

हनुमान मंत्र से नजर उतारने की परंपरा

भारतीय सनातन परंपरा में हनुमान जी को संकटमोचक और नकारात्मक शक्तियों के नाशक के रूप में माना जाता है। जब किसी व्यक्ति, विशेषकर बच्चे, पर बुरी नजर या नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव महसूस किया जाता है, तब हनुमान जी के मंत्रों का जप अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया मंत्र जप वातावरण को शुद्ध करता है और मन को भी मजबूत बनाता है।
नजर उतारने के लिए सामान्यतः मंगलवार या शनिवार को दीपक जलाकर हनुमान जी के सामने “ॐ नमो भगवते हनुमते नमः” या “ॐ हनुमते नमः” मंत्र का 11, 21 या 108 बार जप किया जाता है। इसके बाद व्यक्ति के ऊपर से 7 बार सूखा लाल मिर्च या राई घुमाकर अग्नि में अर्पित की जाती है। यह क्रिया श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाए तो मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।
हनुमान जी की कृपा से भय, संकट और नकारात्मकता दूर होने की भावनात्मक अनुभूति मिलती है।
आज का समाज एक ऐसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है जहाँ बच्चों और किशोरों का मानसिक, सामाजिक और नैतिक संतुलन तेजी से डगमगा रहा है। माता–पिता, शिक्षक और समाज—तीनों इस चिंता से जूझ रहे हैं कि आखिर क्यों वह बच्चा, जो कल तक पढ़ाई में अव्वल था, आज अचानक पढ़ने से कतराने लगा? क्यों वह आज जिद्दी हो गया, माँ–बाप की बातें अनसुनी करने लगा, गलत संगत में पड़ गया और धीरे–धीरे नशे जैसी घातक आदतों की ओर बढ़ने लगा? ग्रामीण क्षेत्रों में इसे अक्सर “बुरी नज़र” या “नकारात्मक ऊर्जा” का प्रभाव कहा जाता है, तो शहरी समाज इसे बदलते समय का दुष्परिणाम मानता है। लेकिन सच यह है कि कारण चाहे जो भी हों, परिणाम एक ही है—बच्चे का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।
अचानक व्यवहार में बदलाव: पहला खतरनाक संकेत
जब कोई बच्चा अचानक चिड़चिड़ा हो जाए, बात–बात पर गुस्सा करने लगे, पढ़ाई से दूर भागने लगे, स्कूल से अनुपस्थित रहने लगे, अपने कमरे में अकेला रहने लगे या माता–पिता से दूरी बनाने लगे—तो यह केवल “बचपना” नहीं होता। यह मन के भीतर चल रही उथल–पुथल का संकेत होता है। कई बार माता–पिता इसे उम्र का असर मानकर टाल देते हैं, लेकिन यही अनदेखी आगे चलकर बड़ी दुर्घटना में बदल जाती है।
ग्रामीण इलाकों में ऐसे बदलाव को अक्सर “नज़र लग जाना” कहा जाता है। लोग मानते हैं कि किसी की बुरी दृष्टि, ईर्ष्या या तांत्रिक प्रभाव से बच्चा भटक गया है। वहीं शहरों में इसे मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और बिगड़ते माहौल से जोड़ा जाता है। दोनों ही दृष्टिकोणों में कुछ न कुछ सच्चाई है, पर समस्या का हल केवल एक पक्ष से नहीं निकल सकता।
धार्मिक मान्यताएँ और नकारात्मक ऊर्जा का विश्वास
भारतीय समाज में बुरी नज़र और नकारात्मक ऊर्जा की अवधारणा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति जलन, ईर्ष्या या दुर्भावना से किसी को देखता है, तो उसकी नकारात्मक ऊर्जा दूसरे पर असर डालती है। बच्चों को विशेष रूप से इस प्रभाव का शिकार माना जाता है, क्योंकि उनका मन कोमल और संवेदनशील होता है।
