

उमेश कुमार–तिलक राज बहेड़ की मुलाकात: कांग्रेस की नई चाल या पहाड़–मैदान की राजनीति का पुनर्जीवन?”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
संपादकीय खानपुर विधायक उमेश कुमार और किच्छा के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तिलक राज बहेड़ की हालिया मुलाकात ने उत्तराखंड की राजनीतिक धरातल पर नई हलचल पैदा कर दी है। यह मुलाकात केवल शिष्टाचार भर नहीं लगती, बल्कि कांग्रेस द्वारा मैदान क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने की दीर्घ राजनीतिक रणनीति का संकेत देती है। जिस समय भाजपा प्रदेश में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय प्रभाव के सहारे मजबूत जनसमर्थन के साथ खड़ी है, ठीक उसी समय कांग्रेस पहाड़ बनाम मैदान की पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर अपनी चुनावी भूमि तैयार करने में जुटती नजर आ रही है।
उमेश कुमार, जो मैदान क्षेत्रों में लोकप्रियता रखते हैं, और तिलक राज बहेड़, जिनकी जड़ें मैदानी राजनीति में गहरी हैं — दोनों का गठजोड़ कांग्रेस को एक नया सामाजिक समीकरण देने की कोशिश है। लेकिन यह सवाल भी उतना ही बड़ा है कि क्या जनता अब भी पहाड़–मैदान के विभाजनकारी एजेंडे से प्रभावित होगी? आज उत्तराखंड का मतदाता क्षेत्रीय भावनाओं से अधिक विकास, स्थिरता और नेतृत्व की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता दिख रहा है।
कांग्रेस की यह चाल सफल होगी या उलटी पड़ जाएगी — इसका निर्णय अंततः जनता के विवेक पर निर्भर करेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ बनाम मैदान का विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने इसे योजनाबद्ध तरीके से पुनः हवा देने का प्रयास शुरू कर दिया है। उमेश कुमार को आगे कर कांग्रेस मैदान क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपना रही है। संदेश साफ है — कांग्रेस अब पहाड़ी-मैदानी भावनाओं को भुनाकर वोट बैंक की नई रचना करना चाहती है। 2027 में उमेश कुमार कांग्रेस के उम्मीदवार बन चुके थे, और अब फिर उसी कार्ड को खेलकर पार्टी प्रदेश की राजनीति को जातीय-क्षेत्रीय भावनाओं की तरफ मोड़ने की कोशिश कर रही है।
लेकिन इस समय समीकरण पहले जैसे नहीं हैं। आज उत्तराखंड की राजनीति में दो नाम निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं — पुष्कर सिंह धामी और नरेंद्र मोदी। मोदी का करिश्मा और धामी का जमीनी जलवा जनता के बीच प्रत्यक्ष रूप से असर डाल रहा है। पहाड़-मैदान की विभाजनकारी राजनीति के बीच जनता विकास, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देती दिख रही है। कांग्रेस जहाँ क्षेत्रीय असंतोष और राजनीतिक प्रयोगों से चुनावी फायदा तलाश रही है, वहीं भाजपा राष्ट्रीय दृष्टि के साथ “सबका विकास, सबका विश्वास” की लाइन पर चलकर भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव बना चुकी है।
कांग्रेस की यह रणनीति न केवल पुरानी है, बल्कि जोखिमभरी भी। पहाड़ और मैदान के नाम पर प्रदेश को बांटने की कोशिश लोकतांत्रिक भावना का अपमान है। उत्तराखंड की जनता ने राजनीतिक भावनाओं के बजाय राष्ट्रवाद और विकास को महत्व देना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि मोदी का सिद्धांत — “भारत पहले” — आज जनमानस की आत्मा बन चुका है।
कांग्रेस चाहे जितना कार्ड बदले, जनता समझ चुकी है कि प्रदेश को आगे ले जाने के लिए भावनाओं नहीं, स्थिर नेतृत्व और मजबूत राष्ट्रीय दृष्टि की आवश्यकता है। और आज उत्तराखंड में दोनों धुरी भाजपा के पास हैं — मोदी की नीति और धामी की नेतृत्व क्षमता।
“उत्तराखंड में प्लेन बनाम पहाड़ की राजनीति — यह विभाजन कांग्रेस के लिए अस्त्र या आत्मघाती अस्त्र?
