किसान धरना स्थगित, चेतावनी कायम—मिशन 2027 में खेत की आवाज कितनी दूर जाएगी?

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संपादकीय आईना | 23 अगस्त 2026
उत्तराखंड में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत गुट) की ओर से छह जिलों में चल रहा तीन दिवसीय कलेक्ट्रेट धरना स्थगित हो गया। किसानों ने आठ सूत्रीय मांगों का ज्ञापन प्रशासन को सौंपा और अब सोमवार को जिलाधिकारी के साथ प्रस्तावित बैठक का इंतजार है। आंदोलन फिलहाल टेंट से उठ गया है, लंगर की व्यवस्था समाप्त हो गई है और किसान अपने-अपने क्षेत्रों की ओर लौट गए हैं, मगर आंदोलन की चेतावनी अभी पूरी तरह कायम है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


किसान नेताओं ने साफ संदेश दिया है कि सरकार और शासन के पास मांगों पर गंभीरता से काम करने के लिए समय है। यदि निर्धारित अवधि में समाधान की दिशा में ठोस कदम दिखाई देते हैं तो किसान धन्यवाद करेंगे। मांगें लंबित रहीं तो रुद्रपुर में अगली रणनीति तय होगी और एक माह बाद खटीमा से ट्रैक्टर मार्च निकालकर देहरादून कूच की चेतावनी दी गई है। किसानों ने यहां तक कहा है कि जरूरत पड़ी तो देहरादून को उसी अंदाज में घेरा जाएगा, जिस तरह कभी देश की राजधानी दिल्ली में किसानों ने लंबा आंदोलन खड़ा किया था।
यह चेतावनी उत्तराखंड की राजनीति के लिए साधारण घटना समझना भारी भूल होगी।
यह आंदोलन एक राजनीतिक कार्यक्रम भी था। राजनीति का अर्थ केवल किसी दल का झंडा या चुनावी मंच नहीं होता। जब किसानों की आर्थिक समस्याएं, भूमि, रोजगार, कृषि लागत, बाजार, बिजली, सिंचाई, प्रशासनिक व्यवस्था और ग्रामीण जीवन से जुड़े सवाल सरकार के सामने सामूहिक शक्ति के साथ रखे जाते हैं, तो वह लोकतांत्रिक राजनीति का ही हिस्सा बन जाते हैं। इस दृष्टि से रुद्रपुर कलेक्ट्रेट पर हुआ किसान धरना आने वाले मिशन 2027 की जमीन पर एक महत्वपूर्ण संकेत छोड़ गया है।
सबसे बड़ा संदेश यह है कि किसान अभी भी बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है। तीन दिन तक कलेक्ट्रेट के बाहर डेरा डालने के बाद भी किसानों ने टकराव का रास्ता छोड़कर प्रशासन को ज्ञापन दिया। जिलाधिकारी की अनुपस्थिति को लेकर सवाल उठे। प्रशासन की ओर से जिलाधिकारी के परिवार में गंभीर परेशानी की जानकारी दी गई। इसके बाद किसानों ने सीडीओ को ज्ञापन सौंपने पर सहमति बनाई। किसान नेताओं ने भी स्पष्ट किया कि मुद्दा व्यक्ति का नहीं, मांगों के समाधान का है।
यही लोकतांत्रिक परिपक्वता इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत रही।
पुलिस की ओर से बैरिकेडिंग की गई। ऐसे माहौल में बैरिकेड अक्सर तनाव बढ़ाने का प्रतीक बन जाते हैं। किसानों के बीच इसे उकसावे की कोशिश के रूप में देखा गया। फिर भी उत्तराखंड के किसानों ने संयम रखा। टेंट लगा, लंगर चला, किसान बैठे रहे, अपनी बात रखते रहे और पत्रकारों ने पूरे घटनाक्रम को व्यापक रूप से जनता के सामने पहुंचाया। किसी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ से तय नहीं होती। अनुशासन, मुद्दों की स्पष्टता और जनता के बीच विश्वसनीयता भी उसकी ताकत होती है।
इस आंदोलन ने यह भी साबित किया कि उत्तराखंड का किसान अपने अधिकारों की लड़ाई को धार्मिक या सामुदायिक रंग में देखने के बजाय आर्थिक और सामाजिक सवालों के रूप में सामने रखना चाहता है।
बीच में यह धारणा फैलाने की कोशिश हुई कि यह किसी एक समुदाय या सरदार समाज का आंदोलन है। ऐसी धारणा आंदोलन के वास्तविक स्वरूप को छोटा करती है। यह किसानों का आंदोलन था—छोटे किसान का, सीमांत किसान का, खेत में मेहनत करने वाले किसान का, कृषि मजदूर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े परिवारों का। किसान की पहचान उसकी पगड़ी, टोपी, जाति या धर्म से पहले उसके खेत और उसकी मेहनत से होती है। आंदोलन में शामिल किसान ड्राइवर हो सकता है, छोटा दुकानदार हो सकता है, खेतिहर मजदूर हो सकता है या कई एकड़ जमीन वाला किसान हो सकता है। उसकी समस्याओं की जड़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में है।
इसीलिए इस आंदोलन को किसी समुदाय विशेष के चश्मे से देखना उत्तराखंड के सामाजिक ताने-बाने के साथ भी न्याय नहीं होगा।
अब असली परीक्षा प्रशासन और शासन की है।