इसीलिए आज भी घरों में नींबू–मिर्ची, काला धागा, नजर का टीका और धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा लिया जाता है। कई परिवार मंदिरों में पूजा करवाते हैं, हवन कराते हैं और साधु–संतों से आशीर्वाद लेते हैं। इन सबका एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है—माता–पिता को यह भरोसा मिलता है कि उन्होंने बच्चे के लिए कुछ सकारात्मक किया है और बच्चे को भी मानसिक संबल मिलता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: असली जड़ यहीं छिपी है
यदि हम वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो किशोरावस्था अपने आप में एक बड़ा संक्रमणकाल है। इस दौरान हार्मोनल बदलाव, भावनात्मक अस्थिरता, आत्म–सम्मान की चिंता, प्यार–मोहब्बत के आकर्षण, साथियों का प्रभाव और पहचान की तलाश—ये सभी मिलकर बच्चे के मन में तूफान पैदा कर देते हैं।
आज के समय में इस पर सोशल मीडिया ने आग में घी डालने का काम किया है। इंस्टाग्राम, रील्स, ऑनलाइन गेम्स, वर्चुअल दोस्ती और दिखावटी जीवन—बच्चे इन्हें ही अपनी असली दुनिया मान बैठते हैं। पढ़ाई उन्हें बोझ लगने लगती है। जब उम्मीदों का बोझ और प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ता है तो कई बच्चे तनाव, अवसाद और अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं।
यहीं से गलत संगत की शुरुआत होती है। कुछ दोस्त “भाग चलो”, “मस्ती करो”, “नशा करके देखो”—जैसे सुझाव देते हैं और बच्चा बिना यह समझे कि वह किस दलदल में उतर रहा है, उसी रास्ते पर चल पड़ता है।
नशे की गिरफ्त: भविष्य की सबसे बड़ी दुश्मन
आज नशा केवल शराब तक सीमित नहीं रहा। गांजा, स्मैक, ब्राउन शुगर, इंजेक्शन और नशीली दवाइयाँ—सब कुछ बहुत आसानी से उपलब्ध है। कई बार बच्चे “शौक” में शुरुआत करते हैं और कब यह शौक लत बन जाता है, उन्हें पता ही नहीं चलता।
नशा बच्चे की सोच, शरीर और भविष्य तीनों को खोखला कर देता है। पढ़ाई छूट जाती है, परिवार से दूरी बढ़ जाती है, चोरी–छिपे पैसे की जरूरत पड़ने लगती है, और कई बार अपराध की राह भी यहीं से शुरू होती है। माता–पिता तब तक कुछ समझ ही नहीं पाते, जब तक बहुत देर नहीं हो जाती।
बुरी नज़र बनाम सामाजिक सच: टकराव नहीं, संतुलन जरूरी
संपादकीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि केवल इसे अंधविश्वास कहकर पूरी तरह नकार देना भी गलत है और केवल टोटकों, धूप–दीप और झाड़–फूंक पर निर्भर रहना भी खतरनाक है। समाज को इन दोनों के बीच संतुलित सोच अपनानी होगी।
यदि कोई परिवार यह मानता है कि बच्चे पर बुरी नज़र का असर है और वह उसके लिए पूजा–पाठ करता है—तो इसमें कोई बुराई नहीं, बशर्ते इसके साथ–साथ वह बच्चे की मानसिक स्थिति को भी समझे, उसके व्यवहार पर नजर रखे और आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद भी ले।
माता–पिता की भूमिका: डाँट नहीं, संवाद जरूरी
अक्सर देखा जाता है कि जैसे ही बच्चे का व्यवहार बिगड़ता है, माता–पिता डाँट–फटकार, ताने और सख्ती का रास्ता अपनाते हैं। “हमारे जमाने में ऐसा नहीं होता था”, “तुमने हमारी नाक कटवा दी”—जैसे शब्द बच्चे को और भी अंदर की ओर धकेल देते हैं।
