2010 के प्रमुख विभाजन का संबंध रामनगर अधिवेशन, त्रिवेंद्र सिंह पंवार के अध्यक्ष बनने और भाजपा सरकार से समर्थन वापसी के विवाद से मिलता है। वहीं उस दौर में दिवाकर भट्ट सरकार में बने रहे और इसी मुद्दे पर दल के भीतर गहरा मतभेद हुआ।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड क्रांति दल कभी उस राजनीतिक चेतना का नाम था जिसने अलग राज्य की मांग को पहाड़ की आवाज से जोड़कर सत्ता के सामने चुनौती खड़ी की थी। आज वही उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर अपने भीतर के विवादों के कारण चर्चा में है।
वरिष्ठ नेता आशुतोष नेगी को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद सवाल केवल एक नेता की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। सवाल यह है कि आखिर उक्रांद में बार-बार ऐसे हालात क्यों बनते हैं, जहां संगठन के भीतर प्रभावशाली नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व के बीच टकराव सार्वजनिक विवाद का रूप ले लेता है?
27 अगस्त 2026 के अनुशासनात्मक आदेश के आधार पर आशुतोष नेगी की प्राथमिक सदस्यता समाप्त करते हुए उन्हें छह वर्ष के लिए निष्कासित किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पार्टी ने उन पर वरिष्ठ नेतृत्व के संबंध में कथित भ्रामक और तथ्यहीन बयान देने तथा दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए हैं। इससे पहले उन्हें केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से भी हटाया गया था।
लेकिन यहीं से असली राजनीतिक प्रश्न शुरू होता है।
क्या इतिहास फिर अपने आपको दोहरा रहा है?
उक्रांद के इतिहास में सबसे बड़ा उदाहरण दिवाकर भट्ट का है। दिवाकर भट्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे और उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में वह उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उन्हें उत्तराखंड राज्य आंदोलन तथा क्षेत्रीय मुद्दों के प्रमुख नेताओं में शामिल बताया गया है।
वर्ष 2010 के आसपास भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेने के सवाल पर उक्रांद के भीतर गंभीर मतभेद पैदा हुए। त्रिवेंद्र सिंह पंवार गुट ने समर्थन वापसी का फैसला किया, जबकि मंत्री दिवाकर भट्ट सरकार में बने रहे। यही विवाद आगे चलकर दल के दो धड़ों में बंटने की बड़ी वजह बना।
उस दौर की राजनीति का असर इतना गहरा था कि बाद में उक्रांद अलग-अलग गुटों में बंटा और चुनावी राजनीति में उसका आधार कमजोर होता चला गया। इंडिया टुडे के पुराने विश्लेषण में भी इस विभाजन और चुनाव चिह्न फ्रीज होने को दल के राजनीतिक पतन से जोड़ा गया था।
2013 तक स्थिति यह हो गई थी कि उक्रांद दो प्रमुख धड़ों—दिवाकर भट्ट गुट और त्रिवेंद्र सिंह पंवार गुट—में बंट चुका था। चुनाव आयोग तक विवाद पहुंचा और पार्टी का चुनाव चिह्न भी फ्रीज हुआ।
यही वह इतिहास है जिससे वर्तमान नेतृत्व को सबसे बड़ा सबक लेना चाहिए।
आशुतोष नेगी को क्या राजनीतिक ‘बलि का बकरा’ बनाया गया?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि आशुतोष नेगी को किसी राजनीतिक साजिश के तहत बलि का बकरा बनाया गया। इसके लिए ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने आना जरूरी है।
लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि जिस समय उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी का दौर शुरू हो चुका है, उसी समय एक ऐसे नेता को छह वर्ष के लिए बाहर करने का निर्णय क्यों लिया गया, जिसकी गढ़वाल क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पहचान और सक्रियता रही है?
यही प्रश्न उक्रांद के भविष्य से जुड़ जाता है।
आशुतोष नेगी की लोकप्रियता पार्टी नेतृत्व के लिए अवसर भी हो सकती थी और चुनौती भी। यदि किसी नेता की जनस्वीकार्यता बढ़ रही हो तो संगठन की स्वाभाविक रणनीति उसे साथ लेकर आगे बढ़ने की होनी चाहिए। मतभेद हों तो संवाद, अनुशासनात्मक प्रक्रिया और संगठनात्मक समाधान के रास्ते खुले रखने चाहिए।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उक्रांद के भीतर संवाद की जगह अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रमुख राजनीतिक औजार बनती जा रही है?
