किच्छा चुनाव: मतदान से पहले से मतदान के बाद तक बदलती सियासी तस्वीर बेहड़-शुक्ला टकराव के बीच कांग्रेस प्रत्याशी को संभावित राजनीतिक लाभ, विकास शर्मा के वायरल वीडियो ने भी बढ़ाई चर्चा

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किच्छा/रुद्रपुर। किच्छा नगर पालिका परिषद का चुनाव मतदान समाप्त होने के साथ ही अब मतगणना और परिणाम की प्रतीक्षा में पहुंच गया है, लेकिन चुनावी राजनीति का तापमान अभी कम नहीं हुआ है। 22 सितंबर को मतदान के दिन स्ट्रांग रूम के बाहर कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ और भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के समर्थकों के बीच हुआ विवाद इस पूरे चुनाव का सबसे चर्चित घटनाक्रम बन गया है। दोनों पक्षों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप हुए, पुलिस ने दोनों नेताओं को हिरासत में लिया और बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


इस घटनाक्रम से पहले तक किच्छा में मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह और भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा के बीच माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने भी व्यापक जनसंपर्क किया। पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने संदीप अरोड़ा के समर्थन में घर-घर जाकर प्रचार किया, जबकि विधायक तिलक राज बेहड़ कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में सक्रिय रहे।
मतदान से पहले भाजपा का अभियान भी मजबूत
चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा ने किच्छा में संगठनात्मक ताकत दिखाई। रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा ने भी भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा के समर्थन में विभिन्न वार्डों में सभाएं और नुक्कड़ बैठकें कीं। इससे भाजपा के अभियान को स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त राजनीतिक दृश्यता मिली।
इसी दौरान कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला और अधिक सीधा होता गया। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषणों में भी चुनाव को केवल अध्यक्ष पद का चुनाव न मानकर तिलक राज बेहड़ और राजेश शुक्ला की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा गया।
यही कारण है कि मतदान से पहले की राजनीतिक स्थिति और मतदान समाप्त होने के बाद की परिस्थितियों की तुलना करना महत्वपूर्ण हो गया है।
विकास शर्मा का वीडियो और सोशल मीडिया की भूमिका
चुनाव प्रचार के दौरान रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें किच्छा में भाजपा और कांग्रेस को धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ में अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत करते हुए मतदान की अपील किए जाने का दावा किया गया। कुछ स्थानीय मीडिया रिपोर्टों ने इसे विवादित और सांप्रदायिक बयान के रूप में रिपोर्ट किया है।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है—वायरल वीडियो की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग पक्ष अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। इसलिए यह कहना अभी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि वीडियो के कारण किसी निश्चित संख्या में मतदाता कांग्रेस की ओर चले गए। हालांकि, इतना जरूर कहा जा सकता है कि वीडियो ने चुनावी बहस को विकास, स्थानीय मुद्दों और प्रत्याशियों से हटाकर पहचान एवं धार्मिक राजनीति की चर्चा की ओर मोड़ दिया।
सोशल मीडिया के दौर में किसी नेता का कुछ सेकंड का वीडियो भी चुनावी विमर्श को तेजी से प्रभावित कर सकता है। किच्छा में भी यही देखने को मिला कि मतदान से ठीक पहले वीडियो पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हुईं।
फिर आया बेहड़-शुक्ला टकराव
22 सितंबर को मतदान के बाद मंडी समिति स्थित स्ट्रांग रूम में मतपेटियां रखने की व्यवस्था को लेकर विवाद शुरू हुआ। रिपोर्टों के अनुसार स्ट्रांग रूम के बाहर पर्दे लगाए जाने पर विधायक तिलक राज बेहड़ ने आपत्ति जताई। इसके बाद पूर्व विधायक राजेश शुक्ला भी मौके पर पहुंचे और दोनों पक्षों में कहासुनी तथा धक्का-मुक्की की स्थिति बनी।
विधायक बेहड़ ने आरोप लगाया कि उनके साथ धक्का-मुक्की हुई और उन्हें थप्पड़ मारा गया। दूसरी ओर भाजपा पक्ष ने भी घटनाक्रम को लेकर अपने आरोप लगाए। पुलिस ने स्थिति बिगड़ने पर दोनों नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में दोनों को छोड़ दिया गया।
इस मामले में सोशल मीडिया पर अनेक दावे और वीडियो प्रसारित हुए हैं, लेकिन हर वायरल दावा स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है। इसलिए किसी व्यक्ति पर थप्पड़ मारने, गाली देने या किसी विशेष कृत्य का आरोप केवल सोशल मीडिया सामग्री के आधार पर तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
बेहड़ के बेहोश होने की तस्वीरें बनीं चर्चा का केंद्र
घटनाक्रम के दौरान विधायक बेहड़ के धरने पर बैठने और बाद में उनकी तबीयत बिगड़ने तथा बेहोश होने की खबरें भी सामने आईं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों ने इस घटनाक्रम को अलग-अलग शब्दों में रिपोर्ट किया है।
राजनीतिक दृष्टि से इसका एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह रहा कि चुनाव की चर्चा प्रत्याशियों से हटकर दो प्रमुख नेताओं के बीच टकराव और उससे जुड़ी भावनात्मक तस्वीरों पर केंद्रित हो गई।
सोशल मीडिया पर बेहड़ के समर्थन में सहानुभूति वाली प्रतिक्रियाएं दिखाई देने की बात स्थानीय स्तर पर कही जा रही है, लेकिन सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं को पूरे निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की राय मानना सही नहीं होगा। वास्तविक राजनीतिक प्रभाव का आकलन मतगणना के बाद ही संभव होगा।
मतदान प्रतिशत भी महत्वपूर्ण संकेत पालिका चुनाव: सिरौली में 83.87 तो किच्छा में 81.16 प्रतिशत हुआ मतदान“किच्छा में मतदान खत्म, अब स्ट्रांग रूम में बंद हुआ प्रत्याशियों का भाग्य—शांतिपूर्ण मतदान के बाद परिणाम पर टिकीं निगाहें।


