सत्ता, भू-माफिया और उत्तराखंड का बदलता चरित्र: क्या सिर्फ बयानबाज़ी से हटेगा अतिक्रमण?

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उत्तराखंड में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, भू-कानून के उल्लंघन और बाहरी तत्वों की बढ़ती गतिविधियों को लेकर मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami की हालिया वर्चुअल बैठक एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि भू-कानून का उल्लंघन कर खरीदी गई जमीनों को राज्य सरकार अपने कब्जे में लेगी। सरकारी जमीनों, ग्राम सभा की भूमि, शत्रु संपत्तियों और वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति अपनाने की बात कही गई।
पहली नजर में यह बयान बेहद कठोर और निर्णायक दिखाई देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में उत्तराखंड में भू-माफियाओं पर कार्रवाई होगी, या यह भी उन राजनीतिक घोषणाओं में शामिल होकर रह जाएगा जो चुनावी मौसम में जनता को सुनाई जाती हैं और बाद में फाइलों में दब जाती हैं?
उत्तराखंड के आम नागरिकों के भीतर यही संशय लगातार गहराता जा रहा है। कारण साफ है—राज्य बनने के बाद से लेकर आज तक पहाड़ से लेकर तराई तक जिस तरह भूमि खरीद, अतिक्रमण और अवैध कॉलोनियों का खेल चला, उसमें केवल छोटे लोग ही नहीं बल्कि सत्ता से जुड़े प्रभावशाली चेहरे भी सामने आते रहे हैं। यही वजह है कि जब सरकार “भू-माफिया” शब्द का इस्तेमाल करती है, तो जनता के मन में पहला सवाल यही उठता है कि आखिर असली भू-माफिया कौन हैं?
क्या भू-माफिया सिर्फ विपक्ष में होते हैं?
उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जो व्यक्ति विपक्ष में रहते हुए अवैध कब्जों का आरोपी होता है, वही सत्ता दल में शामिल होते ही “सम्मानित जनप्रतिनिधि” बन जाता है। रुद्रपुर, हल्द्वानी, हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जैसे क्षेत्रों में ऐसे अनेक उदाहरण स्थानीय लोग गिनाते हैं, जहां अवैध प्लॉटिंग, सरकारी जमीनों पर कब्जे और खनन माफिया से जुड़े नाम धीरे-धीरे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करते गए।
यह आरोप केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में चूंकि राज्य और केंद्र दोनों जगह Bharatiya Janata Party की सरकार है, इसलिए जनता के सवाल सीधे सत्ता से हैं।
लोग पूछते हैं कि यदि सरकार सचमुच गंभीर है तो क्या उन नेताओं की भी जांच होगी जो वर्षों से सरकारी जमीनों पर कब्जों के आरोप झेलते रहे हैं? क्या उन लोगों की संपत्तियों की जांच होगी जिन्होंने राजनीति में आने के बाद अचानक करोड़ों की भूमि खरीद ली? क्या उन पार्षदों, जिला पंचायत सदस्यों और स्थानीय नेताओं पर कार्रवाई होगी जिनके नाम जनता खुलेआम अतिक्रमण से जोड़ती है?
यही वह बिंदु है जहां सरकार की नीयत पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
पूरा पहाड़ बिकने का दर्द
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं था। यह पहाड़ की संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और स्थानीय पहचान को बचाने का आंदोलन था। लेकिन आज वही पहाड़ तेजी से बाजार में बदलता दिखाई देता है।
देहरादून से लेकर नैनीताल, मसूरी, ऋषिकेश, रामनगर और अल्मोड़ा तक बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद-फरोख्त हुई। स्थानीय लोग लगातार आरोप लगाते रहे कि भूमाफियाओं और बिल्डर लॉबी ने राजनीतिक संरक्षण में पहाड़ी क्षेत्रों को रिजॉर्ट और व्यावसायिक परियोजनाओं में बदल दिया। दूसरी ओर तराई क्षेत्र में कृषि भूमि धीरे-धीरे कॉलोनियों और व्यावसायिक परिसरों में तब्दील होती गई।
विडंबना यह है कि जिन कानूनों का हवाला देकर आज कार्रवाई की बात की जा रही है, उन्हीं कानूनों के उल्लंघन वर्षों तक प्रशासन की आंखों के सामने होते रहे। यदि सरकार सचमुच गंभीर होती तो क्या हजारों एकड़ सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण संभव था?
सत्ता और माफिया का गठजोड़
उत्तराखंड में “भू-माफिया”, “खनन माफिया” और “नशा माफिया” जैसे शब्द अब राजनीतिक भाषणों का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन जनता के भीतर यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि माफिया अब केवल अपराधी गिरोह नहीं रहे, बल्कि उन्होंने राजनीतिक चोला पहन लिया है।
कई क्षेत्रों में स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि जो व्यक्ति पहले अवैध कब्जों या संदिग्ध गतिविधियों के लिए पहचाने जाते थे, वे आज किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। कई लोग जनप्रतिनिधि बन चुके हैं, कई संगठन में पदाधिकारी हैं, और कई सत्ता के बेहद करीब माने जाते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन उन लोगों पर हाथ डाल पाएगा जो राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं?
