अंबेडकरवादी नंदलाल का छलका दर्द, सड़क पर आया परिवारभारतीय जनता पार्टी रुद्रपुर द्वारा रामलीला मैदान, भूतबंगला में आयोजित सामाजिक सौहार्द संकल्प धरना कार्यक्रम।

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रुद्रपुर। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा रुद्रपुर के भूतबंगला स्थित रामलीला मैदान में ‘सामाजिक सौहार्द संकल्प धरना’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। एक तरफ जहां मंच से बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के आदर्शों की दुहाई देते हुए आपसी भाईचारे और सौहार्द का संकल्प लिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर चल रही बुलडोजर कार्रवाई ने इस पूरे आयोजन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

अंबेडकरवादी नंदलाल का छलका दर्द, सड़क पर आया परिवार
इस धरने के बीच सबसे बड़ा अंतर्विरोध तब सामने आया जब खुद को पक्का अंबेडकरवादी और बाबासाहेब का अनुयायी मानने वाले स्थानीय निवासी नंदलाल की कहानी उजागर हुई। पीड़ितों का आरोप है कि एक तरफ बीजेपी अंबेडकर की तस्वीर लगाकर दलित समाज के साथ खड़े होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ के तहत नंदलाल के व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर बुलडोजर चला दिया गया। इस कार्रवाई के बाद नंदलाल का पूरा परिवार सड़क पर आ गया है और उनके सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया है।

निशाने पर कई बस्तियां, 2027 के बाद भी कार्रवाई जारी रहने का दावा
स्थानीय लोगों और आलोचकों का कहना है कि सरकार की यह बुलडोजर नीति चुनिंदा और भेदभावपूर्ण है। इस समय रुद्रपुर के बधाईपुरा, भूतबंगला, ट्रांजिट कैंप, आदर्श कॉलोनी और शिव नगर जैसे इलाके कथित तौर पर प्रशासन और बीजेपी के बुलडोजर के निशाने पर हैं। धरने के दौरान और स्थानीय सियासी गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यह बुलडोजर कार्रवाई आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के बाद भी इसी तरह जारी रहेगी।

आयोजन स्थल पर ही मंडराया खतरा
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी बात यह उठ रही है कि जिस रामलीला मैदान (भूतबंगला) में बीजेपी सामाजिक सौहार्द का संदेश देने के लिए धरना दे रही है, खुद उस जगह के मालिकाना हक और निर्माण को लेकर भी सवाल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस रफ्तार से बस्तियों को ढहाया जा रहा है, कहीं आने वाले दिनों में खुद इस कार्यक्रम स्थल पर ही प्रशासन का बुलडोजर न चल जाए।

सौहार्द या सियासी स्वार्थ?
दलित बस्तियों और प्रतिष्ठानों पर चल रहे बुलडोजर के बीच बाबासाहेब की तस्वीर लगाकर सामाजिक सौहार्द की बात करने को विपक्ष और पीड़ित परिवार ‘आपसी स्वार्थ’ और वोट बैंक की राजनीति करार दे रहे हैं। बेघर हुए परिवारों का सीधा सवाल है कि अगर सरकार वास्तव में अंबेडकरवादी सोच का सम्मान करती है, तो दलितों और पिछड़ों के आशियानों को उजाड़ने वाली इस कार्रवाई पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जाती?



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