

स्मरण और आत्ममंथन30 अगस्त, 2025।
यह दिन सिर्फ एक पुण्यतिथि नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के उस संघर्षपूर्ण इतिहास को याद करने का अवसर है जिसने हमें राज्य का सपना दिखाया और उसे साकार करने की दिशा दी।
आज द्वाराहाट के शीतला पुष्कर मैदान में आयोजित संगोष्ठी – “उत्तराखंड के 25 साल: परिकल्पना और हकीकत” – इसी सवाल को उठाती है कि क्या वास्तव में वह सपना पूरा हुआ, जिसके लिए हजारों आंदोलनकारियों ने अपना जीवन न्योछावर किया था?
उत्तराखंड आंदोलन के प्रखर समाजवादी नेता, जननायक और विचारक स्वर्गीय बिपिन त्रिपाठी की 21वीं पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। विपिन त्रिपाठी का जीवन सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे जनसंघर्षों के ऐसे योद्धा थे जिन्होंने उत्तराखंड राज्य के निर्माण और उसकी अस्मिता को बचाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। “हिमालय बचाओ, हिमालय बसाओ” जैसे नारे आज भी हमें उनकी दूरदर्शी सोच की याद दिलाते हैं।

आपातकाल के कठिन दिनों में जेल से निकलने के बाद जनता ने उन्हें जिस आत्मीयता से हाथों-हाथ लिया, वह इस बात का प्रमाण था कि वे केवल नेता नहीं बल्कि जन-आवाज बन चुके थे। उत्तराखंड राज्य के लिए उनकी परिकल्पना सिर्फ भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन पर आधारित एक आदर्श समाज की थी।
आज जब राज्य अपने 25 वर्षों का आकलन कर रहा है, तब त्रिपाठी जी की सोच और भी प्रासंगिक हो उठती है। जरूरत है कि उनके सपनों के अनुरूप राज्य को नई दिशा दी जाए। उनकी पुण्यतिथि पर हम सब उनके आदर्शों को स्मरण कर, एक सशक्त, स्वावलंबी और जनोन्मुखी उत्तराखंड के निर्माण का संकल्प लें।
ॐ शांति।
✍️ संपादकीय राज्य गठन के बाद 25 वर्षों की हकीकत :सपनों से हकीकत तक का कड़वा सफरराज्य निर्माण का क्षण – एक अधूरी जीत
9 नवम्बर 2000 को जब उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, तो पूरी पहाड़ी जनता की आँखों में सपने थे।
लोगों को विश्वास था कि अब –पहाड़ में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ बेहतर होंगी,बेरोज़गार युवाओं को अपने घर में रोजगार मिलेगा,पलायन रुकेगा,और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग पहाड़ के लोगों के हित में होगा।
लेकिन, यह जीत अधूरी थी। यह राज्य जनता के संघर्ष से बना जरूर, पर सत्ता पर काबिज़ हो गए राष्ट्रीय दल – कांग्रेस और भाजपा। जिन दलों ने आंदोलन के दिनों में जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश की थी, वही सत्ता के मालिक बन बैठ
- बेरोज़गारी की भयावहता,उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है – बेरोज़गारी।
25 सालों में सरकारें आईं और गईं, लेकिन युवाओं को स्थायी रोजगार देने में नाकाम रहीं।सरकारी विभागों में भर्तियाँ या तो घोटालों में फँसीं, या वर्षों तक अटकी रहीं।लाखों युवा रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात और विदेशों तक पलायन कर गए।
यह वही उत्तराखंड है जिसके लिए बिपिन त्रिपाठी ने संघर्ष किया था ताकि युवा अपने घर में काम पा सकें। लेकिन सच्चाई यह है कि गांव खाली हो रहे हैं और शहरों में प्रवासी उत्तराखंडी मजदूरी कर रहे हैं। - पलायन – खाली होते गांव,उत्तराखंड का सबसे दुखद दृश्य है – खाली होते गांव।पहाड़ के गांवों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं हैं।खेती छोड़ दी गई है क्योंकि श्रम करने वाले लोग पलायन कर गए हैं।
