हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी सामने है, मगर भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी शंखनाद कर दिया है। हल्द्वानी की प्रदेश कार्यसमिति में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, तीरथ सिंह रावत और अनिल बलूनी तक ने कार्यकर्ताओं को लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी और दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य दिया है।
भाजपा का आत्मविश्वास साफ दिखाई देता है। संगठन ने चुनावी रणनीति भी तैयार करनी शुरू कर दी है। मंडल से आगे बढ़कर शक्ति केंद्रों पर फोकस, बूथ स्तर तक संगठन की सक्रियता, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की वापसी, युवा और महिला मतदाताओं पर विशेष ध्यान तथा सरकार की उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड लेकर घर-घर पहुंचने की योजना इसी रणनीति का हिस्सा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
मगर लोकतंत्र में लक्ष्य तय करना अलग बात है और जनता का विश्वास हासिल करना अलग।
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास के दावों को उत्तराखंड का मतदाता अपने जीवन में उसी रूप में महसूस कर रहा है, जिस रूप में पार्टी उसे प्रस्तुत कर रही है?
47 सीटों का लक्ष्य आसान गणित नहीं
उत्तराखंड विधानसभा में 70 सीटें हैं। दो-तिहाई बहुमत के लिए भाजपा को कम से कम 47 सीटें चाहिए। 2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। अब उसी संख्या को पार्टी दोबारा हासिल करने के साथ अपनी जीत को ऐतिहासिक बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
यहां राजनीति का असली गणित शुरू होता है।
2022 की जीत के बाद पांच साल का शासन किसी भी सरकार के लिए उपलब्धियों के साथ जनअपेक्षाओं की परीक्षा भी लेकर आता है। सत्ता में रहते हुए भाजपा को उन सवालों का जवाब देना होगा जो विपक्ष लगातार जनता के सामने रखेगा।
रोजगार और पलायन पर क्या जवाब?
उत्तराखंड के युवाओं के लिए रोजगार आज भी सबसे बड़ा सवाल है। पहाड़ के गांवों से पलायन, सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठते सवाल और निजी क्षेत्र में पर्याप्त अवसरों की तलाश करने वाला युवा वर्ग 2027 के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भाजपा जेन-जी को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बना रही है। मगर जेन-जी को केवल राजनीतिक भाषण से जोड़ना कठिन होगा। वह रोजगार, डिजिटल अवसर, शिक्षा, उद्यमिता और बेहतर भविष्य की ठोस संभावनाएं तलाश रही है।
आंदोलनकारी आज भी सवाल लेकर खड़े हैं
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन की विरासत भाजपा के राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। ऐसे में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों की मांगें भी 2027 के चुनाव में राजनीतिक प्रभाव डाल सकती हैं।
चिन्हीकरण, आश्रितों को रोजगार, क्षैतिज आरक्षण सहित वर्षों से लंबित मांगों को लेकर आंदोलनकारियों की आवाज यदि चुनाव तक जारी रहती है, तो भाजपा सरकार से सवाल पूछा जाएगा कि जिस राज्य की नींव आंदोलनकारियों के संघर्ष से पड़ी, उनके परिवारों की अपेक्षाओं का समाधान कितना हुआ?