उत्तराखंड में मिशन 2027 का बिगुल बज चुका है। इस बार मैदान में केवल दलों की ताक़त, नेताओं की लोकप्रियता और चुनावी घोषणाओं की नहीं, बल्कि एक और खतरनाक शब्द की गूंज सुनाई दे रही है — “पहाड़ बनाम मैदान”।
यह बहस अचानक पैदा नहीं हुई। यह योजनाबद्ध है, सुनियोजित है, और विपक्ष के अंदर एक बड़े राजनीतिक प्रयोग का हिस्सा प्रतीत होती है। कांग्रेस के कुछ नेता इसे “मैदान में कांग्रेस की पैठ बनाने का नया फॉर्मूला” बता रहे हैं, मगर सियासी विश्लेषकों की नज़र में यह प्रयोग वोट-बैंक को जोड़ने से ज्यादा तोड़ने वाला है।
उमेश कुमार का किच्छा दौरा — राजनीति की नई धुरी,हाल ही में खानपुर विधायक उमेश कुमार का किच्छा दौरा और उसके बाद वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तिलकराज बेहड़ से मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी। कांग्रेस खेमे के रणनीतिकारों का मानना है कि मैदान में कांग्रेस की पकड़ कमजोर है, और वे इसी कमजोरी को एक प्रयोगात्मक तरीके से भरना चाह रहे हैं —
“पहाड़ बादाम मैदान” नैरेटिव खड़ा कर।
उमेश कुमार के दौरे के तुरंत बाद तिलकराज बेहड़ का ‘पहाड़ बनाम मैदान’ से जुड़ा बयान कांग्रेस की रणनीति को और स्पष्ट कर देता है —
कांग्रेस मैदान के मतदाताओं में यह भाव पैदा करना चाहती है कि उन्हें लगातार राजनीतिक नेतृत्व में ‘दबाया’ गया है।
परंतु विडंबना यह है कि कांग्रेसी नेता यह भूल रहे हैं कि मैदानी इलाकों में रहने वाले लाखों परिवार स्वयं पहाड़ से आकर बसे हैं और ऐसे कदम मैदान तथा पहाड़ — दोनों ओर अविश्वास और आक्रोश पैदा कर सकते हैं।
हरक सिंह रावत का आग में घी डालने वाला बयान,
इसी बीच हरक सिंह रावत के तीखे बयान ने आग में घी का काम किया।
उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि मैदान की राजनीति पहाड़ से अलग है और उसे समझने वालों की आवश्यकता है।
संदेश स्पष्ट है —
कांग्रेस 2027 के लिए वोट-बैंक को क्षेत्रीय पहचान के आधार पर पुनर्गठित करने की कोशिश कर रही है।
“हरिद्वार में पहाड़–मैदान एकता” रैली — राजनीति का पॉलिटिकल थिएटर?
हरिद्वार में आयोजित तथाकथित “पहाड़ मैदान एकता” रैली ने इस पूरे राजनीतिक खेल का चेहरा पूरी तरह उजागर कर दिया।
सवाल यह है:
यदि उद्देश्य एकता है — तो फिर विभाजन का नैरेटिव क्यों?
जिन बातों से समाज में फूट पड़ती है, यदि वही राजनीतिक मंचों पर दोहराई जाएँ तो यह एकता नहीं, वोट-इंजीनियरिंग है।
मूल-निवास — संविधान बनाम राजनीतिक नौटंकी
अब सबसे खतरनाक क्षेत्र में प्रवेश हो चुका है — मूल-निवास की राजनीति।
कांग्रेस के भीतर यह संदेश फैलाया जा रहा है कि मैदान के लोगों का मूल-निवास संदिग्ध बताया जा रहा है और उन्हें न्याय नहीं मिला।
जबकि संविधान स्पष्ट करता है कि नागरिक का स्थायी निवास उसके वैधानिक दस्तावेज़ों, निवास प्रमाण और स्थानीय अभिलेखों से तय होता है।
लेकिन वोट-राजनीति संविधान नहीं देखती —
नाराज़गी पैदा करने के लिए भावनाओं को हवा दिया जा रहा है।
कांग्रेस का दांव — फायदेमंद या आत्मघाती?कांग्रेस सोचती है कि
पहाड़ और मैदान की अस्मिता को उभारकर वह मैदान में खोई जमीन वापस पा लेगी,
लेकिन सच यह है कि —
मैदान में रहने वाला बड़ी संख्या में पहाड़ का वोटर भी कांग्रेस से नाराज़ हो सकता है।
यदि यह राजनीति गहराई तक गई, तो 2027 में मैदान और पहाड़ — दोनों जगह कांग्रेस अपना खुद का ही वोट-बैंक काट सकती है।
जनता की असली प्राथमिकता — सुविधा, सुरक्षा, और स्थिर नेतृत्व
कांग्रेस जिस मुद्दे को केंद्र बना रही है, जनता उससे काफी आगे बढ़ चुकी है।
आज जनता का सरल, स्पष्ट एजेंडा है:
▸ सड़क
▸ पानी
▸ बिजली
▸ रोजगार
▸ सुरक्षा
▸ कानून-व्यवस्था
और इन मुद्दों पर लोकप्रियता की रेस में एक ही नाम आगे दिखता है —
नरेंद्र मोदी।
मैदान हो या पहाड़ —
मोदी और योगी के मॉडल की लोकप्रियता 2025-26 तक लगभग अटूट बनी हुई है।
धामी — भाजपा की सबसे धारदार जोड़ीदार
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिस तीखेपन और आत्मविश्वास के साथ हिंदुत्व + विकास का कॉम्बो राजनीति में उतारा है —
वह पिछले 24 वर्षों में शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने किया हो।
▸ UCC पर मजबूत निर्णय
▸ धार्मिक विरासत का संरक्षण
▸ लव जिहाद पर कड़े कदम
▸ भूमि जिहाद पर कानून
▸ उत्तराखंड पहचान को मजबूत करने की रणनीति
इन सभी ने भाजपा में धार पैदा की है और विपक्ष में घबराहट।
2027 का युद्ध — कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं, कांग्रेस बनाम कांग्रेस?