बुजुर्ग और महिलाएँ अकेले रह गई हैं।
राज्य बनने का मूल उद्देश्य ही था – पलायन रोकना। लेकिन 25 वर्षों में यह समस्या और बढ़ी। - भ्रष्टाचार और माफिया राज,आज का उत्तराखंड खनन, शराब और भू-माफियाओं के कब्ज़े में है।प्राकृतिक संसाधन – नदियाँ, जंगल और जमीन – राजनीतिक संरक्षण में लूटे जा रहे हैं।
भ्रष्टाचार का आलम यह है कि हर सरकारी योजना में दलाल और बिचौलिए हावी हैं।
आम जनता की समस्याएँ अनसुनी रह जाती हैं।क्या यही वह उत्तराखंड था जिसकी परिकल्पना बिपिन त्रिपाठी और इंद्रमणि बडोनी ने की थी? - राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व और UKD का हाशियाकरण
उत्तराखंड राज्य का असली श्रेय तो आंदोलनकारियों और UKD (उत्तराखंड क्रांति दल) को था।
लेकिन 2000 के बाद –
कांग्रेस और भाजपा ने सत्ता बाँट ली।
UKD धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।
आंदोलन की असली आवाज़ दबा दी गई।
यह सबसे बड़ी विडंबना है कि जिन दलों ने कभी आंदोलनकारियों को ‘अलगाववादी’ कहा था, वही दल आज उत्तराखंड की राजनीति में वर्चस्व बनाए हुए हैं।
- असली और नकली नेताओं का फर्क
आज हम देख रहे हैं कि –फर्जी नेता खुद को राज्य निर्माण का नायक बताते हैं।असली आंदोलनकारियों को भुला दिया गया।
राष्ट्रीय दलों ने जनता को जाति और धर्म की राजनीति में उलझा दिया।
याद रखिए –
उत्तराखंड की नींव बिपिन त्रिपाठी, इंद्रमणि बडोनी और हजारों गुमनाम आंदोलनकारियों के बलिदान पर टिकी है।
यदि इन आदर्शों को भुला दिया गया, तो उत्तराखंड का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।
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इस अवसर पर विपिन त्रिपाठी विचार मंच – रचनात्मक उत्तराखंड के तत्वावधान में कार्यक्रम हो रहा है। इसमें के.पी.एस. अधिकारी (अध्यक्ष), चारू तिवारी (समन्वयक) और पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी जैसे समाजसेवी और आंदोलनकारी शामिल हो रहे हैं। इस आयोजन का उद्देश्य है – उस जननायक को याद करना जिसने 1987 से ही उत्तराखंड राज्य की चेतना को जन-जन तक पहुँचाया।
2. आंदोलन की शुरुआत और 1987 की चेतना
उत्तराखंड राज्य का आंदोलन अचानक 1994 में नहीं फूटा। इसकी नींव 1987 में पड़ी थी।
इसी समय से स्व. बिपिन चंद्र त्रिपाठी ने ‘हिमालय बचाओ, हिमालय बसाओ’ अभियान के जरिए राज्य निर्माण का बिगुल बजाया। उन्होंने समझ लिया था कि पहाड़ के लोग पलायन कर रहे हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही है, और दिल्ली-देहरादून की राजनीति उत्तराखंड के हितों को कुचल रही है।
विपिन त्रिपाठी का योगदान इसलिए अग्रणी था क्योंकि उन्होंने सबसे पहले आंदोलन को सिर्फ नौकरी-पानी का सवाल न मानकर उसे सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक अस्मिता का आंदोलन बनाया। यही कारण है कि 1987 से शुरू हुई उनकी चेतना 1994 तक व्यापक जनांदोलन का रूप ले सकी।
3. विपिन त्रिपाठी : एक समाजवादी योद्धा
बिपिन चंद्र त्रिपाठी सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे विचारक थे।
आपातकाल के दिनों में उन्होंने जेल यात्राएँ कीं। जनता उन्हें “जननायक” कहती थी क्योंकि वे सत्ता की लालसा से दूर रहकर सिर्फ जनहित की राजनीति करते थे।
उनका विश्वास था – “हिमालय की रक्षा किए बिना उत्तराखंड का अस्तित्व सुरक्षित नहीं रह सकता।”
आज जब उनकी 21वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया जा रहा है, तो यह सवाल उठाना जरूरी है – क्या हमने उनके सपनों का उत्तराखंड बनाया है?
