पंतनगर, 4 अक्टूबर 2026।
पंतनगर का किसान मेला मेरे लिए केवल एक कृषि प्रदर्शनी नहीं है। यह मेरी स्मृतियों का वह हिस्सा है, जहां बचपन, किशोरावस्था, किसान, खेत, बस की यात्रा, मेले की चहल-पहल और पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा एक साथ दिखाई देती है। आज 4 अक्टूबर 2026 को जब हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की ‘दस्तक’ पंतनगर किसान मेले में लगी और मेरी अर्धांगिनी मोहनी बिष्ट के साथ मेले का भ्रमण किया, तो लगा जैसे समय ने कई दशक पीछे लौटने का अवसर दे दिया हो।
आज मेले में मोबाइल फोन हाथों में हैं। लोग हर दृश्य को कैमरे में कैद कर रहे हैं। पुराने परिचित अचानक मिल जाते हैं तो बातचीत में वर्षों का अंतर जैसे कुछ ही मिनटों में समाप्त हो जाता है। गांधी हॉल में किसानों की गोष्ठी है, चारों ओर कृषि उपकरण, बीज, तकनीक, प्रसंस्करण, स्टार्टअप और निजी कंपनियों के स्टॉल हैं। भीड़ बता रही है कि किसान मेला आज भी अपनी पकड़ बनाए हुए है।
लेकिन इस भीड़ के बीच खड़े होकर जब मैं 1980 के दशक के पंतनगर को याद करता हूं तो अंतर साफ दिखाई देता है।
जब नगला से बस पकड़कर पंतनगर पहुंचते थे
80 के दशक में किसान मेले का आकर्षण ही अलग था। नगला से पंतनगर आने वाली बसें किसान मेले के दौरान विशेष उत्साह का माध्यम बन जाती थीं। किसानों के साथ हम बच्चे भी बस में बैठ जाते थे। उस समय पंतनगर की यात्रा अपने आप में एक रोमांच हुआ करती थी।
मेले में पहुंचने के बाद दिनभर घूमना, अलग-अलग स्टॉल देखना, किसानों को बीज और कृषि संबंधी जानकारी लेते देखना और फिर बस से लौटना—इन छोटी-छोटी बातों में बचपन की बड़ी खुशियां छिपी थीं।
कभी-कभी तो किसान मेले के दिन एक ही दिन में तीन-चार चक्कर तक लगाने का उत्साह रहता था। असल आकर्षण मेले से कहीं अधिक उस यात्रा में था। बस में बैठना, रास्ते के दृश्यों को देखना और पंतनगर पहुंचते ही बदलता वातावरण महसूस करना—आज भी मन में उसी तरह दर्ज है।
उस समय पंतनगर का नाम सुनते ही सबसे पहले उन्नत कृषि, वैज्ञानिक खेती और विश्वविद्यालय के बीजों की चर्चा होती थी। पंतनगर के बीजों की विश्वसनीयता किसानों के बीच एक अलग पहचान रखती थी।
तब और अब के किसान मेले में जमीन-आसमान का अंतर
किसान मेला तब भी बड़ा था, लेकिन उसका स्वरूप आज से बिल्कुल अलग था। उस समय कृषि विश्वविद्यालय और उसके वैज्ञानिकों पर किसानों का भरोसा मेले की सबसे बड़ी ताकत था।
आज किसान मेला तकनीक के एक बड़े बाजार में बदलता दिखाई देता है। सैकड़ों कंपनियां अपने उत्पाद लेकर पहुंच रही हैं। कृषि मशीनरी से लेकर ड्रोन, डिजिटल तकनीक, सिंचाई उपकरण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और आधुनिक कृषि सेवाओं तक अनेक विकल्प किसानों के सामने हैं।
