रुद्रपुर : बुलडोजर, सत्ता और दोहरा चरित्र

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रुद्रपुर में भूमाफियाओं के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई ने एक बार फिर यह साबित किया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो अतिक्रमण के किले ढहाए जा सकते हैं। विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा द्वारा की गई हालिया कार्रवाई को लोग ऐतिहासिक इसलिए मान रहे हैं क्योंकि वर्षों से जिन पर हाथ डालने से प्रशासन कतराता रहा, वहां अचानक कानून की गूंज सुनाई दी। इस एक्शन ने न सिर्फ मतदाताओं का दिल जीता, बल्कि “अतिक्रमण-मुक्त उत्तराखंड” की परिकल्पना को भी एक ठोस आधार दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


विधायक शिव अरोड़ा के कार्यकाल में रिंग रोड जैसी बड़ी योजनाओं पर पहल, शहर के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम रहे हैं। वहीं विधायक  शिव अरोड़ा, महापौर विकास शर्मा द्वारा सीधे बुलडोजर चलवाना उन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्त कार्यशैली के समकक्ष खड़ा करता है। लेकिन राजनीति में इतिहास सिर्फ एक-आध कार्रवाई से नहीं, बल्कि निरंतर और निष्पक्ष फैसलों से लिखा जाता है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—काशीपुर बायपास रोड पर आखिर क्यों घुटने टेक दिए गए?
अगर बुलडोजर योगी मॉडल की तर्ज पर चलना है, तो वह जाति, पहचान, रसूख और हैसियत देखकर नहीं, बल्कि अवैधता देखकर चलना चाहिए। काशीपुर बायपास पर वर्षों से चले आ रहे अतिक्रमण, और कथित 500 करोड़ के “गोल-गोल” खेल में खड़ी इमारतें क्या कानून से ऊपर हैं? यदि वहां भी कार्रवाई होती, तो यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उदाहरण बनता।
रुद्रपुर की विडंबना यही है कि गरीब की झोपड़ी पर बुलडोजर बेधड़क चलता है, लेकिन अमीर की अवैध कोठी के सामने कानून हांफने लगता है। एक ओर नजूल भूमि पर राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी योजनाएं पूरी तरह ठप हैं, दूसरी ओर तालाब तक की रजिस्ट्री कर दी जाती है और उसे “माल” बनाने की तैयारी चलती है। यह अंधा कानून नहीं, बल्कि चयनित अंधापन है।
शहर की हरियाली और सार्वजनिक स्थलों का हाल भी किसी से छिपा नहीं। गांधी पार्क सिकुड़ता जा रहा है, मोदी मैदान में स्टेडियम बन रहा है—जो विकास का प्रतीक हो सकता है—लेकिन सवाल यह है कि जो जमीनें अतिक्रमण से मुक्त कर पार्क, खेल मैदान या महापुरुषों की प्रतिमाओं के लिए उपयोग की जा सकती थीं, वहां आखिर क्यों हेराफेरी और कब्जे पनपने दिए गए?
रुद्रपुर आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता वह है जहां बुलडोजर सिर्फ कमजोरों पर चलता है, और दूसरा वह जहां कानून सबके लिए बराबर होता है। यदि विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा सचमुच अपना नाम इतिहास में दर्ज कराना चाहते हैं, तो उन्हें काशीपुर बायपास जैसे “अछूत” इलाकों में भी वही साहस दिखाना होगा, जो अब तक दिखाया गया है।
बुलडोजर अगर न्याय का प्रतीक बनना है, तो उसे सत्ता की सुविधा नहीं, कानून की रीढ़ बनना होगा।
वरना रुद्रपुर की यह फितरत—गरीब पर सख्ती, अमीर पर नरमी—पूरे उत्तराखंड की पहचान बनती चली जाएगी।


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