रुद्रपुर। चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने नया निगरानी तंत्र लागू करने का फैसला किया है। एक सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी की खपत करने वाले बड़े उपभोक्ता अपने पास 15 दिन की औसत जरूरत से अधिक स्टॉक नहीं रख सकेंगे। सरकार जीएसटी रिटर्न के माध्यम से चीनी की खरीद और खपत का मिलान करेगी और जरूरत से ज्यादा स्टॉक पर नजर रखी जाएगी।
कागज पर व्यवस्था सख्त दिखाई देती है, मगर सवाल यह है कि चीनी की कीमतों और उपलब्धता पर असली दबाव पैदा करने वाले कारणों पर सरकार कितनी गंभीर है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
एक तरफ गन्ने से बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है और दूसरी तरफ चीनी के बड़े उपभोक्ताओं को स्टॉक सीमा के दायरे में लाकर जमाखोरी रोकने का दावा किया जा रहा है। आम आदमी के सामने सवाल सीधा है—अगर उत्पादन का एक हिस्सा चीनी के बजाय एथेनॉल में जाएगा तो बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव आएगा या नहीं?
यही कारण है कि सरकार का यह नया सिस्टम कई लोगों को जमाखोरी रोकने से ज्यादा प्रशासनिक खानापूर्ति और ढकोसला दिखाई दे रहा है। जमाखोरी करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, मगर उसके साथ उत्पादन, एथेनॉल नीति, चीनी की उपलब्धता और कीमतों के पूरे समीकरण पर भी सरकार को जवाब देना होगा।
एथेनॉल नीति का दूसरा पहलू भी देखना होगा
सरकार एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा देकर पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने और किसानों के लिए गन्ने का वैकल्पिक बाजार तैयार करने की बात करती है। मगर उपभोक्ता के स्तर पर इसकी कीमत भी सामने आ रही है।
एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होने के कारण मिश्रित ईंधन में कई वाहनों को समान दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। पुराने वाहनों में ईंधन प्रणाली से जुड़ी अनुकूलता की समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। ऐसे में वाहन मालिक के सामने पेट्रोल की कीमत, माइलेज और रखरखाव—तीनों का सवाल खड़ा होता है।
जनता का सवाल यह भी है कि जब ईंधन के दाम जेब पर भारी हैं और माइलेज को लेकर शिकायतें बढ़ रही हैं, तब एथेनॉल नीति का पूरा आर्थिक लाभ आखिर उपभोक्ता तक कितना पहुंच रहा है?
अनाज से एथेनॉल पर भी उठ रहे सवाल
एथेनॉल उत्पादन में गन्ने के साथ मक्का और अन्य अनाज के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने से खाद्य सुरक्षा को लेकर भी बहस तेज हुई है। मक्का और चावल जैसे कृषि उत्पादों का एक हिस्सा ईंधन उत्पादन में जाने पर पशु एवं पोल्ट्री फीड की लागत पर असर पड़ सकता है। इसका असर दूध, अंडे, चिकन और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है।
यानी सवाल केवल चीनी का नहीं है। गन्ना चीनी से एथेनॉल की ओर जाता है, अनाज का एक हिस्सा ईंधन की ओर जाता है और दूसरी तरफ आम उपभोक्ता को महंगी खाद्य सामग्री तथा महंगे ईंधन का सामना करना पड़ता है।
किसान भी पूछ रहा है अपना हिसाब
एथेनॉल नीति को किसानों के लिए लाभकारी बताया जाता है, क्योंकि इससे गन्ने की मांग और मिलों की आय के नए रास्ते खुलते हैं। ऐसे में सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इसका लाभ समय पर गन्ना किसानों तक पहुंचे और उनका भुगतान लंबित न रहे।
सरकार यदि चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए जीएसटी रिटर्न तक निगरानी कर सकती है तो गन्ने की खरीद, चीनी उत्पादन, एथेनॉल उत्पादन, मिलों की बिक्री और किसानों के भुगतान का पूरा डेटा भी सार्वजनिक क्यों न किया जाए?
जनता के लिए असली सवाल
सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि चीनी की कीमतों पर दबाव का कारण केवल जमाखोरी है या उत्पादन का एक हिस्सा एथेनॉल में जाने का भी प्रभाव है। यदि दोनों का असर है तो केवल बड़े उपभोक्ताओं पर स्टॉक सीमा लगाकर समस्या का समाधान कैसे होगा?
जनता को छापेमारी से ज्यादा पारदर्शी व्यवस्था और सही कीमत चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि चीनी की उपलब्धता कितनी है, एथेनॉल के लिए कितना गन्ना जा रहा है, चीनी की उत्पादन लागत क्या है और उपभोक्ता तक चीनी किस कीमत पर पहुंच रही है।
जमाखोरी रोकना जरूरी है, मगर जमाखोरी के नाम पर मूल समस्या से ध्यान हटाना उससे भी बड़ा सवाल है। यदि एक ओर गन्ने को एथेनॉल में भेजकर चीनी की उपलब्धता पर दबाव बनाया जाए और दूसरी ओर स्टॉक सीमा को जमाखोरी रोकने का प्रमुख हथियार बताया जाए, तो आम जनता इसे समाधान से ज्यादा ढकोसला ही मानेगी।
सरकार को छापे और स्टॉक लिमिट से आगे बढ़कर चीनी, एथेनॉल, पेट्रोल, अनाज और किसान—इन सभी कड़ियों का पूरा हिसाब जनता के सामने रखना होगा। तभी यह व्यवस्था वास्तविक नियंत्रण मानी जाएगी, वरना जीएसटी के आंकड़ों में जमाखोरी खोजने की कवायद जनता की थाली और जेब की समस्या का समाधान कैसे करेगी, यह बड़ा सवाल बना रहेगा।