4. सच्चे बनाम नकली नायक
आज की राजनीति में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो लोग राज्य आंदोलन के खिलाफ थे, वही अब उसके स्वयंभू जनक बन बैठे हैं।
- कभी बीजेपी ने आंदोलनकारियों को “अलगाववादी” कहा।
- कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए उत्तराखंड की मांग को बार-बार दबाया।
- पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे नेता आज स्वयं को उत्तराखंड का हितैषी बताते हैं, जबकि आंदोलन के दिनों में उनकी भूमिका सवालों के घेरे में रही।
असलियत यह है कि यदि उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) का अस्तित्व खत्म हो गया, तो यह मान लेना चाहिए कि पहाड़ी मूल निवासियों की राजनीतिक अस्मिता भी खत्म हो जाएगी।
5. आज का उत्तराखंड : परिकल्पना बनाम हकीकत
25 साल बाद उत्तराखंड की तस्वीर दुखद है –
- बेरोज़गारी चरम पर है।
- पलायन इतना तेज़ है कि गांव खाली हो रहे हैं।
- भ्रष्टाचार और खनन माफिया ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की हालत बदतर है।
क्या यही वह राज्य है जिसकी कल्पना बिपिन त्रिपाठी और इंद्रमणि बडोनी ने की थी?
6. श्रद्धांजलि और संदेश
आज जब हम स्व. बिपिन चंद्र त्रिपाठी को नमन कर रहे हैं, तो यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है।
उन्होंने चेतावनी दी थी –
“तुम कब गुलाम हो जाओगे, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा।”
यह चेतावनी आज सच होती दिख रही है। यदि उत्तराखंड की जनता फर्जी नेताओं और राष्ट्रीय दलों के छलावे में फँसी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी अस्मिता खो देंगी।
✍️ संपादकीय (भाग 2)
जननायक बिपिन त्रिपाठी की पुण्यतिथि पर :1987 से 1994 तक का संघर्ष और तिराहा की त्रासदी7. 1987 – चेतना से संघर्ष की दिशा तक1987 में जब स्व. विपिन चंद्र त्रिपाठी ने ‘हिमालय बचाओ, हिमालय बसाओ’ का नारा दिया, तब बहुतों को यह केवल एक पर्यावरणीय अभियान लगा। लेकिन इसके भीतर असल मुद्दा था – उत्तराखंड के अस्तित्व की रक्षा।
पलायन रोकना,
रोजगार उपलब्ध कराना,
पहाड़ के संसाधनों पर पहाड़ी जनता का अधिकार,
और सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण।
इसी कालखंड से उत्तराखंड की चेतना ने एक नया मोड़ लिया। विपिन त्रिपाठी जैसे नेताओं ने युवाओं और छात्रों को जागरूक करना शुरू किया। कुमाऊँ विश्वविद्यालय और गढ़वाल विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलनों ने भी इसमें नई ऊर्जा भरी।
- 1994 का उभार – खटीमा और मसूरी की गोलियाँ
1994 आते-आते उत्तराखंड राज्य की मांग ने जन-जन में आग भर दी।
लेकिन इस आग को दबाने के लिए तत्कालीन सरकार ने दमन का रास्ता चुना।
1 सितम्बर 1994, खटीमा (ऊधमसिंह नगर) – राज्य आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियाँ बरसाईं। कई निर्दोष युवाओं की मौत हो गई। यह घटना पूरे कुमाऊँ को झकझोर गई।
