उत्तराखंड,देवभूमि उत्तराखंड और भगवान शिव (भोलेनाथ) का संबंध इतना गहरा है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पुराणों के अनुसार, उत्तराखंड का कण-कण शिवमय है। केदारखंड (गढ़वाल) और मानसखंड (कुमाऊं) के रूप में विख्यात यह पावन धरती साक्षात शिव का निवास स्थान और उनकी लीला स्थली रही है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
आइए जानते हैं उन मुख्य पौराणिक कथाओं और प्रसंगों को, जो भोलेनाथ का संबंध उत्तराखंड से जोड़ते हैं:
1. सती का जन्म, तपस्या और शिव-पार्वती विवाह
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती का जन्म हिमालय राज के घर हुआ था, जिन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है। यह पूरा हिमालय क्षेत्र उत्तराखंड का ही हिस्सा है।
- त्रियुगीनारायण मंदिर (रुद्रप्रयाग): मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इसी स्थान पर हुआ था। यहां आज भी वह ‘अखंड धूनी’ (अग्नि) जल रही है, जिसके फेरे शिव-पार्वती ने लिए थे। विष्णु भगवान ने इस विवाह में पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी।
- बिल्वेश्वर महादेव और जागेश्वर धाम: माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए उत्तराखंड के घने जंगलों और गुफाओं में कठिन तपस्या की थी।
2. महाभारत काल और ‘पंचकेदार’ की उत्पत्ति
भगवान शिव का उत्तराखंड से सबसे जीवंत संबंध ‘पंचकेदार’ की कथा से जुड़ता है, जो महाभारत युद्ध के बाद घटित हुई थी:
- पांडवों को दोष से मुक्ति: महाभारत युद्ध में अपने ही भाइयों (कौरवों) का वध करने के बाद पांडव ‘गोत्र हत्या’ के पाप से मुक्ति चाहते थे। भगवान शिव उनसे रुष्ट थे और दर्शन नहीं देना चाहते थे। पांडवों को खोजते हुए उत्तराखंड के पर्वतों पर आते देख शिव ने एक बैल (वृष) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी में धरती में समाने लगे।
- शरीर के पांच भागों का प्रकट होना: जब भीम ने बैल रूपी शिव की पीठ को पकड़ लिया, तो उनके शरीर के पांच हिस्से उत्तराखंड के अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें आज ‘पंचकेदार’ कहा जाता है:
- श्री केदारनाथ: यहां बैल के पीठ का भाग (कुबड़) प्रकट हुआ।
- मदमहेश्वर: यहां शिव का नाभि भाग प्रकट हुआ।
- तुंगनाथ: यहां शिव की भुजाएं (हाथ) प्रकट हुईं (यह विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है)।
- रुद्रनाथ: यहां भगवान शिव का मुख (चेहरा) प्रकट हुआ।
- कल्पेश्वर: यहां महादेव की जटाएं (बाल) प्रकट हुईं।
3. गंगा का अवतरण और शिव की जटाएं
जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या करके माता गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए मना लिया, तो गंगा का वेग इतना तीव्र था कि वह पूरी धरती को बहा सकती थीं। तब भगवान शिव ने उत्तराखंड के गंगोत्री (मुखबा क्षेत्र) के ऊपर अपनी जटाएं फैला दीं। गंगा शिव की जटाओं में समा गईं और फिर शांत होकर उत्तराखंड के गोमुख से धरती पर अवतरित हुईं।
4. समुद्र मंथन का विषपान (नीलकंठ महादेव)
देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से जब ‘हलाहल’ नामक भयंकर विष निकला, तो पूरी सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया। विष की तीव्र जलन को शांत करने के लिए महादेव उत्तराखंड के ऋषिकेश (पौड़ी जिला) की पहाड़ियों में चले गए और हजारों वर्षों तक समाधि में रहे। इसी कारण यह स्थान नीलकंठ महादेव कहलाया।
5. आठवां ज्योतिर्लिंग: जागेश्वर धाम (दारुकावन)
कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा में स्थित जागेश्वर धाम को पुराणों में ‘दारुकावन’ कहा गया है। मान्यता है कि भगवान शिव ने इसी घने देवदार के जंगल में बैठकर सबसे पहले लिंग रूप में पूजा की शुरुआत की थी। इसे संसार का पहला शिवलिंग माना जाता है और कई पुराणों में इसे धरती का आठवां ज्योतिर्लिंग भी कहा गया है।
6. असुरों का संहार और देवताओं की रक्षा
- श्रीनगर का कमलेश्वर महादेव: देवासुर संग्राम के दौरान जब देवता कमजोर पड़ गए, तब भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर शिव की आराधना की थी और उन्हें एक-एक करके 1000 कमल के फूल चढ़ाए थे। शिव ने प्रसन्न होकर विष्णु जी को ‘सुदर्शन चक्र’ दिया था, जिससे देवताओं की जीत हुई।
- बालेश्वर महादेव (चम्पावत): यहां असुर राज ताड़कासुर के वध के बाद भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय और स्वयं शिव से जुड़े कई प्रसंग जुड़े हुए हैं।
