सरकार छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है, मानो वे देश का भविष्य नहीं बल्कि राष्ट्र के दुश्मन हों।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
‘द हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख ‘An Education System’s Collapse, Young India’s Trauma’ में सोनिया गांधी ने कहा कि छात्रों के साथ खड़ा होना और उनके भविष्य की रक्षा करना नैतिक, राजनीतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था छात्रों में केवल निराशा पैदा कर रही है और सरकार की अहंकारी तथा जवाबदेही से बचने वाली कार्यशैली ने छात्र आंदोलनों को जन्म दिया है।
छात्रों पर पुलिस कार्रवाई की आलोचना
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि छात्र प्रदर्शनकारियों पर की गई पुलिस की कार्रवाई इस सरकार के लिए कोई नई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के दौरान भी विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने इसी तरह कार्रवाई की थी। इसके अलावा महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का भी उन्होंने उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि हाल के हफ्तों में देशभर में परीक्षा पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में गिरावट के खिलाफ छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन लगातार बढ़े हैं। उनकी मांग केवल इतनी थी कि केंद्र सरकार जवाबदेही तय करे और शिक्षा सुधार लागू करे।
20 जुलाई की कार्रवाई को बताया ‘काला दिन’
सोनिया गांधी ने 20 जुलाई 2026 को “कलंक का दिन” बताते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) ने छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लाठीचार्ज और आंसू गैस के जरिए दबाने की कोशिश की।
उन्होंने दावा किया कि कई शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी घायल हुए और घर लौट रहे छात्रों को भी पुलिस ने नहीं छोड़ा। उनके मुताबिक देश ने ऐसे दृश्य देखे, जिनमें युवाओं के शरीर पैलेट लगने से घायल दिखाई दिए।
सोनिया गांधी ने कहा कि उस दिन के वीडियो पूरे देश की सामूहिक चेतना को झकझोरने वाले हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और उसके समर्थक मीडिया इस स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन को लेकर अलग-अलग कहानियां गढ़ रहे हैं, जबकि सच यह है कि ये देश के बेटे-बेटियां हैं।
‘सरकार संवाद नहीं, दमन का रास्ता चुनती है’
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार हर बार बातचीत की बजाय दमन का रास्ता चुनती है। किसानों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, सरकार विरोध की हर आवाज को दबाने की कोशिश करती रही है।
उन्होंने कहा कि इस बार सरकार ने भविष्य के डॉक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षकों, सिविल सेवकों, उद्यमियों और राष्ट्रनिर्माताओं पर ही राज्य की ताकत का इस्तेमाल किया, जिसे न भुलाया जा सकता है और न माफ किया जा सकता है।
सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि सरकार विरोध की हर आवाज को देशविरोधी बताने की पुरानी रणनीति अब छात्र आंदोलनों पर भी लागू कर रही है, जबकि उसे अपनी नीतियों पर आत्ममंथन करना चाहिए।
शिक्षा पर खर्च घटाने का आरोप
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार सार्वजनिक शिक्षा से लगातार पीछे हट रही है। उनके अनुसार, सरकार ने कुल बजट में स्कूल शिक्षा पर खर्च का हिस्सा 50 प्रतिशत और उच्च शिक्षा पर 33 प्रतिशत तक घटा दिया है।
उन्होंने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में करीब एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए, जबकि 43 हजार निजी स्कूल खोले गए, जिनमें बड़ी संख्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संस्थानों द्वारा संचालित है।
उनका कहना था कि अच्छी और सस्ती सरकारी शिक्षा उपलब्ध न होने के कारण परिवारों को बच्चों की पढ़ाई पर अपनी जेब से भारी खर्च करना पड़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि केवल NEET कोचिंग पर परिवारों का खर्च लगभग उतना ही है, जितना केंद्र सरकार सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च करती है।
NTA और परीक्षा प्रणाली पर उठाए सवाल
सोनिया गांधी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली का कमजोर होना है। उन्होंने आरोप लगाया कि परीक्षाओं का केंद्रीकरण, निजीकरण और राजनीतिकरण किया गया है।
उन्होंने कहा कि पहले विश्वविद्यालय और राज्य अपनी जरूरतों के अनुसार परीक्षाएं आयोजित करते थे, लेकिन अब कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) जैसी परीक्षाएं राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के माध्यम से कराई जा रही हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि NTA कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है और परीक्षा कराने के लिए निजी एजेंसियों पर निर्भर है। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि NTA से जुड़े कई पेपर सेटर, अनुवादक और विशेषज्ञ देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद नहीं बल्कि राजनीतिक संबंध रखने वाले लोग हैं।
सोनिया गांधी ने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में देशभर में 152 पेपर लीक हुए, जिनमें 2017 में गठन के बाद NTA से जुड़ी नौ परीक्षाएं भी शामिल हैं।
शिक्षा के बाद रोजगार भी बड़ी चुनौती
सोनिया गांधी ने कहा कि शिक्षा पूरी करने के बाद अच्छी और सम्मानजनक नौकरियां मिलना भी आज बड़ी चुनौती बन गया है। इसके पीछे उन्होंने अर्थव्यवस्था में बढ़ते एकाधिकार और रोजगार के सीमित अवसरों को कारण बताया।
उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति की उन सिफारिशों को भी खारिज कर दिया, जिनमें NTA को मजबूत बनाने की बात कही गई थी। उनके मुताबिक इतनी बड़ी विफलताओं के बावजूद शिक्षा मंत्री का पद पर बने रहना जनता के गुस्से को और बढ़ा रहा है।