सुरेंद्र कुकरेती के वायरल वीडियो ने बढ़ाई चर्चा
केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती से जुड़े वायरल वीडियो को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि और पूरा संदर्भ सामने आए बिना उसके आधार पर किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा। मगर वीडियो को लेकर उठ रहे सवाल यह जरूर बताते हैं कि पार्टी के भीतर संवाद और सार्वजनिक संदेश को लेकर असहजता मौजूद है।
केंद्रीय नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह इस विवाद को व्यक्तिगत टकराव के रूप में देखता है या संगठनात्मक संकट के रूप में।
क्योंकि व्यक्ति बदल सकते हैं, पदाधिकारी बदल सकते हैं, चुनाव आते-जाते हैं, लेकिन क्षेत्रीय दल की सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा होती है।
उक्रांद की सबसे बड़ी समस्या विरोधी दल नहीं, आंतरिक अविश्वास?
यह प्रश्न कठोर जरूर है, मगर आज पूछा जाना चाहिए।
उक्रांद को राष्ट्रीय दलों से मुकाबला करना है। उसके पास उत्तराखंडियत, मूल निवास, भू-कानून, पहाड़ के पलायन, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे हैं। फिर भी यदि पार्टी अपने ही प्रभावशाली नेताओं को साथ रखने में संघर्ष करती दिखाई देगी तो जनता के सामने उसका राजनीतिक संदेश कमजोर होगा।
उक्रांद का इतिहास बताता है कि जब-जब संगठनात्मक विवाद व्यक्तिगत संघर्ष में बदला, नुकसान अंततः पार्टी को ही हुआ।
काशी सिंह ऐरी ने एक पुराने साक्षात्कार में स्वयं स्वीकार किया था कि दल को हाशिये पर पहुंचाने की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेतृत्व की विफलताओं से जुड़ी है और उन्होंने दिवाकर भट्ट के दौर के विभाजनों को भी इसका एक कारण बताया था।
यह स्वीकारोक्ति आज के नेतृत्व के लिए आईना हो सकती है।
2027 से पहले सबसे बड़ा खतरा
2027 का विधानसभा चुनाव उक्रांद के लिए केवल एक चुनाव नहीं है। यह उसके अस्तित्व और भविष्य की परीक्षा भी है।
यदि पार्टी के भीतर प्रमुख चेहरे अलग होते गए, यदि कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि लोकप्रियता के साथ संगठनात्मक संघर्ष जुड़ा है, यदि पुराने विवादों का समाधान संवाद से ज्यादा निष्कासन के जरिए होता दिखाई दिया, तो नुकसान केवल आशुतोष नेगी का नहीं होगा।
नुकसान उक्रांद की विश्वसनीयता का होगा।
मान लीजिए कल आशुतोष नेगी वापस आ जाते हैं, कोई समझौता हो जाता है, किसी दूसरे क्षेत्रीय दल के साथ विलय या राजनीतिक तालमेल हो जाता है—तब भी आज पैदा हुआ अविश्वास एक दिन में समाप्त नहीं होगा। जनता के मन में यह सवाल रह सकता है कि आखिर उक्रांद की दिशा कौन तय करता है?
आखिर उक्रांद को चला कौन रहा है?
यही आज का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।
क्या उक्रांद सामूहिक नेतृत्व से चलेगा?
क्या केंद्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय कार्यकारिणी संगठन के भीतर असहमति को राजनीतिक संपत्ति मानेंगे?
क्या लोकप्रिय नेताओं को साथ लेकर उनकी ऊर्जा का इस्तेमाल चुनावी विस्तार में किया जाएगा?
या फिर नेतृत्व के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को अनुशासन का प्रश्न बनाकर संगठन से दूर किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब उक्रांद को खुद देने होंगे।
उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना जिन लोगों ने की, उन्होंने सत्ता हासिल करने से पहले समाज में राजनीतिक चेतना पैदा की थी। पार्टी की मूल शक्ति कुर्सी, पद या चुनाव चिह्न से ज्यादा उत्तराखंड की जनता के साथ उसका भावनात्मक रिश्ता था। आज उसी रिश्ते को फिर मजबूत करने की जरूरत है।
आशुतोष नेगी प्रकरण को केवल एक नेता के निष्कासन के रूप में देखना शायद आसान है। इसे उक्रांद के लंबे राजनीतिक इतिहास की चेतावनी के रूप में देखना ज्यादा जरूरी है।
2027 से पहले उक्रांद के सामने दो रास्ते हैं—पुराने अंतर्विरोधों को दोहराकर अपनी राजनीतिक जमीन और कमजोर करना या फिर संवाद, सामूहिक नेतृत्व और उत्तराखंड के मूल मुद्दों को केंद्र में रखकर जनता का भरोसा दोबारा हासिल करना।
इतिहास गवाह है कि उक्रांद को सबसे बड़ा नुकसान उसके राजनीतिक विरोधियों ने कम, उसके भीतर पैदा हुए विभाजनों ने ज्यादा पहुंचाया है।
अब सवाल आशुतोष नेगी के रहने या जाने का नहीं है। सवाल यह है कि उक्रांद अपने भीतर कितने लोगों को साथ रखकर 2027 की लड़ाई लड़ पाएगा।