आज किसान केवल बीज देखने नहीं आता। वह यह भी देखता है कि कम लागत में उत्पादन कैसे बढ़ेगा, पानी कैसे बचेगा, फसल का बाजार कैसे मिलेगा और खेती को व्यवसाय में कैसे बदला जा सकता है।
मोबाइल फोन ने भी मेले की तस्वीर बदल दी है। पहले आंखों में दृश्य कैद होते थे, अब मोबाइल कैमरों में भी। पहले परिचितों से मुलाकात की याद घर तक जाती थी, अब वही मुलाकात कुछ सेकंड में सोशल मीडिया पर पहुंच जाती है।
फिर भी एक बात नहीं बदली—किसान मेले से जुड़ा भाव।
पंतनगर से शुरू हुई कृषि क्रांति और बदलता दौर
120वें अखिल भारतीय किसान मेले का शुभारंभ करते हुए राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि.) गुरमीत सिंह ने समृद्ध किसान, आधुनिक तकनीक और युवा शक्ति को सशक्त उत्तराखंड की नींव बताया। एआई, ड्रोन, डिजिटल कृषि, जल संरक्षण, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि मॉडल और ‘बीज से बाजार तक’ की पूरी श्रृंखला को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया गया।
यह संदेश आज के दौर की वास्तविकता को सामने रखता है।
80 के दशक का किसान जहां उन्नत बीज और सिंचाई की जानकारी को बड़ी उपलब्धि मानता था, वहीं आज का किसान ड्रोन, सेंसर, मौसम पूर्वानुमान, डिजिटल बाजार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चर्चा कर रहा है।
लेकिन इस बदलाव के बीच एक मूल प्रश्न आज भी कायम है—क्या कृषि विज्ञान का लाभ अंतिम किसान तक उसी गति से पहुंच रहा है, जिस गति से तकनीक विकसित हो रही है?
पंतनगर विश्वविद्यालय के सामने विकास और अस्तित्व का सवाल
पंतनगर केवल एक विश्वविद्यालय नहीं रहा। यह उत्तर भारत में कृषि शिक्षा और अनुसंधान की एक ऐतिहासिक पहचान रहा है। देश के कृषि विकास में पंतनगर मॉडल का उल्लेख लंबे समय से होता आया है।
यही कारण है कि आज विश्वविद्यालय परिसर और उसकी भूमि को लेकर उठने वाले सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पिछले दशकों में पंतनगर की भूमि के उपयोग, औद्योगिक आवंटन, व्यावसायिक गतिविधियों और आवासीय विकास को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय शुरू हुई भूमि आवंटन की नीतियों और उसके बाद के विस्तार को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। यह विषय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर सार्वजनिक जांच और पारदर्शिता की मांग करता है।
किसानों और आम नागरिकों के बीच यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि जिस भूमि ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा को विश्व पहचान दिलाई, उसके भविष्य की दीर्घकालिक योजना क्या है?
क्या पंतनगर की जमीन का उपयोग कृषि शिक्षा और अनुसंधान को मजबूत करने के लिए प्राथमिकता से होना चाहिए या बदलती आर्थिक जरूरतों के नाम पर उसके व्यावसायिक उपयोग का दायरा बढ़ता जाना चाहिए?