यह प्रश्न केवल किसी संगठन का प्रश्न नहीं, उत्तराखंड की राजनीतिक स्मृति का प्रश्न है।
तराई में जातीय और सामाजिक समीकरण
कुमाऊं के मैदान और पहाड़ की राजनीति एक जैसी नहीं है। रुद्रपुर, किच्छा, सितारगंज, गदरपुर, काशीपुर जैसे क्षेत्रों में सामाजिक समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं।
भाजपा ने दलित, बंगाली, पंजाबी, युवा, महिला और पूर्व सैनिक मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित करने के संकेत दिए हैं। यह बताता है कि पार्टी प्रत्येक सामाजिक समूह तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहती है।
मगर मतदाता भी राजनीतिक रूप से पहले से अधिक सजग है। उसे केवल यह सुनना पर्याप्त नहीं होगा कि सरकार ने क्या बनाया; वह यह भी पूछेगा कि उसके मोहल्ले की सड़क कैसी है, अस्पताल में सुविधा कैसी है, रोजगार कहां है, सरकारी कार्यालयों में काम कितनी आसानी से होता है और स्थानीय समस्याओं का समाधान किस गति से हुआ।
राष्ट्रवाद बनाम स्थानीय मुद्दे
नितिन नवीन के भाषण में वंदे मातरम्, राष्ट्रवाद, कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखे हमले प्रमुख रहे। भाजपा लंबे समय से राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण आधार बनाती रही है।
मगर उत्तराखंड का मतदाता राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ होने के साथ अपने स्थानीय प्रश्नों को भी उतनी ही गंभीरता से देखता है।
चारधाम, सीमा सुरक्षा, सैनिक परंपरा और राष्ट्रीय सुरक्षा उत्तराखंड की भावनात्मक पहचान से जुड़े विषय हैं। साथ ही रोजगार, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास भी उसी मतदाता की प्राथमिकताएं हैं।
इसलिए 2027 का चुनाव केवल भावनात्मक मुद्दों पर टिकेगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
विपक्ष की कमजोरी भाजपा की ताकत बन सकती है?
भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की कथित विभाजनकारी और नकारात्मक राजनीति पर लगातार हमला किया है। इसमें भाजपा की चुनावी रणनीति का दूसरा पहलू दिखाई देता है—सरकार के कामकाज के साथ विपक्ष को चुनावी मुद्दा बनाना।
यदि विपक्ष मजबूत वैकल्पिक एजेंडा जनता के सामने रखने में सफल रहता है तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। यदि विपक्ष आपसी खींचतान में उलझा रहा तो भाजपा के लिए सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करना आसान हो सकता है।
यही कारण है कि भाजपा अभी से संगठन को बूथ और शक्ति केंद्र तक सक्रिय कर रही है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा के सामने चुनौती विपक्ष से अधिक उसकी अपनी सरकार की पांच साल की कार्यप्रणाली होगी।
जनता पूछेगी—
कितने युवाओं को रोजगार मिला?
पलायन कितना रुका?
पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति कितनी सुधरी?
राज्य आंदोलनकारियों की लंबित मांगों का समाधान कितना हुआ?
भू-कानून और मूल निवास पर सरकार का स्पष्ट रोडमैप क्या है?
महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता कितनी बढ़ी?
किसानों की आय और बाजार की स्थिति में कितना सुधार हुआ?
शहरों की सड़क, यातायात और जलनिकासी की समस्या कितनी दूर हुई?
इन सवालों के जवाब 2027 के चुनाव में भाजपा के दावों की वास्तविक कसौटी बनेंगे।
दो-तिहाई बहुमत का दावा, जनता की मुहर का इंतजार
भाजपा ने अपना लक्ष्य घोषित कर दिया है। 47 से आगे निकलकर दो-तिहाई बहुमत हासिल करना और लगातार तीसरी बार सरकार बनाना पार्टी के सामने स्पष्ट राजनीतिक मिशन है।
मगर उत्तराखंड की जनता किसी भी दल को स्थायी बहुमत की गारंटी नहीं देती। यहां सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक परंपरा रही है। भाजपा इस परंपरा को बदलने का दावा कर रही है।
2027 में असली मुकाबला भाजपा के संगठन और विपक्ष की रणनीति के बीच ही होगा, मगर निर्णायक भूमिका उस मतदाता की होगी जो पांच साल के कामकाज को अपने अनुभव की कसौटी पर परखेगा।
भाजपा ने 2027 की लड़ाई का लक्ष्य तय कर दिया है। अब जनता तय करेगी कि दो-तिहाई बहुमत का यह सपना विकास के रिपोर्ट कार्ड से पूरा होगा या उत्तराखंड के स्थानीय सवाल चुनावी गणित बदल देंगे।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट?
सत्ता का दावा मंच से किया जा सकता है, मगर सत्ता का फैसला जनता की चौपाल पर होता है। 2027 में भाजपा के सामने सबसे बड़ा चुनाव विपक्ष से मुकाबले का नहीं, अपने पांच साल के काम का हिसाब देने का होगा।
