

मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में भगवान आशुतोष एवं पार्वती कैलाश की ओर जा रहे थे। इसी दौरान मां नंदा को प्यास लगी और वह निकटवर्ती गांव बन्धाणि जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे आगे की ओर निकल गए। बन्धाणि गांव में उस समय के चौकीदार एवं प्रधान जमन सिंह जादोडा ने मां पार्वती को पानी पिलाने के साथ-साथ उनका खूब आदर सत्कार करते हुए दही और भात खिलाया। विदा होते समय जमन सिंह ने मां पार्वती से कहा कि कैलाश जाते समय वे एक बार फिर उनके घर जरूर आएं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व इडा बंधानी में जादौड़ा वंशज गुसाईं लोगों के घर मां नंदा देवी की डोली रात्रि विश्राम करती है।


मां नंदा देवी से जुड़ी हैं कई कथाएं
कुछ लोग मां नंदा को पार्वती का रूप मानते हैं और मां नंदा की कहानी उस समय की बताते हैं जब पार्वती अपने पिता दक्ष के घर बिना बुलाए गई थी। साथ ही कुछ किवदंतियां इस तरह भी प्रचलित है कि एक बार एक लड़की के मायके में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया लेकिन मायके पक्ष ने अपनी बेटी को इस अनुष्ठान में नहीं बुलाया। लेकिन वह लड़की अपने ससुराल से लड़ झगड़ कर अपने मायके की ओर अनुष्ठान के लिए चल पड़ी। ससुराल पक्ष ने लड़की को बहुत समझाया कि तुम्हारी मायके वालों ने तुम्हें आमंत्रित नहीं किया है इस तरह जाना ठीक नहीं लेकिन लड़की नहीं मानी। लड़की ससुराल से अपने मायके की ओर जा रही थी तभी उसके पीछे एक गुस्सैल भैंस पड़ गई। उससे जान बचाते हुए वह लड़की एक केले के पेड़ के पीछे जा छुपी। इतने में वहां एक बकरी आ गई और उसने उन पत्तों को खा लिया जिनके पीछे लड़की छुपी हुई थी गुस्सैल भैंस ने लड़की को देखा और उसे कुछ इस तरीके से मारा कि उसने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद ससुराल पक्ष को यही लगता रहा कि लड़की अपने मायके में है। और मायके पक्ष को भी इस बात की कोई खबर नहीं थी कि लड़की अनुष्ठान के लिए अपनी ससुराल से निकल पड़ी थी।
मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में भगवान आशुतोष एवं पार्वती कैलाश की ओर जा रहे थे। इसी दौरान मां नंदा को प्यास लगी और वह निकटवर्ती गांव बन्धाणि जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे आगे की ओर निकल गए। बन्धाणि गांव में उस समय के चौकीदार एवं प्रधान जमन सिंह जादोडा ने मां पार्वती को पानी पिलाने के साथ-साथ उनका खूब आदर सत्कार करते हुए दही और भात खिलाया। विदा होते समय जमन सिंह ने मां पार्वती से कहा कि कैलाश जाते समय वे एक बार फिर उनके घर जरूर आएं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व इडा बंधानी में जादौड़ा वंशज गुसाईं लोगों के घर मां नंदा देवी की डोली रात्रि विश्राम करती है।
मां नंदा देवी से जुड़ी हैं कई कथाएं