2 सितम्बर 1994, मसूरी – यहां भी शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर गोलियाँ चलीं। महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया।
इन घटनाओं ने आंदोलन को और उग्र कर दिया। पहाड़ की जनता समझ गई कि दिल्ली–लखनऊ की सत्ता उनकी आवाज़ को सुनना नहीं चाहती, बल्कि कुचलना चाहती है।
- रामपुर तिराहा – बलिदान का प्रतीक
उत्तराखंड आंदोलन का सबसे काला दिन था 2 अक्टूबर 1994।
राजधानी दिल्ली की ओर कूच कर रहे हजारों आंदोलनकारी रामपुर तिराहे (मुरादाबाद–मीरापुर मार्ग) पर रोके गए। वहां हुआ था –
आंदोलनकारियों पर गोलियाँ बरसाईं गईं,
महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार हुए,
कई लोग शहीद हुए।
रामपुर तिराहा कांड सिर्फ एक दमन नहीं था, यह पूरे उत्तराखंड की अस्मिता पर हमला था। इसी घटना ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। इसके बाद दिल्ली और लखनऊ की सत्ता को समझ आ गया कि अब इस आग को दबाना संभव नहीं है।
- आंदोलन का असली चेहरा – जनता का बलिदान
यहां याद रखना ज़रूरी है कि आंदोलन को ताक़त गिने-चुने नेताओं ने नहीं दी, बल्कि –
गांव-गांव की महिलाएँ,
बेरोज़गार युवा,
बुजुर्ग किसान,
और हजारों गुमनाम आंदोलनकारी
उन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर आंदोलन को खड़ा किया।
इंद्रमणि बडोनी, काशी सिंह ऐरी ,नारायण सिंह जंतवाल, स्व. इंद्रमणि बडोनी, और स्व. विपिन त्रिपाठी जैसे नेतृत्वकर्ताओं ने दिशा दी, लेकिन असली ईंधन थी आम जनता।
- फर्जी दावों का सच
आज कुछ लोग (विशेषकर कांग्रेस और भाजपा के नेता) दावा करते हैं कि उत्तराखंड राज्य उनकी देन है।
लेकिन इतिहास गवाह है कि –जब आंदोलनकारियों पर गोलियाँ चल रही थीं, तब ये राष्ट्रीय दल चुप थे।
अटल बिहारी वाजपेयी तक ने आंदोलनकारियों को “अलगाववादी” कहकर बदनाम किया था।कांग्रेस की सरकारों ने पुलिस दमन कराया।
यदि किसी ने उत्तराखंड राज्य की नींव रखी तो वे थे – जननायक बिपिन चंद्र त्रिपाठी और हजारों गुमनाम आंदोलनकारी। - 1994 के बाद की स्थिति।रामपुर तिराहा के बाद आंदोलन थमने वाला नहीं था।
हर गांव से लोग दिल्ली–देहरादून तक पहुंचे।
‘उत्तराखंड क्रांति दल’ भले ही सत्ता की राजनीति में हाशिए पर धकेल दिया गया हो, लेकिन उसका ऐतिहासिक योगदान अमिट है।
1994–2000 तक का संघर्ष यही बताता है कि राज्य का निर्माण जनता के खून और बलिदान से हुआ, न कि किसी दल की मेहरबानी से।
✍️ संपादकीय (भाग 3)
राज्य गठन के बाद 25 वर्षों की हकीकत :सपनों से हकीकत तक का कड़वा सफर
- राज्य निर्माण का क्षण – एक अधूरी जीत
9 नवम्बर 2000 को जब उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, तो पूरी पहाड़ी जनता की आँखों में सपने थे।
लोगों को विश्वास था कि अब –पहाड़ में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ बेहतर होंगी,बेरोज़गार युवाओं को अपने घर में रोजगार मिलेगा,पलायन रुकेगा,और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग पहाड़ के लोगों के हित में होगा।
