

संपादकीय लेख;उत्तराखंड: सपनों की हत्या और हकीकत की चीख
उत्तराखंड का गठन महज एक भूगोल बदलने की प्रक्रिया नहीं थी, यह उस अस्मिता की लड़ाई थी जिसे पहाड़ों के लोगों ने अपनी हड्डियों के चूरे से जीता था। राज्य आंदोलनकारियों का सपना था कि पहाड़ के लोगों को उनके अधिकार मिलें, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय लोगों का हक़ हो, रोज़गार के अवसर बढ़ें, शिक्षा-स्वास्थ्य बेहतर हो, और उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ?

प्रिंट मीडिया, शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/संपादक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)
1. स्थायी राजधानी: पहाड़ के साथ धोखा
उत्तराखंड का सपना देखने वालों ने कभी नहीं सोचा था कि उनकी राजधानी गैरसैंण की जगह देहरादून में रहेगी। गैरसैंण को सिर्फ एक ‘भावनात्मक टॉफी’ की तरह इस्तेमाल किया गया, और आज भी वह पूर्णकालिक राजधानी बनने से कोसों दूर है। सरकारों ने इसे सिर्फ चुनावी मुद्दा बनाए रखा, लेकिन असली पहाड़वासियों की आवाज़ को अनसुना कर दिया।
2. स्थानीय राजनीति पर बाहरी कब्जा
उत्तराखंड में न तो स्थानीय पार्टियों को प्राथमिकता दी गई और न ही स्थानीय नेताओं को। बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने बाहरी नेताओं को उत्तराखंड की सत्ता पर बैठाया, जिनका इस भूमि से कोई जुड़ाव ही नहीं है। यही कारण है कि यहां के मूल निवासियों की समस्याओं को दरकिनार कर दिया गया। स्थानीय लोगों की भागीदारी कम होने के चलते उनके हक भी छिन गए।
3. मैदान बनाम पहाड़: गहरी होती खाई
उत्तराखंड में क्षेत्रीय असमानता चरम पर है। मैदानों में विकास की गंगा बह रही है, लेकिन पहाड़ों में पानी तक नहीं पहुंच रहा। पहाड़ों में अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, और सड़कों का हाल बदतर है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं, और पलायन आज भी रुका नहीं है। जिन लोगों ने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया, वे ही आज यहां से बाहर जाने को मजबूर हैं।
4. उत्तराखंडियों के अधिकारों का हनन
उत्तराखंड आंदोलनकारियों ने जिस स्वायत्तता और स्थानीय अधिकारों के लिए संघर्ष किया, वह धीरे-धीरे खत्म हो रही है। बाहरी ठेकेदार राज्य के संसाधनों को लूट रहे हैं, सिडकुल में 70% आरक्षण सिर्फ कागजों पर है, और रोजगार के नाम पर स्थानीय युवाओं को सिर्फ चौकीदार और गार्ड बनने के मौके दिए जा रहे हैं। सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार चरम पर है, और रिश्वतखोरी खत्म होने की बजाय और बढ़ गई है।
5. उत्तराखंड में लोकतंत्र की हत्या
अगर कोई सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाए, तो उसे जेल में डाल दिया जाता है। भाजपा सरकार ने उन लोगों को सलाखों के पीछे डाला जो उत्तराखंड के हक की बात कर रहे थे। सवाल पूछने वालों को देशद्रोही ठहराया जाता है, और विरोध को कुचलने के लिए पुलिस-प्रशासन का दुरुपयोग किया जाता है।
6. स्मार्ट सिटी के नाम पर गरीबों की बेदखली
देहरादून और अन्य शहरों में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के नाम पर गरीबों को बेघर किया जा रहा है। जिनका कोई सहारा नहीं, उन्हें उखाड़ फेंका जा रहा है, जबकि बाहरी बिल्डरों और पूंजीपतियों को ज़मीनें कौड़ियों के भाव बेची जा रही हैं। क्या यही था उत्तराखंड बनने का सपना?
7. अपराध और नशे के गढ़ में बदलता उत्तराखंड
उत्तराखंड, जो कभी देवभूमि कहलाता था, आज अपराध और नशे का गढ़ बनता जा रहा है। नशा माफिया पूरे राज्य में पैर पसार चुके हैं, और सरकार की ‘नशा मुक्त उत्तराखंड’ की बातें सिर्फ नारों तक सीमित हैं। उत्तराखंड पुलिस कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा कर रही है, जबकि असली गुनहगार खुलेआम घूम रहे हैं।
8. शहीदों के बलिदान का अपमान
उत्तराखंड राज्य उन्हीं शहीदों के खून से बना, जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगा दी। लेकिन आज उनकी कुर्बानियों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। जो लोग इस राज्य के असली हकदार थे, वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। क्या इसी दिन के लिए उन शहीदों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे?
अब वक्त आ गया है बदलाव का!
उत्तराखंड को फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटने की जरूरत है। यह तभी संभव होगा जब जनता अपनी ताकत पहचाने, भ्रष्टाचार और बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ खड़ी हो, और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करे। यह राज्य आंदोलनकारियों की तपस्या का फल है, इसे किसी के निजी हितों की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिए।
अगर उत्तराखंड के लोग अब भी नहीं जागे, तो यह देवभूमि सिर्फ एक व्यापारिक कॉलोनी बनकर रह जाएगी, जहां असली उत्तराखंडी सिर्फ दर्शक बनकर देखता रहेगा और बाहरी लोग मलाई खाते रहेंगे। यह राज्य तुम्हारा है, इसे बचाने के लिए उठो, जागो और अपने अधिकारों के लिए लड़ो!
प्रिंट मीडिया, शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/संपादक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)




