रुद्रपुर : विकास के दावों के बीच दम तोड़ती ज़मीनी सच्चाई

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रुद्रपुर(संपादकीय)उद्योग नगरी के रूप में पहचाने जाने वाले रुद्रपुर को कभी तराई का भविष्य कहा जाता था। रोज़गार, व्यापार और शहरी विकास की संभावनाओं से भरा यह शहर आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ चमकते दावों और सिसकती सच्चाइयों के बीच आम नागरिक पिस रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

सवाल यह है कि क्या रुद्रपुर सचमुच विकास की राह पर है या फिर यह केवल फाइलों और मंचों तक सीमित एक सुनहरा सपना बनकर रह गया है?
रुद्रपुर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ विकास का मतलब केवल सड़कें, इमारतें और उद्घाटन समारोह समझ लिया गया है। शहर की आंतरिक कॉलोनियों में आज भी जलभराव, टूटी सड़कों, सीवर की समस्या और अघोषित बिजली कटौती से लोग जूझ रहे हैं। बरसात के दिनों में कई वार्डों की हालत किसी ग्रामीण इलाके से भी बदतर हो जाती है। सवाल उठता है कि जब नगर निगम, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि मौजूद हैं, तो फिर यह उपेक्षा क्यों?
दूसरी बड़ी चिंता का विषय है—तेजी से बढ़ता अपराध। रुद्रपुर में हाल के वर्षों में लूट, ठगी, नशा तस्करी, महिलाओं के खिलाफ अपराध और संगठित गिरोहों की गतिविधियाँ लगातार सुर्खियों में रही हैं। उद्योगों की आड़ में बाहरी तत्वों की घुसपैठ ने सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है। पुलिस समय-समय पर कार्रवाई जरूर करती है, लेकिन अपराध की जड़ तक पहुँचने की ठोस रणनीति अब भी नज़र नहीं आती। क्या कानून व्यवस्था केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होगी, या फिर रोकथाम पर भी उतना ही ध्यान दिया जाएगा?
नशा रुद्रपुर की सबसे खतरनाक समस्या बनता जा रहा है। युवा वर्ग, जो कभी इस शहर की ताकत माना जाता था, आज स्मैक, चरस और सिंथेटिक ड्रग्स की गिरफ्त में फँसता जा रहा है। स्कूल-कॉलेज के आसपास खुलेआम बिकता नशा, ढाबों और स्पा सेंटरों की आड़ में चल रही अवैध गतिविधियाँ—यह सब किसी से छिपा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या स्थानीय स्तर पर कोई प्रभावशाली संरक्षण तंत्र काम कर रहा है, या फिर इच्छाशक्ति की कमी ही सबसे बड़ा कारण है?
राजनीतिक स्तर पर रुद्रपुर हमेशा से सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहा है। चुनाव के समय यहाँ विकास की बाढ़ आ जाती है—घोषणाएँ होती हैं, शिलान्यास होते हैं, वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही जनता फिर अकेली पड़ जाती है। पार्षद से लेकर विधायक और सांसद तक, सभी की जिम्मेदारी बनती है कि वे केवल भाषणों तक सीमित न रहें, बल्कि नियमित रूप से अपने क्षेत्रों की समस्याओं की निगरानी करें। दुर्भाग्यवश, जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच संवाद की खाई लगातार बढ़ती जा रही है।
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। संसाधनों की कमी, स्टाफ का अभाव और व्यवस्थागत लापरवाही ने आम आदमी को निजी संस्थानों पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर दिया है। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। यदि रुद्रपुर को सचमुच आदर्श शहर बनाना है, तो शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी ही होगी।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन तमाम समस्याओं के बावजूद संवेदनशीलता लगातार घटती जा रही है। प्रशासन, राजनीति और समाज—तीनों स्तरों पर आत्ममंथन की ज़रूरत है। रुद्रपुर कोई निर्जीव शहर नहीं, बल्कि लाखों लोगों का घर है, जिनके सपने, संघर्ष और उम्मीदें इससे जुड़ी हैं।
अब समय आ गया है कि रुद्रपुर को केवल “उद्योग नगरी” के तमगे तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे एक सुरक्षित, स्वच्छ, न्यायपूर्ण और मानवीय शहर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ। विकास वही है जो आख़िरी व्यक्ति तक पहुँचे। अगर यह बात नीति निर्धारकों ने समय रहते नहीं समझी, तो रुद्रपुर की पहचान केवल अवसरों की नहीं, बल्कि उपेक्षा की मिसाल बनकर रह जाएगी।


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