यही कारण है कि मुख्यमंत्री के निर्देशों के बावजूद जनता के भीतर भरोसे का संकट बना हुआ है। लोगों को लगता है कि कार्रवाई केवल कमजोर लोगों तक सीमित रह जाएगी, जबकि बड़े नाम राजनीतिक सुरक्षा कवच में बच निकलेंगे।
ईडी, जांच एजेंसियां और राजनीतिक धारणा
देशभर में Enforcement Directorate जैसी जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज रही है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया जाता है, जबकि सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोगों पर अपेक्षाकृत नरमी दिखाई देती है।
उत्तराखंड में भी यही धारणा धीरे-धीरे मजबूत हुई है। जनता पूछती है कि यदि सरकार माफियाओं के खिलाफ इतनी सख्त है, तो फिर नशे के बड़े नेटवर्क आज भी कैसे सक्रिय हैं? आखिर क्यों युवाओं में स्मैक और सिंथेटिक ड्रग्स का जाल लगातार फैल रहा है? क्यों सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी की घटनाएं रुक नहीं पा रहीं?
यदि केवल छोटे सप्लायर पकड़ लिए जाएं और बड़े नेटवर्क राजनीतिक संरक्षण में बचते रहें, तो फिर “नशा मुक्त उत्तराखंड” का नारा केवल पोस्टरों तक सीमित रह जाता है।
बाहरी लोगों का मुद्दा और सामाजिक संतुलन
मुख्यमंत्री ने बाहरी राज्यों से आए लोगों के शस्त्र लाइसेंस और राशन कार्ड की जांच के निर्देश दिए हैं। यह कदम सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक माना जा सकता है। लेकिन इस विषय को संभालने में सरकार को बेहद संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
क्योंकि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में वर्षों से बाहरी श्रमिकों और व्यवसायियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समस्या “बाहरी” होने से नहीं बल्कि अवैध गतिविधियों से है। यदि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक भावनाओं के आधार पर चलाती है, तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
इसलिए असली जरूरत यह है कि अपराधी की पहचान उसके अपराध से हो, न कि उसकी भौगोलिक पृष्ठभूमि से।
मानसून, आपदा और प्रशासनिक सच्चाई
बैठक में मानसून की तैयारियों, सड़क मरम्मत, बिजली-पानी और आपदा प्रबंधन को लेकर भी निर्देश दिए गए। हर साल की तरह इस बार भी सरकार ने तैयारियों के दावे किए हैं। लेकिन उत्तराखंड की जनता यह भी जानती है कि हर मानसून के बाद सड़कें टूटती हैं, गांव कट जाते हैं और कई क्षेत्रों में राहत कार्यों की गति बेहद धीमी रहती है।
Joshimath इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। विस्थापन, दरारें और पुनर्वास की धीमी प्रक्रिया ने लोगों के भीतर गहरा अविश्वास पैदा किया।
यदि सरकार वास्तव में संवेदनशील है, तो उसे केवल बैठकों और निर्देशों से आगे बढ़कर जमीन पर परिणाम दिखाने होंगे।
चारधाम यात्रा और व्यवस्थाओं की परीक्षा
Char Dham Yatra उत्तराखंड की आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों का बड़ा आधार है। सरकार लगातार बेहतर व्यवस्थाओं के दावे करती है, लेकिन हर सीजन में ट्रैफिक जाम, अव्यवस्था, पार्किंग संकट और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे सामने आते हैं।
यदि सरकार श्रद्धालुओं से फीडबैक लेकर व्यवस्थाएं सुधारना चाहती है, तो यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
किसानों के नाम पर योजनाएं या वास्तविक बदलाव?
पॉली हाउस, एप्पल मिशन और कीवी मिशन जैसी योजनाओं का जिक्र बैठक में हुआ। वर्षों से सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती रही हैं, लेकिन पहाड़ का किसान आज भी पलायन के संकट से जूझ रहा है।
यदि खेती वास्तव में लाभकारी बन गई होती तो गांव खाली नहीं होते। युवा शहरों की ओर पलायन नहीं करते।
सरकार को यह समझना होगा कि योजनाओं की घोषणाएं और जमीनी बदलाव दो अलग बातें हैं। जब तक किसानों को बाजार, परिवहन, भंडारण और उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक मिशन आधारित राजनीति केवल प्रचार तक सीमित रहेगी।
असली लड़ाई नीयत की है
उत्तराखंड आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जनता अब केवल भाषण नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई देखना चाहती है।
यदि सरकार सचमुच भू-माफियाओं के खिलाफ है, तो उसे यह साबित करना होगा कि कानून सबके लिए समान है—चाहे वह आम आदमी हो या सत्ताधारी दल का प्रभावशाली नेता।
यदि कार्रवाई केवल विपक्ष, कमजोर वर्ग या राजनीतिक रूप से असुरक्षित लोगों तक सीमित रही, तो “जीरो टॉलरेंस” का दावा जनता के बीच खोखला साबित होगा।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी यही रही है कि यहां विकास और विनाश के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती गई। पहाड़ों की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर अंधाधुंध निर्माण हुआ। तराई में भूमि कारोबार राजनीति से जुड़ता गया। और धीरे-धीरे जनता के भीतर यह भावना पैदा हुई कि व्यवस्था आम नागरिक के लिए कठोर है लेकिन प्रभावशाली लोगों के लिए बेहद लचीली।
आज जरूरत केवल अतिक्रमण हटाने की नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी की है। क्योंकि जब तक सत्ता और माफिया के रिश्तों पर वास्तविक चोट नहीं होगी, तब तक “भू-माफिया के खिलाफ कार्रवाई” जैसे बयान जनता को केवल चुनावी चोंचले ही लगते रहेंगे।


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