सोने की चूड़ी पर राष्ट्रवाद, और तिजोरियों पर मौन!उत्तराखंड की राजनीति, काला धन और गरीब की बेटी का सवाल! गरीब की चूड़ी पर संयम, नेताओं की तिजोरियों पर मौन!

Spread the love


जब देश के प्रधानमंत्री नागरिकों से यह अपील करते हैं कि “सोना कम खरीदिए”, तब यह केवल आर्थिक सलाह नहीं रह जाती; वह एक नैतिक संदेश बन जाती है। यह संदेश उस गरीब पिता तक पहुंचता है, जो अपनी बेटी की शादी के लिए वर्षों से हर महीने दो-दो सौ रुपये बचाकर पांच ग्राम सोना खरीदने का सपना देखता है। यह संदेश उस मध्यमवर्गीय मां तक पहुंचता है, जो अपनी बहू के हाथ में छोटी-सी चूड़ी देखकर सामाजिक सम्मान महसूस करना चाहती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह संयम केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जिनकी जिंदगी पहले से ही अभाव, कर्ज और सामाजिक दबावों से भरी हुई है?
उत्तराखंड के गांवों में जाइए। वहां आज भी खेत बेचकर, गहने गिरवी रखकर और स्वयं सहायता समूहों से ऋण लेकर बेटियों की शादी की जाती है। कोई पिता दस ग्राम सोना खरीद ले तो पूरा परिवार वर्षों तक उसकी किश्तें भरता है। किसी गरीब महिला के लिए सोना विलासिता नहीं होता; वह उसकी सामाजिक सुरक्षा, भविष्य का बीमा और कठिन समय की अंतिम पूंजी होता है।
दूसरी तरफ देश की राजनीति और सत्ता का वह चेहरा है, जहां सोना अब आभूषण नहीं, सत्ता का प्रदर्शन बन चुका है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद ऐसे कई चेहरे अचानक राजनीति के शिखर पर पहुंचे, जिनके पास कभी मामूली साधन थे, लेकिन आज आलीशान फार्महाउस, करोड़ों की संपत्ति, विदेशी गाड़ियां और बैंक लॉकरों में भरे सोने के भंडार चर्चा का विषय हैं। गांव का प्रधान चुनाव हारने वाले लोग मंत्री बनते ही अचानक वैभव के प्रतीक कैसे बन जाते हैं? यह प्रश्न जनता पूछ रही है।
जनता के भीतर यह धारणा गहराती जा रही है कि माफियाओं, खनन नेटवर्क, भूमि घोटालों और कमीशनखोरी का काला धन बड़े पैमाने पर सोने में बदला गया। यही कारण है कि जब सरकार आम नागरिक को “सोना कम खरीदो” का संदेश देती है, तो समाज के भीतर एक मनोवैज्ञानिक असंतुलन पैदा होता है। गरीब आदमी सोचता है—क्या मेरी बेटी की छोटी-सी चूड़ी ही अर्थव्यवस्था पर बोझ है? क्या बड़े नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और धनकुबेरों की तिजोरियों में बंद कुंतलों सोने का राष्ट्रहित से कोई संबंध नहीं?
यही वह बिंदु है जहां अर्थशास्त्र वर्गीय नैतिकता में बदल जाता है।
अमेरिकी समाजशास्त्री थॉर्स्टीन वेब्लेन ने “दिखावटी उपभोग” यानी कॉन्पिशस कंजम्पशन की बात कही थी। उनका कहना था कि अभिजात्य वर्ग खर्च इसलिए नहीं करता कि उसे जरूरत है; वह खर्च इसलिए करता है ताकि समाज को अपनी शक्ति दिखा सके। यही दृश्य आज भारत में दिखाई देता है। एक तरफ गरीब महिला अपनी पुरानी चेन बेचकर बेटे की फीस भर रही है; दूसरी तरफ सत्ता और पूंजी का गठजोड़ सोने, हीरे और विलासिता को “संस्कृति” और “गौरव” का नाम देकर प्रदर्शित कर रहा है।