सच्चाई यह है कि आज का बच्चा डाँट से नहीं, संवाद से सुधरता है। उसे सुने जाने की जरूरत है, समझे जाने की जरूरत है। अगर वह किसी बात से परेशान है, किसी दोस्त से प्रभावित है या किसी डर में जी रहा है—तो उसे खुलकर कहने का अवसर मिलना चाहिए।
माता–पिता को चाहिए कि वे रोज बच्चों से बात करें, उनके स्कूल, दोस्तों और ऑनलाइन गतिविधियों में रुचि लें, लेकिन जासूस बनकर नहीं—एक मित्र की तरह।
शिक्षकों और स्कूलों की जिम्मेदारी
बच्चे की दुनिया केवल घर तक सीमित नहीं होती। स्कूल उसका दूसरा घर होता है। शिक्षक सबसे पहले यह पहचान सकते हैं कि कोई बच्चा पढ़ाई से हट रहा है, उदास रहने लगा है या अचानक उसकी परफॉर्मेंस गिरने लगी है।
स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, जीवन–कौशल (Life Skills) की पढ़ाई, नशा–मुक्ति पर जागरूकता कार्यक्रम और माता–पिता के साथ संवाद—ये सभी कदम बेहद जरूरी हैं। शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों को मानसिक और नैतिक रूप से भी मजबूत बनाना होगा।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन: मन को स्थिर करने का सहारा
जहाँ चिकित्सा और काउंसलिंग मन के रोगों का उपचार करती है, वहीं आध्यात्मिकता मन को स्थिर करने का सहारा देती है। ध्यान, योग, प्रार्थना और सत्संग—ये सभी बच्चे की आंतरिक शक्ति को जाग्रत करते हैं।
जब बच्चा खुद को अकेला, असफल या भटका हुआ महसूस करता है, तब आध्यात्मिक मार्गदर्शन उसे यह एहसास कराता है कि वह अकेला नहीं है, उसके जीवन का उद्देश्य है और वह फिर से सही राह पर लौट सकता है।
समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। जब कोई बच्चा नशे में जाता है, अपराध की ओर बढ़ता है या पढ़ाई छोड़ देता है—तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए चुप रहना भी एक प्रकार का अपराध है।
पड़ोसी, रिश्तेदार, मोहल्ला, पंचायत, सामाजिक संगठन—सभी को सजग होना होगा। अगर कहीं कोई बच्चा भटकता नजर आए, तो उसे तिरस्कार नहीं, संरक्षण और मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
समाधान का रास्ता: डर नहीं, भरोसा
बुरी नज़र हो या मानसिक दबाव, नशा हो या गलत संगत—हर हाल में समाधान एक ही है:
समय, संवाद, समझदारी और सामूहिक प्रयास।
बच्चों को डर के नहीं, भरोसे के माहौल में बड़ा होने दीजिए। उन्हें गलती करने का अधिकार दीजिए, लेकिन उस गलती से सीखने का अवसर भी दीजिए। उन्हें यह महसूस होने दीजिए कि चाहे वे कितने भी भटक जाएँ, उनके अपने—माता–पिता और समाज—आज भी उनके साथ खड़े हैं।
निष्कर्ष: भटकता बचपन, सँभलता भविष्य
आज जरूरत इस बात की है कि हम “बुरी नज़र” और “आधुनिक दबाव” की बहस में उलझने के बजाय बच्चे के दर्द को समझें। क्योंकि जब एक बच्चा भटकता है, तो केवल वह अकेला नहीं गिरता—उसके साथ एक पूरा भविष्य डगमगा जाता है।
अगर आज हम समय रहते सचेत हो गए, तो वही बच्चा कल समाज का मजबूत स्तंभ बन सकता है। यदि हम आज भी इसे नज़रअंदाज़ करते रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
भटकता बचपन सही राह पर लौट सकता है—बस शर्त यह है कि उसे समय पर सहारा मिल जाए।