कुछ लोग मां नंदा को पार्वती का रूप मानते हैं और मां नंदा की कहानी उस समय की बताते हैं जब पार्वती अपने पिता दक्ष के घर बिना बुलाए गई थी। साथ ही कुछ किवदंतियां इस तरह भी प्रचलित है कि एक बार एक लड़की के मायके में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया लेकिन मायके पक्ष ने अपनी बेटी को इस अनुष्ठान में नहीं बुलाया। लेकिन वह लड़की अपने ससुराल से लड़ झगड़ कर अपने मायके की ओर अनुष्ठान के लिए चल पड़ी। ससुराल पक्ष ने लड़की को बहुत समझाया कि तुम्हारी मायके वालों ने तुम्हें आमंत्रित नहीं किया है इस तरह जाना ठीक नहीं लेकिन लड़की नहीं मानी। लड़की ससुराल से अपने मायके की ओर जा रही थी तभी उसके पीछे एक गुस्सैल भैंस पड़ गई। उससे जान बचाते हुए वह लड़की एक केले के पेड़ के पीछे जा छुपी। इतने में वहां एक बकरी आ गई और उसने उन पत्तों को खा लिया जिनके पीछे लड़की छुपी हुई थी गुस्सैल भैंस ने लड़की को देखा और उसे कुछ इस तरीके से मारा कि उसने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद ससुराल पक्ष को यही लगता रहा कि लड़की अपने मायके में है। और मायके पक्ष को भी इस बात की कोई खबर नहीं थी कि लड़की अनुष्ठान के लिए अपनी ससुराल से निकल पड़ी थी।
तभी एक दिन वह लड़की किसी के सपने में आई और बताया कि मेरे साथ ऐसी ऐसी घटना हुई और तुम लोगों ने मेरी खोज नहीं की इसलिए तुम्हें मेरी याद दिलाने के लिए मैंने ऐसा किया। कहा जाता है तब से उस लड़की को मां नंदा के रूप में पूजा जाता है और देवी बनाया जाता है। आज मां नंदा संपूर्ण उत्तराखंड में कई जगह बेटी, बहन और कहीं बहू के रूप में पूजी जाती हैं। 12 साल में आयोजित होने वाली नंदा राजजात में मुख्य रूप से चौशींग्या खाडू (चार सिंह वाला बकरा) मां नंदा का सहायक माना जाता है। कहते हैं यह चार सिंह वाला बकरा हर 12 वर्ष बाद ही जन्म लेता है।
विभिन्न रुपों में पूजी जाती हैं देवी
उत्तराखंड में मां नंदा को अनेक रूपों में पूजा जाता है। उत्तराखंड में विवाहिता देखी या बहनों को दिशा ध्याणी कहा जाता है। इसलिए इस राजजात में बेटियों को खास महत्व दिया जाता है। दिशा के रूप में पूजने वाले लोग मां नंदा को अन्य धन्य एवं श्रृंगार सामग्री भेंट करते हैं। ससुराल पक्ष से प्राप्त होने वाली सामग्री को लोक देवी प्रसाद के रूप में आपस में बांटते हैं। घाट ब्लॉक के कुरूड , नॉटी से लेकर नारायणबगड के भगौती गांव तक को मां नंदा का मायका माना जाता है । यहां मां नंदा को बेटी या बहन के रूप में पूजा जाता है। भगौती के बाद मां नंदा का ससुराल शुरू हो जाता है।
मां नंदा राजजात यात्रा
चमोली की नॉटी से शुरू होकर कुरूड के मंदिर से दसौली और बंधाण की डोलिया राजजात का आगाज करती है। इस यात्रा में लगभग 240 किलोमीटर की दूरी नॉटी से हेमकुंड तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है । इस बीच उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक छतौलिया इस यात्रा में शामिल होते हैं। नौटियाल और कुंवर लोग चौसिंग्या खाडू और रिगाल की छतौलिया लेकर आते हैं। नौटियाल और कुंवर लोग मां नंदा के उपहार को इस बकरे की पीठ पर हेमकुंड तक ले जाते हैं। वहां से यह बकरा अकेला ही आगे बढ़ जाता है और कहते हैं यह ठीक कैलाश पर्वत तक जाता है। इस खाडू के जन्म के साथ ही विचित्र चमत्कारिक घटनाएं होने शुरू हो जाती है जिस भी जगह पर या जन्म लेता है उसी दिन से वहां शेर आना शुरू कर देता है जब तक इस खाडू का मालिक राजा को अर्पित करने की मनौती नहीं रखता तब तक वहां शेर लगातार आता ही रहता है।
