संपादकीय:उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में 52 शिक्षकों पर लटकी जांच की तलवार केवल एक भर्ती घोटाले का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संगठित भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश है जो वर्षों से सरकारी नौकरियों को “दलाली उद्योग” में बदल चुका है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 52 में से 37 शिक्षक एक ही जिले से संबंधित पाए गए हैं, जो इस पूरे प्रकरण को महज संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश की ओर संकेत करता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने स्वयं पुष्टि की है कि संबंधित विश्वविद्यालयों के प्रमाणपत्रों की गहन जांच जारी है और सभी मामलों की इलेक्ट्रॉनिक सूची बनाई गई है। इससे पहले भी विभाग ऐसी कई कार्रवाइयाँ कर चुका है, जिनमें यह खुलासा हुआ कि कई अभ्यर्थियों ने अपने आप को विकलांग दर्शाकर सरकारी नौकरी हासिल की थी। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से विकलांग युवाओं के अधिकारों पर सीधा डाका है।
52 शिक्षकों की जांच और सत्ता की चुप्पी
विद्यालयी शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत के अनुसार, उच्च न्यायालय में दायर याचिका के क्रम में राज्य चिकित्सा परिषद द्वारा 52 कार्मिकों की सूची उपलब्ध कराई गई है। इनमें:
- 02 अतिथि शिक्षक
- 21 प्रवक्ता
- 29 सहायक अध्यापक शामिल हैं।
इनमें से 20 प्रवक्ताओं और 9 सहायक अध्यापकों ने जवाब भी दाखिल कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि इन नियुक्तियों में फर्जी प्रमाणपत्र लगे, तो उन्हें सत्यापित किसने किया?
क्या यह सब बिना तत्कालीन अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण के संभव था?
प्रमाणपत्र बने कैसे? मोहर किसने लगाई?
यह मानना भोलेपन के अलावा कुछ नहीं कि इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा केवल अभ्यर्थियों ने अकेले कर लिया।
प्रमाणपत्र:
- बनाए गए,
- जांचे गए,
- सत्यापित किए गए,
- और अंततः उन पर सरकारी मोहर भी लगी।
यह सब शिक्षा विभाग, चिकित्सा बोर्ड, विश्वविद्यालय, जिला प्रशासन और नियुक्ति प्राधिकरण की मिलीभगत के बिना असंभव है। प्रश्न साफ है—
क्या बिना “लेन-देन” यह सब हो सकता है?
क्या किसी अधिकारी ने बिना “सुविधा शुल्क” के आँख मूँदकर सत्यापन कर दिया होगा?
दलाल पकड़े जाते हैं, मगर सरगना बच जाते हैं
हर बड़े घोटाले की तरह इस बार भी आशंका यही है कि:
- कुछ “बिचौलिए” या दलाल पकड़े जाएंगे,
- कुछ छोटे कर्मचारी बलि का बकरा बनाए जाएंगे,
- और असली खेल खेलने वाले वरिष्ठ अधिकारी और राजनीतिक संरक्षक हमेशा की तरह बच निकलेंगे।
यही वह मॉडल है जो उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में वर्षों से चल रहा है—
दलाल पैदा भी यही सिस्टम करता है और कार्रवाई भी उसी दलाल पर होती है।
यह सिर्फ शिक्षा का घोटाला नहीं, यह सामाजिक अपराध है
फर्जी शिक्षक केवल सरकार को आर्थिक नुकसान नहीं पहुँचाते, बल्कि:
- बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेलते हैं,
- योग्य युवाओं की नौकरी छीनते हैं,
- और पूरे शिक्षा तंत्र को खोखला कर देते हैं।
आज उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की बदहाली पर जो सवाल उठते हैं, उसके पीछे यही फर्जी भर्ती, भ्रष्ट ट्रांसफर-पोस्टिंग और दलाल तंत्र सबसे बड़ी वजह है।
पहले भी उठते रहे सवाल, मगर कार्रवाई अधूरी
यह पहली बार नहीं है जब विकलांगता प्रमाणपत्रों और फर्जी दस्तावेजों का मामला सामने आया हो। पहले भी कई रिपोर्टों में खुलासा हुआ कि:
- मेडिकल बोर्डों में खुलेआम प्रमाणपत्र बेचे गए,
- अधिकारियों ने बिना शारीरिक परीक्षण के ही रिपोर्ट जारी की,
- और राजनीतिक दबाव में जांच फाइलों को ठंडे बस्ते में डाला गया।
हर बार “जांच जारी है” कहकर मामला दबा दिया गया।
क्या अब असली दोषियों तक पहुँचेगी जांच?
आज आवश्यकता केवल 52 शिक्षकों को नोटिस देने की नहीं है, बल्कि:
- जिन अधिकारियों ने प्रमाणपत्र सत्यापित किए,
- जिन बोर्डों ने मेडिकल रिपोर्ट जारी की,
- जिन जिलाधिकारियों और निदेशालयों ने नियुक्ति की संस्तुति दी,
- और जिन मंत्रियों के कार्यकाल में ये भर्ती हुईं—
सभी की संपत्ति और भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
यदि यह सिर्फ “नीचे वालों” तक सीमित रही तो यह भी एक और औपचारिक कार्रवाई बनकर रह जाएगी।
भ्रष्टाचार की जड़ ऊपर है, नीचे नहीं
यह मामला साफ बताता है कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत नहीं रहा, बल्कि संस्थागत प्रणाली बन चुका है। जब तक:
- राजनेताओं की भूमिका तय नहीं होगी,
- वरिष्ठ अधिकारियों पर FIR नहीं होगी,
- और अवैध संपत्तियों की जब्ती नहीं होगी,
तब तक ऐसे घोटाले नए-नए रूप में सामने आते रहेंगे।
आज प्रदेश का हर ईमानदार अभ्यर्थी यह पूछ रहा है—
क्या इस बार सिर्फ शिक्षक ही दोषी ठहराए जाएंगे, या वह सिस्टम भी कटघरे में आएगा जिसने उन्हें फर्जी तरीके से “सरकारी शिक्षक” बना दिया?
यदि सरकार इस बार भी “मगरमच्छी आँसू” बहाकर दोषियों को बचा लेती है, तो यह माना जाएगा कि उत्तराखंड में शिक्षा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ी पाठ्य-पुस्तक बन चुकी है।