उत्तराखंड में भी जनता यह सवाल पूछ रही है कि अगर विदेशी मुद्रा बचानी है, तो शुरुआत ऊपर से क्यों नहीं होती? क्या कभी किसी मंत्री से कहा गया कि अपने काफिले कम करो? क्या कभी नेताओं की भव्य शादियों, आलीशान आयोजनों और करोड़ों के प्रचार अभियानों पर नैतिक भाषण दिए गए? क्या कभी उन भ्रष्ट अफसरों की सूची सार्वजनिक हुई, जिनके घरों पर छापे पड़ने पर अकूत संपत्ति निकलती है?
लोगों की मांग है कि यदि सचमुच राष्ट्रहित सर्वोपरि है, तो ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग को उन नेताओं, माफियाओं और भ्रष्ट नौकरशाहों पर भी कार्रवाई करनी चाहिए जिनकी संपत्ति उनकी घोषित आय से कई गुना अधिक है। जनता के बीच यह धारणा गहरी है कि यदि निष्पक्ष जांच हो तो कई तिजोरियों से कुंतलों के हिसाब से सोना निकल सकता है।
लेकिन विडंबना देखिए—गरीब की बचत पर राष्ट्रवाद लागू होता है, अमीर के वैभव पर नहीं।
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी कई परिवार ऐसे हैं जहां बेटी की शादी के लिए मां अपनी पुरानी नथ और मंगलसूत्र बचाकर रखती है। हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर और श्रीनगर जैसे शहरों में हजारों कर्मचारी ऐसे हैं जिनकी पूरी जिंदगी ईएमआई, किराया, स्कूल फीस और दवाइयों के बीच गुजर जाती है। उनके लिए तीन ग्राम सोना खरीदना भी सालों की मेहनत का परिणाम होता है। ऐसे लोगों से यदि कहा जाए कि “राष्ट्रहित में सोना मत खरीदो”, तो यह अपील उन्हें नैतिक अपराधबोध में धकेल देती है।
दूसरी तरफ अरबों की संपत्ति वाले वर्ग के लिए सोना “हेरिटेज”, “लक्ज़री”, “ग्लोबल फैशन” और “भारतीय संस्कृति का प्रदर्शन” बन जाता है। यही दोहरा मापदंड समाज में आक्रोश पैदा करता है।
यह मुद्दा ईर्ष्या का नहीं है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति या पहनावे पर प्रतिबंध की बात नहीं करता। लेकिन सार्वजनिक नैतिकता तब विश्वसनीय बनती है, जब त्याग ऊपर से शुरू होता है। अगर सत्ता सादगी नहीं अपनाएगी, अगर अभिजात्य वर्ग संकट के समय संयम नहीं दिखाएगा, तो जनता के लिए दिया गया हर संदेश खोखला प्रतीत होगा।
महात्मा गांधी का अर्थशास्त्र यही कहता था कि नेतृत्व पहले स्वयं त्याग करे, तब जनता से त्याग मांगे। लेकिन आज तस्वीर उलटी दिखाई देती है—जनता से कहा जाता है कि पेट्रोल बचाओ, सोना मत खरीदो, खर्च घटाओ; जबकि सत्ता और कुलीन वर्ग का प्रदर्शन पहले से अधिक चमकदार होता जा रहा है।
यही कारण है कि देश में असमानता केवल आर्थिक समस्या नहीं रह गई; वह मनोवैज्ञानिक पीड़ा बन चुकी है। गरीब आदमी केवल गरीबी से दुखी नहीं होता, बल्कि तब टूटता है जब उसे लगता है कि नियम केवल उसी के लिए बनाए गए हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवाद का बोझ केवल मध्यमवर्गीय परिवारों की बेटियों की चूड़ियों पर न डाला जाए। असली सवाल उन तिजोरियों से पूछा जाना चाहिए, जिनमें सत्ता, भ्रष्टाचार और काले धन का सोना बंद है।
क्योंकि राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल गरीब के त्याग से नहीं, बल्कि अमीर की जवाबदेही से भी तय होता है।


Spread the love