ऐसे होती है यात्रा शुरू
चौसिंगा खाडू (काले रंग का भेड़) श्रीनंदा राजजात की अगुवाई करता है। मनौती के बाद पैदा हुए चौसिंगा खाडू को ही यात्रा में शामिल किया जाता है। राजजात के शुभारंभ पर नौटी में विशेष पूजा-अर्चना के साथ इस खाडू के पीठ पर फंची (पोटली) बांधी जाती है, जिसमें मां नंदा की श्रृंगार सामग्री सहित देवी भक्तों की भेंट होती है। खाडू पूरी यात्रा की अगुवाई करता है। होमकुंड में इस खाडू को पोटली के साथ हिमालय के लिए विदा किया जाता है।
यात्रा का शुभारंभ नौटी में भगवती नंदादेवी की स्वर्ण प्रतिमा पर प्राण प्रतिष्ठा के साथ रिंगाल की पवित्र राज छंतोली और चार सींग वाले भेड़ (खाडू) की विशेष पूजा की जाती है। कांसुवा के राजवंशी कुंवर यहां यात्रा के शुभारंभ और सफलता का संकल्प लेते हैं। मां भगवती को देवी भक्त आभूषण, वस्त्र, उपहार, मिष्ठान आदि देकर हिमालय के लिए विदा करते हैं।
कब-कब हुई श्रीनंदा राजजात
राजजात समिति के अभिलेखों के अनुसार हिमालयी महाकुंभ श्रीनंदा देवी राजजात वर्ष 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987 तथा 2000 में आयोजित हो चुकी है। वर्ष 1951 में मौसम खराब होने के कारण राजजात पूरी नहीं हो पाई थी। जबकि वर्ष 1962 में मनौती के छह वर्ष बाद वर्ष 1968 में राजजात हुई।
यह हैं यात्रा के पड़ाव
ईड़ाबधाणी
नौटी से यात्रा के शुरू होते ही श्रद्धा का सैलाब उमड़ता रहता है। ढोल-दमाऊं और पौराणिक वाद्य यंत्रों के साथ ईड़ाबधाणी पहुंचने पर मां श्रीनंदा का भव्य स्वागत किया जाता है।
नौटी
ईड़ाबधाणी से दूसरे दिन राजजात रिठोली, जाख, दियारकोट, कुकडई, पुडियाणी, कनोठ, झुरकंडे और नैंणी गांव का भ्रमण करते हुए रात्रि विश्राम के लिए नौटी पहुंचती है। यहां मंदिर में मां नंदा का जागरण होता है।
कांसुवा
नौटी से मां श्रीनंदा तीसरे पड़ाव कांसुवा गांव पहुंचती हैं, जहां राजवंशी कुंवर माई नंदा और यात्रियों का भव्य स्वागत करते हैं। यहां भराड़ी देवी और कैलापीर देवता के मंदिर हैं। भराड़ी चौक में चार सिंग के मेढ और पवित्र छंतोली की पूजा होती है।
सेम
कांसुवा से सेम जाते समय चांदपुर गढ़ी विशेष राजजात का आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां से महादेव घाट मंदिर होते हुए उज्ज्वलपुर, तोप की पूजा प्राप्त कर देवी सेम गांव पहुंचती है। यहां गैरोली और चमोला गांव की छंतोलियां शामिल होती हैं।
कोटी
सेम से धारकोट, घड़ियाल और सिमतोली में देवी की पूजा होती है। सितोलीधार में देवी की कोटिश प्रार्थना की जाती है, इसलिए धार के दूसरे छोर पर स्थित गांव का नाम कोटी पड़ा। कोटी पहुंचने पर देवी की विशेष पूजा होती है।
