

संपादकीय रुद्रपुर,उत्तराखंड में बुलडोजर राजनीति: स्मार्ट सिटी की आड़ में उजड़ते हिंदू परिवार?
उत्तराखंड में हिंदूवादी सरकार के रहते हुए भी हिंदू समाज के कई परिवारों के घर और दुकानों पर बुलडोजर चलाए जाने से जनता के बीच आक्रोश पनप रहा है। अवैध रूप से संचालित मदरसों और सरकारी भूमि पर बनी मजारों पर कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन इसके समानांतर पुराने शहरों और हिंदू बहुल इलाकों में तोड़फोड़ से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रिंट मीडिया, शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/संपादक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)
पुराने शहरों पर बुलडोजर क्यों?
प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में यह घोषणा की गई थी कि उत्तराखंड में 12 नए आधुनिक शहरों का निर्माण किया जाएगा। जब नए शहर बसाए जा रहे हैं, तो फिर पुराने शहरों को उजाड़ने की क्या आवश्यकता है? रुद्रपुर रोडवेज क्षेत्र में हिंदू परिवारों के घरों पर बुलडोजर चलाया गया, जबकि उधम सिंह नगर में नए शहरों के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। सवाल यह उठता है कि जब नए शहरों का निर्माण हो रहा है, तो फिर वर्षों से बसे हुए व्यापारियों और परिवारों को उजाड़ना कितना न्यायसंगत है?
व्यापारियों और आम जनता पर बढ़ता दबाव
रुद्रपुर में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पिछले दस वर्षों में कई दुकानदारों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। कई व्यापारियों की रोजी-रोटी छिन चुकी है और वे अब दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इसी बीच रिंग रोड का भी निर्माण किया जा रहा है, जिससे सिडकुल जाने वाले वाहनों का दबाव कम किया जा सकता है। ऐसे में पुराने बाजारों में बुलडोजर चलाने का क्या औचित्य है?
महंगाई की मार और जमीनों के बढ़ते दाम
पिछले दस वर्षों में उत्तराखंड में जमीनों के दाम 70 गुना तक बढ़ चुके हैं, जिससे आम जनता के लिए संपत्ति खरीदना लगभग असंभव हो गया है। रजिस्ट्री शुल्क में भी भारी वृद्धि की गई है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को और अधिक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में जब सरकार बुलडोजर की कार्रवाई करती है, तो प्रभावित परिवार खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करते हैं।
टिहरी विस्थापितों की तरह पुनर्वास क्यों नहीं?
जब टिहरी बांध बनने के कारण हजारों परिवारों को विस्थापित किया गया था, तब उन्हें पहले ही सुरक्षित स्थानों पर बसाया गया था। लेकिन अब उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में, खासकर रुद्रपुर, हल्द्वानी और देहरादून में, बिना पुनर्वास की योजना बनाए ही घरों और दुकानों को तोड़ा जा रहा है। सरकार को चाहिए कि पहले विस्थापन की नीति बनाए और प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करे।
राज्य आंदोलनकारियों और क्षेत्रीय दलों की अनदेखी
उत्तराखंड राज्य के लिए बलिदान देने वाले 42 शहीदों के सपनों को साकार करने के बजाय, सरकार उनके मूल विचारों के विपरीत कार्य कर रही है। विधानसभा में पहाड़ी मूल्यों और उत्तराखंड की संस्कृति पर चर्चा करने वाले विधायकों को रोका जाता है। हाल ही में, प्रदेश अध्यक्ष द्वारा उत्तराखंड की आवाज उठाने वाले नेताओं को “सड़क छाप” तक कह दिया गया, जो कि पूरी तरह से असंवेदनशीलता दर्शाता है।
क्षेत्रीय दलों की अनदेखी का खामियाजा भुगत रहा उत्तराखंड
उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी), जिसने राज्य निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी, आज अस्तित्व संकट से जूझ रहा है। लेकिन इसका नुकसान केवल पार्टी को नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड को हो रहा है। राष्ट्रीय दलों की नीतियों के चलते मूल निवासियों के अधिकारों की अनदेखी हो रही है। यदि उत्तराखंड की जनता क्षेत्रीय दलों को मजबूत नहीं करेगी, तो आगे भी इसी तरह उनकी अनदेखी होती रहेगी।
क्या 2027 में सत्ता परिवर्तन होगा?
भारतीय जनता पार्टी का मौजूदा रवैया देख कर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2027 में भी राज्य की जनता इसी सरकार को दोबारा मौका देगी? कांग्रेस पार्टी पहले ही अपने सत्ता के अहंकार के चलते उत्तराखंड में कमजोर पड़ चुकी है, और अब यदि भाजपा भी इसी राह पर चलती रही, तो 2027 में उसे भी बड़ा झटका लग सकता है।
उत्तराखंड की जनता अब जवाब मांग रही है। क्या सरकार स्मार्ट सिटी के नाम पर अपने ही लोगों को उजाड़ती रहेगी, या फिर कोई संवेदनशील नीति बनाएगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि जनता अब चुप नहीं बैठेगी।