यह गलत धारणा है कि 2027 में कांग्रेस भाजपा से लड़ रही है।
सच यह है —
कांग्रेस 2027 में कांग्रेस से ही लड़ रही है।
पहाड़ बनाम मैदान का फार्मूला अगर असफल हुआ, तो कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान अपने ही संगठनात्मक ढांचे का टूटना होगा।
जनता संदेश दे चुकी है— मोदी विरोध नहीं,विकल्प चाहिए”
कांग्रेस बार-बार मोदी को हराने की योजना बनाती है,
लेकिन जनता कहती है —मोदी को हराने के लिए नहीं, देश चलाने के लिए कौन बेहतर है — इसका जवाब दें।
सच स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए —अभी उत्तराखंड में मोदी को हराना मुमकिन नहीं, नामुमकिन है।
यही वजह है कि सियासी प्रयोग शुरू हुए हैं —
पहाड़–मैदान
मूल-निवास
क्षेत्रीय अस्मिता
नारा-भाषा
जो राजनीति बांटकर जीतने की कोशिश करे —वह समाज भी हारती है और अंततः राजनीति भी हारती है।
मिशन 2027 के आगाज में पहाड़ बनाम मैदान की राजनीति एक जोखिम भरा और विभाजनकारी राजनीतिक दांव है।
कांग्रेस यदि इसे अपनी चुनावी नैया का पतवार मानती है, तो यह भूल है —
पहाड़ और मैदान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
उत्तराखंड की जनता अब यह स्पष्ट कर चुकी है —
विकास पर वोट मिलेगा, विभाजन पर नहीं
नेतृत्व पर भरोसा होगा, प्रयोगों पर नहीं
मोदी–योगी–धामी की तिकड़ी अभी भी सबसे विश्वसनीय विकल्प है
2027 की जंग केवल गुटों और कहीं-कहीं बयानों से नहीं लड़ी जाएगी —
यह जनता के मन में चल रहे विश्वास बनाम अविश्वास की लड़ाई होगी।
और इस समय जनता का विश्वास जिस ओर है
वह स्पष्ट है, ठोस है, और टूटने वाला नहीं।
“पहाड़ बनाम मैदान की राजनीति: कांग्रेस की नई चाल और जनता का बदलता भरोसा”
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ बनाम मैदान का विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने इसे योजनाबद्ध तरीके से पुनः हवा देने का प्रयास शुरू कर दिया है। उमेश कुमार को आगे कर कांग्रेस मैदान क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपना रही है। संदेश साफ है — कांग्रेस अब पहाड़ी-मैदानी भावनाओं को भुनाकर वोट बैंक की नई रचना करना चाहती है। 2027 में उमेश कुमार कांग्रेस के उम्मीदवार बन चुके थे, और अब फिर उसी कार्ड को खेलकर पार्टी प्रदेश की राजनीति को जातीय-क्षेत्रीय भावनाओं की तरफ मोड़ने की कोशिश कर रही है।
लेकिन इस समय समीकरण पहले जैसे नहीं हैं। आज उत्तराखंड की राजनीति में दो नाम निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं — पुष्कर सिंह धामी और नरेंद्र मोदी। मोदी का करिश्मा और धामी का जमीनी जलवा जनता के बीच प्रत्यक्ष रूप से असर डाल रहा है। पहाड़-मैदान की विभाजनकारी राजनीति के बीच जनता विकास, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देती दिख रही है। कांग्रेस जहाँ क्षेत्रीय असंतोष और राजनीतिक प्रयोगों से चुनावी फायदा तलाश रही है, वहीं भाजपा राष्ट्रीय दृष्टि के साथ “सबका विकास, सबका विश्वास” की लाइन पर चलकर भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव बना चुकी है।
कांग्रेस की यह रणनीति न केवल पुरानी है, बल्कि जोखिमभरी भी। पहाड़ और मैदान के नाम पर प्रदेश को बांटने की कोशिश लोकतांत्रिक भावना का अपमान है। उत्तराखंड की जनता ने राजनीतिक भावनाओं के बजाय राष्ट्रवाद और विकास को महत्व देना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि मोदी का सिद्धांत — “भारत पहले” — आज जनमानस की आत्मा बन चुका है।
कांग्रेस चाहे जितना कार्ड बदले, जनता समझ चुकी है कि प्रदेश को आगे ले जाने के लिए भावनाओं नहीं, स्थिर नेतृत्व और मजबूत राष्ट्रीय दृष्टि की आवश्यकता है। और आज उत्तराखंड में दोनों धुरी भाजपा के पास हैं — मोदी की नीति और धामी की नेतृत्व क्षमता।




