
आधुनिक विज्ञान भले ही सीधे-सीधे बुरी नज़र को प्रमाणित न करे, लेकिन मनोविज्ञान यह मानता है कि नकारात्मक सोच और भय व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क और निर्णय क्षमता को गहराई से प्रभावित करते हैं। जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि उस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, तो उसका अवचेतन मन भी उसी दिशा में काम करने लगता है।
इसीलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि आध्यात्मिक उपायों का सबसे बड़ा लाभ मानसिक शांति और आत्मविश्वास की पुनः स्थापना है—जो किसी भी बीमारी, असफलता और भय का सबसे बड़ा उपचार है।
समाज में बढ़ती आध्यात्मिक चेतना
आज जब समाज तनाव, हिंसा, प्रतियोगिता और अवसाद से जूझ रहा है, तब लोग पुनः पूजा, मंत्र, साधना और सनातन परंपरा की ओर लौट रहे हैं। हनुमान चालीसा, सुंदरकांड पाठ, राम नाम