आठ सूत्रीय ज्ञापन सौंप दिया गया है। अधिकारियों ने जिला स्तर की समस्याओं पर अधिकतम समाधान का भरोसा दिया है और नीतिगत मामलों को शासन तक भेजने की बात कही है। सोमवार को जिलाधिकारी के साथ बैठक तय बताई गई है। इस बैठक को महज औपचारिकता में बदलना किसानों के धैर्य की परीक्षा लेना होगा। किसानों ने आंदोलन स्थगित करके सरकार को अवसर दिया है। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस अवसर को समाधान में बदले।
सवाल यह भी है कि किसान को अपनी मांग रखने के लिए बार-बार सड़क पर क्यों उतरना पड़ता है? लोकतंत्र में आंदोलन अधिकार है, मगर यदि प्रशासनिक व्यवस्था शिकायतों के समाधान की मजबूत व्यवस्था बना दे तो आंदोलन की नौबत कम हो सकती है। किसान को ज्ञापन देने, धरना देने और फिर ट्रैक्टर मार्च की चेतावनी देने के बाद ही सुना जाए, तो यह शासन की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
मिशन 2027 के संदर्भ में यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी राजनीति में किसान और ग्रामीण मतदाता की भूमिका निर्णायक है। उत्तराखंड के पहाड़ से लेकर तराई तक कृषि अर्थव्यवस्था हजारों परिवारों के जीवन का आधार है। ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, नैनीताल के तराई क्षेत्र और कुमाऊं-गढ़वाल के ग्रामीण इलाकों में किसानों के सवाल सीधे राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
सरकार के लिए यह आंदोलन चेतावनी से अधिक एक अवसर है। आठ सूत्रीय मांगों में से जितनी मांगें प्रशासनिक स्तर पर हल हो सकती हैं, उन्हें समयबद्ध तरीके से हल किया जाए। जिन विषयों पर शासन या केंद्र स्तर के निर्णय आवश्यक हैं, उन पर किसानों को स्पष्ट समयसीमा और कार्रवाई की स्थिति बताई जाए। केवल आश्वासन की राजनीति लंबे समय तक भरोसा कायम नहीं रख सकती।
किसान नेताओं ने एक माह बाद खटीमा से ट्रैक्टर मार्च की चेतावनी देकर गेंद सरकार के पाले में डाल दी है। यह ऐसा राजनीतिक दबाव है जिसे हल्के में लेना सत्ताधारी तंत्र के लिए महंगा पड़ सकता है। पांच साल पहले दिल्ली की सीमाओं पर हुए किसान आंदोलन की स्मृति अभी भी देश की राजनीति में मौजूद है। उत्तराखंड में उसी तरह का कोई बड़ा आंदोलन आकार ले, उससे पहले संवाद और समाधान की पहल बेहतर रास्ता होगा।
दूसरी तरफ किसान नेतृत्व के लिए भी आत्ममंथन जरूरी है। आंदोलन की शक्ति केवल संख्या में नहीं, मुद्दों की स्पष्टता में होती है। प्रत्येक मांग का तथ्य, आर्थिक प्रभाव, प्रशासनिक जिम्मेदारी और समाधान का रास्ता जनता के सामने रखा जाना चाहिए। शांतिपूर्ण आंदोलन की मर्यादा कायम रखना किसान नेतृत्व की नैतिक शक्ति को और बढ़ाएगा।
पत्रकारिता की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण रही। कलेक्ट्रेट के बाहर किसानों की आवाज को मीडिया ने प्रमुखता से जनता तक पहुंचाया। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी पक्ष का प्रचार करना नहीं, बल्कि घटनास्थल पर मौजूद सवालों को समाज और सत्ता के सामने रखना है। किसानों की मांगें, प्रशासन का पक्ष, पुलिस की भूमिका और आंदोलन की वास्तविक तस्वीर—इन सभी को जनता के सामने रखना ही जिम्मेदार पत्रकारिता है।
रुद्रपुर का यह तीन दिवसीय धरना स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं। किसान फिलहाल घर लौटे हैं, सवाल लेकर। सरकार के पास अब समय है, समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने का। सोमवार की बैठक इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होगी।
संपादकीय आईना सरकार से एक सीधा सवाल पूछता है—क्या किसान को अगली बार ट्रैक्टर लेकर देहरादून पहुंचने की जरूरत पड़ेगी, या उसकी आवाज कलेक्ट्रेट के सभागार में ही सुनी जाएगी?
मिशन 2027 की राजनीति में यह सवाल छोटा दिखाई दे सकता है, मगर इसका असर खेत से लेकर विधानसभा तक पहुंच सकता है। उत्तराखंड का किसान शांत है, संयमित है और बातचीत का रास्ता खुला रखे हुए है। इस शांति को कमजोरी समझना सत्ता की बड़ी भूल होगी।
क्योंकि खेत में खड़ा किसान जब लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग लेकर सड़क पर उतरता है, तो वह केवल अपनी फसल की कीमत नहीं पूछता—वह शासन की प्राथमिकताएं, प्रशासन की संवेदनशीलता और लोकतंत्र की जवाबदेही भी पूछता है।
अब उत्तर सरकार को देना है।


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