

उत्तराखंड में ‘विकास’ नहीं, लूट का विस्तार
मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी: जनता के जख्मों पर सत्ता की मलाई**

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
उत्तराखंड एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह न तो बेरोजगारी है, न पलायन, न बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, न स्कूलों की बदहाली और न ही पहाड़ों में आत्महत्या करते किसान। इस बार खबर है—मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी की।
राज्य सरकार ने गोपन विभाग के माध्यम से अधिसूचना जारी कर दी है, जिसके अनुसार अब मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री सहित सभी मंत्रिमंडल सदस्य पदेन दायित्वों के नाम पर प्रति माह अधिकतम 90 हजार रुपये तक यात्रा भत्ता प्राप्त कर सकेंगे।
सवाल यह नहीं है कि यात्रा भत्ता बढ़ा या नहीं।
सवाल यह है कि आखिर किस नैतिकता, किस जनादेश और किस संवेदनशीलता के आधार पर यह बढ़ोतरी की गई?
विकास के नाम पर विलास
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब सा “विकास मॉडल” चल रहा है।
यह मॉडल जनता के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के लिए है।
जहाँ—
विधायक हों या मंत्री, उनके वेतन-भत्ते लगातार बढ़ते हैं
जनता महंगाई, बेरोजगारी और बदहाल सेवाओं से जूझती रहती है
स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं
अगस्त 2024 में विधानसभा द्वारा पारित संशोधन विधेयक के बाद विधायकों के वेतन-भत्ते बढ़ाकर लगभग 4 लाख रुपये प्रतिमाह कर दिए गए।
इससे पहले यह राशि करीब 2.90 लाख रुपये थी।
उस समय सरकार ने तर्क दिया—
“महंगाई बढ़ गई है, जनप्रतिनिधियों पर काम का दबाव बढ़ गया है।”
लेकिन जब यही महंगाई—
आम आदमी की थाली से सब्जी गायब कर दे
युवाओं से नौकरी छीन ले
बुजुर्गों से इलाज
किसानों से फसल
और पहाड़ से उसका आदमी
तो उस पर सरकार मौन क्यों हो जाती है?
मंत्रियों को क्यों याद आई जनता, वह भी यात्रा के नाम पर?
विधायकों के वेतन-भत्ते बढ़ने के बाद मंत्रियों के भत्तों में कोई वृद्धि नहीं की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, बुधवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह “कमी” मंत्रियों को खलने लगी।
फिर क्या था—
बैठक में विषय उठा,
गोपन विभाग सक्रिय हुआ,
और अधिसूचना जारी कर दी गई।
अब सवाल यह है कि—
क्या मंत्रियों की यात्राएं पहले रुक गई थीं?
क्या वे अपने निजी पैसों से यात्रा कर रहे थे?
क्या जनता के काम पैसे की कमी से अटके थे?
उत्तर साफ है—नहीं।
यात्रा भत्ता या ‘राजनीतिक ऐशो-आराम भत्ता’?
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में, जहाँ—
जिले पास-पास हैं
अधिकतर यात्राएं सरकारी गाड़ियों, सुरक्षा काफिले और सरकारी खर्च पर होती हैं
हवाई यात्राएं भी सरकारी मद से होती हैं
वहाँ 90 हजार रुपये प्रतिमाह यात्रा भत्ता आखिर किसलिए?
क्या यह भत्ता—
जनता से संवाद बढ़ाने के लिए है?
पहाड़ों में स्कूल खोलने के लिए है?
अस्पतालों में डॉक्टर भेजने के लिए है?
या बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए?
या फिर यह—
वीआईपी संस्कृति को मजबूत करने
सत्ता के सुख बढ़ाने
और “जनसेवा” को “सुविधा सेवा” में बदलने का माध्यम है?
जब जनता के लिए ‘कोष खाली’ और मंत्रियों के लिए ‘खजाना खुला’
यह वही सरकार है जो—
पेंशनरों के मेडिकल बिल रोक देती है
गोल्डन कार्ड योजना में OPD सुविधा तक नहीं दे पाती
ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टर नहीं भेज पाती
शिक्षकों के पद खाली छोड़ देती है
आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को मानदेय के लिए तरसाती है
लेकिन जब बात आती है—
मंत्रियों के वेतन-भत्तों की
विधायकों की सुविधाओं की
दायित्वधारियों के खर्चों की
तो सरकार का खजाना अचानक भर जाता है।
जनता के प्रति जवाबदेही या सत्ता के प्रति वफादारी?
लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
लेकिन उत्तराखंड में तस्वीर उलटी नजर आती है।
यहाँ—
जनता सवाल पूछे तो “विपक्ष की साजिश”
पत्रकार लिखे तो “नकारात्मकता”
आंदोलन हो तो “कानून व्यवस्था का खतरा”
और मंत्री अपने लिए भत्ता बढ़ाएं तो—
“प्रशासनिक आवश्यकता।”
क्या यही है लोकतंत्र?
पलायन रोकने की बातें और दिल्ली-देहरादून की उड़ानें
सरकार हर मंच से पलायन रोकने की बात करती है।
लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि—
गांव खाली हो रहे हैं
स्कूल बंद हो रहे हैं
खेत बंजर हो रहे हैं
और दूसरी ओर—
मंत्री देहरादून से दिल्ली
दिल्ली से देहरादून
कभी कार्यक्रम, कभी बैठक, कभी समीक्षा
और अब इन यात्राओं पर 90 हजार रुपये प्रतिमाह तक का भत्ता।
क्या यह पैसा—
किसी पहाड़ी गांव में एक स्कूल नहीं चला सकता?
किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को डॉक्टर नहीं दे सकता?
किसी बेरोजगार युवा को स्वरोजगार नहीं दे सकता?
उत्तराखंड में लूट—धीमी, वैध और सरकारी
यह लूट—
बंदूक की नोक पर नहीं
चोरी-छिपे नहीं
बल्कि अधिसूचनाओं, संशोधनों और कैबिनेट फैसलों के माध्यम से हो रही है।
यह लूट वैध है,
कानूनी है,
और बेहद शालीन भाषा में की जा रही है।
इसे कहा जाता है—
“सुविधाओं में युक्तिसंगत वृद्धि।”
निष्कर्ष: जनता के नाम पर सत्ता का उत्सव
उत्तराखंड की जनता ने यह राज्य—
सत्ता के विलास के लिए नहीं
नेताओं की सुविधाओं के लिए नहीं
और भत्तों की राजनीति के लिए नहीं बनाया था।
यह राज्य बना था—
सम्मान के लिए
रोजगार के लिए
आत्मनिर्भरता के लिए
और पहाड़ की पहचान बचाने के लिए।
लेकिन आज तस्वीर यह है कि—
जनता संघर्ष में है और सत्ता उत्सव में।
जनता सवालों में है और सरकार भत्तों में।
अब सवाल यह नहीं कि यात्रा भत्ता बढ़ा या नहीं।
सवाल यह है कि क्या जनता अब भी चुप रहेगी?