भगोती
भगोती मां श्रीनंदा के मायके क्षेत्र का सबसे अंतिम पड़ाव है। यहां केदारु देवता की छंतोली यात्रा में शामिल होती है।
कुलसारी
मायके से विदा होकर मां श्रीनंदा की छंतोली अपनी ससुराल के पहले पड़ाव कुलसारी पहुंचती हैं। यहां पर राजजात हमेशा अमावस्या के दिन पहुंचती है।
चेपड्यूं
कुलसारी से विदा होकर थराली पहुंचने पर भव्य मेला लगता है। यहां कुछ दूरी पर देवराड़ा गांव है, जहां बधाण की राजराजेश्वरी नंदादेवी वर्ष में छ: माह रहती है। चेपड्यूं बुटोला थोकदारों का गांव है। यहां मां नंदादेवी की स्थापना घर पर की गई है।
नंदकेशरी
वर्ष 2000 की राजजात में नंदकेशरी राजजात पड़ाव बना। यहां पर बधाण की राजराजेश्वरी नंदादेवी की डोली कुरुड से चलकर राजजात में शामिल होती है। कुमाऊं से भी देव डोलियां और छंतोलियां शामिल होती हैं।
फल्दियागांव
नंदकेशरी से फल्दियागांव पहुंचने के दौरान देवी मां पूर्णासेरा पर भेकलझाड़ी यात्रा में विशेष महत्व है।
पूजा-अर्चना के बाद मुंदोली पहुंचती है राजजात
मुंदोली
ल्वाणी, बगरियागाड़ में पूजा-अर्चना के बाद राजजात मुंदोली पहुंचती है। गांव में महिलाएं और पुरुष सामूहिक झौंड़ा गीत गाते हैं।
वाण
लोहाजंग से देवी की राजजात अंतिम बस्ती गांव वाण पहुंचती है। यहां पर घौंसिंह, काली दानू और नंदा देवी के मंदिर हैं।
गैरोलीपातल
द्धाणीग्वर और दाडिमडाली स्थान के बाद गरोलीपातल आता है। यह पहाड़ यात्रा का पहला निर्जन पड़ाव है।हैं।
वैदनी
इस वर्ष की राजजात में वैदनी को पड़ाव बनाया गया है। मान्यता है कि महाकाली ने जब रक्तबीज राक्षस का वध किया था, तो भगवान शंकर ने महाकाली को इसी कुंड में स्नान कराया था, जिससे वे पुन: महागौरी रूप में आ गई थी।
पातरनचौंणियां
वेदनी कुड से यात्री दल पातरनचौंणियां पहुंचती है। यहां पर पूजा के बाद विश्राम होता है।
शिला समुद्र
पातरनचौंणियां के बाद तेज चढ़ाई पार कर कैलवाविनायक पहुंचा जाता है। यहां गणेश जी की भव्य मूर्ति है। इस दौरान बगुवावासा, बल्लभ स्वेलड़ा, रुमकुंड आदि स्थानों से होकर मां नंदा की राजजात शिलासमुद्र पहुंचती है।
चंदनियाघाट
होमकुंड में राजजात मनाने के बाद नंदा भक्त रात्रि विश्राम के लिए चंदनियाघाट पहुंचते हैं। यहां पहुंचने का रास्ता काफी खतरनाक है।
सुतोल
राजजात पूजा के बाद श्रद्धालु रात्रि विश्राम के लिए सुतोल पहुंचते हैं। इस गांव के रास्ते में तातड़ा में धौसिंह का मंदिर है।
घाट
नंदाकिनी नदी के दाहिने किनारे चलकर सितैल से नंदाकिनी का पुल पार कर श्रद्धालु घाट पहुंचते हैं।
ईइसके बाद यात्रा वापस नौटी पहुंचती है
घाट और नंदप्रयाग से होते हुए श्रद्धालु सड़क मार्ग से कर्णप्रयाग पहुंचते हैं। यहां ड्यूड़ी ब्राह्मण राजकुंवर और बारह थोकी के ब्राह्मणों को विदा करते हैं। नौटी पहुंचते हैं। अन्य को भी सुफल देते हुए राजकुंवर और राज पुरोहित के साथ शेष यात्री नंदाधाम नौटी पहुंचते हैं।