लेकिन, यह जीत अधूरी थी। यह राज्य जनता के संघर्ष से बना जरूर, पर सत्ता पर काबिज़ हो गए राष्ट्रीय दल – कांग्रेस और भाजपा। जिन दलों ने आंदोलन के दिनों में जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश की थी, वही सत्ता के मालिक बन बैठ - बेरोज़गारी की भयावहता,उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है – बेरोज़गारी।
25 सालों में सरकारें आईं और गईं, लेकिन युवाओं को स्थायी रोजगार देने में नाकाम रहीं।सरकारी विभागों में भर्तियाँ या तो घोटालों में फँसीं, या वर्षों तक अटकी रहीं।लाखों युवा रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात और विदेशों तक पलायन कर गए।
यह वही उत्तराखंड है जिसके लिए बिपिन त्रिपाठी ने संघर्ष किया था ताकि युवा अपने घर में काम पा सकें। लेकिन सच्चाई यह है कि गांव खाली हो रहे हैं और शहरों में प्रवासी उत्तराखंडी मजदूरी कर रहे हैं। - पलायन – खाली होते गांव,उत्तराखंड का सबसे दुखद दृश्य है – खाली होते गांव।पहाड़ के गांवों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं हैं।खेती छोड़ दी गई है क्योंकि श्रम करने वाले लोग पलायन कर गए हैं।
बुजुर्ग और महिलाएँ अकेले रह गई हैं।
राज्य बनने का मूल उद्देश्य ही था – पलायन रोकना। लेकिन 25 वर्षों में यह समस्या और बढ़ी। - भ्रष्टाचार और माफिया राज,आज का उत्तराखंड खनन, शराब और भू-माफियाओं के कब्ज़े में है।प्राकृतिक संसाधन – नदियाँ, जंगल और जमीन – राजनीतिक संरक्षण में लूटे जा रहे हैं।
भ्रष्टाचार का आलम यह है कि हर सरकारी योजना में दलाल और बिचौलिए हावी हैं।
आम जनता की समस्याएँ अनसुनी रह जाती हैं।क्या यही वह उत्तराखंड था जिसकी परिकल्पना बिपिन त्रिपाठी और इंद्रमणि बडोनी ने की थी? - राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व और UKD का हाशियाकरण
उत्तराखंड राज्य का असली श्रेय तो आंदोलनकारियों और UKD (उत्तराखंड क्रांति दल) को था।
लेकिन 2000 के बाद –
कांग्रेस और भाजपा ने सत्ता बाँट ली।
UKD धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।
आंदोलन की असली आवाज़ दबा दी गई।
यह सबसे बड़ी विडंबना है कि जिन दलों ने कभी आंदोलनकारियों को ‘अलगाववादी’ कहा था, वही दल आज उत्तराखंड की राजनीति में वर्चस्व बनाए हुए हैं।
- असली और नकली नेताओं का फर्क
आज हम देख रहे हैं कि –फर्जी नेता खुद को राज्य निर्माण का नायक बताते हैं।असली आंदोलनकारियों को भुला दिया गया।
राष्ट्रीय दलों ने जनता को जाति और धर्म की राजनीति में उलझा दिया।
याद रखिए –
उत्तराखंड की नींव बिपिन त्रिपाठी, इंद्रमणि बडोनी और हजारों गुमनाम आंदोलनकारियों के बलिदान पर टिकी है।
यदि इन आदर्शों को भुला दिया गया, तो उत्तराखंड का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।
क्रमांक संख्या हमने अपने हिसाब से डाली है क्योंकि क्रमांक संख्या के हिसाब से उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना निहित है मतलब ऊपर से नीचे की संख्या में डालने का मतलब उत्तराखंड कहां जा रहा है उसको प्रदर्शित किया है क्रमांक संख्या में