यदि विश्वविद्यालय की जमीन पर प्लॉटिंग, व्यावसायिक निर्माण अथवा अन्य गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है तो उसके सामाजिक, शैक्षणिक और कृषि संबंधी प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए।
यह सवाल किसी एक सरकार का नहीं, बल्कि पंतनगर की आने वाली पीढ़ियों का सवाल है।
600 से अधिक इकाइयों की चर्चा, पारदर्शिता जरूरी
पंतनगर की जमीन के अतीत में औद्योगिक इकाइयों और संस्थानों को दिए गए भूखंडों की चर्चा भी होती रही है। इस पूरे इतिहास को राजनीतिक आरोपों से हटाकर सरकारी अभिलेखों, आवंटन दरों, शर्तों और वर्तमान भूमि उपयोग के आधार पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
यदि कहीं सरकारी या विश्वविद्यालय की भूमि बाजार मूल्य की तुलना में बेहद कम दर पर आवंटित हुई है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि आवंटन नियमों के अनुसार हुआ है तो सरकार को दस्तावेज सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
पंतनगर जैसी राष्ट्रीय महत्व की कृषि भूमि के मामले में पारदर्शिता ही सबसे बड़ा उत्तर हो सकती है।
मेले में आज भी लौट आता है बचपन
लेकिन इन सवालों के बीच भी किसान मेले में पहुंचते ही मन कहीं और चला जाता है।
गांधी हॉल के आसपास किसानों की आवाजें सुनाई देती हैं। बच्चे स्टॉलों को उत्सुकता से देखते हैं। किसान नए बीज और उपकरणों की जानकारी लेते हैं। युवा मोबाइल से फोटो बनाते हैं। पुराने परिचित मिलते हैं तो बीते वर्षों की चर्चा शुरू हो जाती है।
और तभी मन कहता है—चलो, कुछ देर के लिए फिर उसी 80 के दशक में लौट चलें।
वही नगला।
वही बस।
वही पंतनगर जाने का उत्साह।
वही किसान मेला।
वही बचपन की आंखों में चमक।
समय बदल गया। बसें बदल गईं। मेले का स्वरूप बदल गया। बीज कंपनियां बढ़ गईं। तकनीक खेत तक पहुंच गई। मोबाइल ने यादों को तस्वीरों में बदल दिया।
लेकिन किसान मेले से मेरा रिश्ता नहीं बदला।
‘दस्तक’ इसलिए भी जरूरी है
आज हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की दस्तक पंतनगर किसान मेले में केवल एक मीडिया इंस्टॉल की मौजूदगी नहीं है। यह उस पत्रकार की व्यक्तिगत स्मृतियों की भी दस्तक है, जिसने बचपन से पंतनगर को बदलते हुए देखा है।
मेरी अर्धांगिनी मोहनी बिष्ट के साथ मेले में घूमते हुए महसूस हुआ कि चार दशक से अधिक समय गुजर गया, लेकिन कुछ जगहें उम्र के साथ पुरानी नहीं होतीं। वे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं।
पंतनगर मेरे लिए ऐसी ही जगह है।
आज किसान मेले में आधुनिक तकनीक है। कल एआई और ड्रोन होंगे। आने वाले वर्षों में खेती का स्वरूप और बदल सकता है। लेकिन इस बदलाव के बीच पंतनगर की मूल आत्मा—कृषि शिक्षा, अनुसंधान, किसान सेवा और वैज्ञानिक सोच—सुरक्षित रहनी चाहिए।
पंतनगर की जमीन केवल जमीन नहीं
आज जरूरत इस बात की है कि पंतनगर को केवल जमीन के आर्थिक मूल्य से नहीं देखा जाए। यह जमीन कृषि अनुसंधान की विरासत है। यह उन वैज्ञानिकों, किसानों और विद्यार्थियों की धरोहर है, जिन्होंने इसे देश की कृषि व्यवस्था में एक पहचान दिलाई।
सरकारें आती-जाती रहेंगी। नीतियां बदलती रहेंगी। उद्योग आएंगे, तकनीक बदलेगी, किसान नई मशीनें अपनाएगा।
लेकिन पंतनगर की कृषि पहचान कमजोर नहीं होनी चाहिए।
किसान मेले की चमक हमें आधुनिक भारत का सपना दिखाती है, लेकिन उसी मेले की स्मृतियां हमें यह भी याद दिलाती हैं कि इस पूरी यात्रा की जड़ कहां है।
बीज से बाजार तक की यात्रा तभी सफल होगी, जब पंतनगर की जड़ें सुरक्षित रहें।
आज 120वें किसान मेले में खड़े होकर 80 के दशक के उस बच्चे की स्मृतियां फिर जीवित हो उठी हैं, जो नगला से बस में बैठकर पंतनगर आता था और दिनभर मेले में घूमकर खुश होता था।
आज वही बच्चा उम्र के एक पड़ाव पर पत्रकार बनकर लौटा है।
हाथ में मोबाइल है। सामने कैमरा है। साथ में जीवनसंगिनी है। सामने आधुनिक किसान मेला है।
लेकिन दिल में आज भी वही पुराना पंतनगर है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की यह दस्तक केवल मेले की खबर नहीं—पंतनगर की स्मृतियों, वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद की दस्तक है।
अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
