बघाणगढ़ी युद्ध में कत्यूरी राजा सकालदेव की वीरगाथा का उल्लेख, चंदन सिंह मनराल ने रखा ऐतिहासिक विवरण

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रुद्रपुर। कत्यूरी इतिहास और गढ़वाल-चंद संबंधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंग को सामने रखते हुए चंदन सिंह मनराल ने सन् 1590-91 के बघाणगढ़ी युद्ध और कत्यूरी राजा सकालदेव से संबंधित घटनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार इस दौर में कुमाऊं के चंद राजा रुद्र चंद और गढ़वाल के राजा बलभद्र शाह के बीच संघर्ष हुआ था, जिसमें कत्यूरी क्षेत्र के रणचूली हाट के अंतिम मांडलिक राजा सकालदेव की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
मनराल के अनुसार उस समय राजा सकालदेव चंद शासकों के सामंत बन चुके थे। बघाणगढ़ी क्षेत्र में हुए संघर्ष के दौरान उन्होंने गढ़वाल के राजा बलभद्र शाह की सेना को अपने किले के भीतर शरण दी थी। इसी कारण चंद राजा रुद्र चंद ने उन्हें बंदी बना लिया। बताया जाता है कि बोरौ के जागीरदार बोरा, जो सकालदेव के निकट मित्र थे, उनकी जमानत पर सकालदेव को रिहा कराया गया।
मनराल के अनुसार रिहाई के बाद भी सकालदेव ने रुद्र चंद की शर्तें स्वीकार करने के बजाय उनके विरुद्ध संघर्ष का रास्ता चुना। युद्ध में सकालदेव अपने परिवार सहित मारे गए। इस प्रसंग को वह कत्यूरी परंपरा में वीरता और स्वाभिमान से जुड़े महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
पुरखु पंत और रातूपडियार का प्रसंग
बघाणगढ़ी युद्ध से जुड़े दूसरे प्रसंग का उल्लेख करते हुए मनराल ने बताया कि गढ़वाल की ओर से युद्ध का नेतृत्व पुरखु पंत ने किया था। उनके अनुसार पुरखु पंत ने इससे पहले शिराकोट पर विजय प्राप्त की थी, लेकिन बघाणगढ़ी के संघर्ष में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


मनराल के अनुसार युद्ध से लौटते समय बैजनाथ के निकट कत्यूरी राजाओं के दीवान और सेनापति रातूपडियार ने पुरखु पंत को मार दिया था। उनका दावा है कि इस घटना का उल्लेख स्वर्गीय त्रिलोचन पंत ने वर्ष 1900 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में पडियार राजपूतों के संदर्भ में किया है। उनके अनुसार रातूपडियार द्वारा पुरखु पंत का कटा हुआ सिर गढ़वाल के राजा के पास भेजा गया, जिससे प्रसन्न होकर राजा ने पडियार परिवार के लोगों को गढ़वाल क्षेत्र में कई गांव जागीर के रूप में प्रदान किए।
बलभद्र शाह और राम शाह का संदर्भ
मनराल के ऐतिहासिक विवरण में गढ़वाल के तत्कालीन शासक बलभद्र शाह का भी विशेष उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार बलभद्र शाह को राम शाह के नाम से भी जाना जाता था और वे शाह उपाधि धारण करने वाले प्रारंभिक गढ़वाल शासकों में माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस संबंध में अकबरनामा में भी उल्लेख मिलता है।
उनके अनुसार कत्यूरी क्षेत्र के रणचूली हाट के अंतिम मांडलिक राजा सकालदेव और बलभद्र शाह के बीच मित्रता थी। इसी संबंध के कारण बघाणगढ़ी संघर्ष के दौरान सकालदेव ने गढ़वाल की सेना को अपने किले में आश्रय दिया था।
नंदा राजजात मार्ग और लाटू देवता का संबंध
चंदन सिंह मनराल ने बघाणगढ़ी के सरदारों और नंदा राजजात यात्रा मार्ग से जुड़े एक अन्य ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रसंग का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार बघाणगढ़ी के सरदार चंद्रवंशी राजपूत थे और यह क्षेत्र नंदा राजजात यात्रा मार्ग पर पड़ता है।
उनका कहना है कि उस समय यह क्षेत्र गढ़वाल राजा बलभद्र शाह के अधीन सीमा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। इसी परिवार में लाटू नाम का एक वीर योद्धा हुआ, जिसे नंदा देवी का भाई माना गया। क्षेत्र में लाटू देवता का मंदिर आज भी इस लोकपरंपरा से जुड़ा हुआ है।
मनराल के अनुसार इस परंपरा में नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार चंद राजा उस प्रतिमा को अपने साथ ले आए और बाद में अल्मोड़ा स्थित नंदा देवी मंदिर में उसकी स्थापना की गई।
इतिहास, लोकपरंपरा और दस्तावेजी प्रमाण
कत्यूरी, चंद और गढ़वाल के मध्य संबंधों से जुड़े ये प्रसंग उत्तराखंड के मध्यकालीन इतिहास, लोकपरंपराओं और क्षेत्रीय राजवंशों के संबंधों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हालांकि इन घटनाओं के अलग-अलग विवरण लोककथाओं, वंश परंपराओं और ऐतिहासिक ग्रंथों में भिन्न रूप में मिल सकते हैं। इसलिए इनके प्रकाशन के साथ संबंधित मूल ग्रंथों, अभिलेखों और समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों का संदर्भ देना उपयोगी रहेगा।
— चंदन सिंह मनराल
(कत्यूरी, सूर्यवंशी)


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