कम मतदान प्रतिशत की स्थिति में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किस सामाजिक, वार्डवार और राजनीतिक समूह ने कितनी संख्या में मतदान किया। केवल मतदान प्रतिशत के आधार पर किसी प्रत्याशी के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
क्या कांग्रेस को राजनीतिक लाभ मिल सकता है?
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो घटनाक्रम कांग्रेस को कुछ मुद्दों पर प्रचार का अवसर अवश्य देता है। कांग्रेस यह तर्क रख सकती है कि उसके विधायक के साथ विवाद हुआ और मतदान के बाद उनका धरने पर बैठना तथा हिरासत में लिया जाना राजनीतिक रूप से उसके पक्ष में सहानुभूति पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर भाजपा के पास अपना पक्ष रखने का अवसर है। पार्टी यह कह सकती है कि घटनाक्रम को एकतरफा तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए और दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों में भाजपा पक्ष की ओर से भी दुर्व्यवहार तथा पुलिस कार्रवाई को लेकर आरोप सामने आए हैं।
इसलिए अभी यह घोषित करना कि घटनाक्रम ने निश्चित रूप से कांग्रेस को चुनाव जिताने वाली लहर पैदा कर दी है, परिणाम से पहले जल्दबाजी होगी।
विकास शर्मा के लिए भी राजनीतिक संदेश
महापौर विकास शर्मा किच्छा में भाजपा के प्रचार अभियान में सक्रिय रहे थे। उनके चुनाव प्रचार से संबंधित गतिविधियां मतदान से पहले सार्वजनिक रूप से सामने आई थीं।
वायरल वीडियो के बाद उनकी भूमिका पर सोशल मीडिया में बहस शुरू हुई। इसका असर कितना हुआ, यह वार्डवार मतदान और परिणाम से ही स्पष्ट होगा। यदि भाजपा प्रत्याशी का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहता है, तो पार्टी के भीतर चुनाव प्रचार की रणनीति, नेताओं के बयानों और सोशल मीडिया संचार की समीक्षा होना स्वाभाविक है। लेकिन परिणाम आने से पहले यह कहना कि विकास शर्मा पूरी तरह राजनीतिक रूप से हाशिये पर चले गए हैं, एक निष्कर्ष होगा, स्थापित तथ्य नहीं।
2027 से पहले क्या संकेत?
किच्छा का यह चुनाव उत्तराखंड की राजनीति के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों में सामने आने वाले मुद्दे और राजनीतिक व्यवहार भविष्य के विधानसभा विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। मगर एक नगर पालिका का परिणाम पूरे राज्य के मतदाताओं की राजनीतिक दिशा का सीधा प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
फिर भी किच्छा में सामने आए तीन मुद्दे—स्थानीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा, सोशल मीडिया पर वायरल राजनीतिक सामग्री और मतदान के बाद प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर विवाद—आने वाले राजनीतिक विमर्श में लंबे समय तक चर्चा का विषय रह सकते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल—मतपेटियों में क्या निकलेगा?
किच्छा में मतदान समाप्त हो चुका है। अब राजनीतिक दावों, सोशल मीडिया की बहस और नेताओं की बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण मतपेटियों का परिणाम होगा।
यदि कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह मजबूत प्रदर्शन करते हैं तो कांग्रेस इसे तिलक राज बेहड़ की राजनीतिक पकड़ और चुनाव के अंतिम दौर में बने माहौल से जोड़ सकती है। यदि भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा मजबूत परिणाम देते हैं तो भाजपा अपने संगठन, प्रचार अभियान और मतदाताओं के समर्थन को इसका आधार बताएगी।
इसलिए फिलहाल सबसे तथ्यात्मक निष्कर्ष यही है कि किच्छा का चुनाव परिणाम आने से पहले राजनीतिक हवा की दिशा पर कई दावे किए जा सकते हैं, लेकिन निर्णायक निष्कर्ष मतगणना के बाद ही संभव होगा।
एक बात निश्चित है—किच्छा नगर पालिका चुनाव अब केवल एक स्थानीय निकाय चुनाव नहीं रह गया है। तिलक राज बेहड़ और राजेश शुक्ला के बीच हुआ टकराव, विकास शर्मा के वायरल वीडियो पर उठी बहस और मतदान के बाद स्ट्रांग रूम को लेकर हुए विवाद ने इस चुनाव को पूरे ऊधमसिंह नगर की राजनीति में बड़ा विषय बना दिया है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के लिए यह सवाल अब भी खुला है—क्या किच्छा की मतपेटियां मतदान से पहले बने समीकरणों की कहानी लिखेंगी या मतदान के अंतिम घंटों में बदले राजनीतिक माहौल की? इसका जवाब मतगणना के दिन मिलेगा।
उपलब्ध रिपोर्टों में बेहड़ द्वारा थप्पड़ मारे जाने का आरोप दर्ज है, लेकिन इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि मुझे उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में नहीं मिली। इसी तरह गाली-गलौज के विशिष्ट दावों को तथ्य के रूप में शामिल नहीं किया गया है। 22 सितंबर की देर रात मतपेटियां जमा करने को लेकर कांग्रेस प्रत्याशी की ओर से भी गंभीर आरोप लगाए जाने की रिपोर्ट है; इन्हें भी आरोप के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।


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