आज का दौर सूचना क्रांति का है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने दुनिया को हमारी हथेली पर ला दिया है। जहां एक ओर सही जानकारी कुछ ही सेकंड में करोड़ों लोगों तक पहुंचती है, वहीं झूठ, अफवाह और अंधविश्वास भी उसी गति से फैल रहे हैं। सबसे अधिक चिंता तब होती है जब स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषय को भी मनोरंजन और कमाई का साधन बना दिया जाता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इन दिनों सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार है, जिनमें कोई व्यक्ति कुर्सी पर बैठे-बैठे हाथ घुमाकर लोगों की बीमारी ठीक करने का दावा करता है। कहीं किसी युवक पर देवी शक्ति आने की बात कही जाती है, तो कहीं झाड़-फूंक के जरिए लकवा, कैंसर, किडनी, लीवर, पीलिया और अन्य गंभीर रोगों को मिनटों में ठीक करने की बातें होती हैं। इन वीडियो में भावनात्मक संगीत, भीड़ की जय-जयकार और “मैं ठीक हो गया” जैसे संवाद दर्शकों को प्रभावित करते हैं। लेकिन इन दावों के पीछे वैज्ञानिक प्रमाण लगभग कभी दिखाई नहीं देते।
इसी प्रकार सोशल मीडिया पर स्वयंभू वैद्य और तथाकथित प्राकृतिक चिकित्सकों की एक नई फौज खड़ी हो गई है। कोई कहता है कि प्याज का रस पीलिया मिटा देगा, कोई दावा करता है कि दस-पंद्रह प्रकार की पत्तियों का रस पीने से खून बढ़ जाएगा, कैंसर खत्म हो जाएगा, किडनी साफ हो जाएगी और लीवर नया हो जाएगा। बीस रुपये का एक गिलास बेचकर उसे अमृत बताया जाता है और लोग लंबी कतारों में खड़े होकर उसे पीते दिखाई देते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या किसी भी पौधे का रस बिना जांच, बिना मात्रा और बिना चिकित्सकीय सलाह के पी लेना सुरक्षित है? उत्तर है—हर बार नहीं। अनेक पौधों में लाभकारी तत्व होते हैं, लेकिन कुछ में प्राकृतिक विषैले रसायन भी हो सकते हैं। कई पौधों पर कीटनाशकों के अवशेष, बैक्टीरिया, फफूंद या अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। कुछ जड़ी-बूटियां लीवर और किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं या चल रही दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकती हैं। इसलिए “प्राकृतिक” शब्द अपने आप में “पूर्णतः सुरक्षित” होने की गारंटी नहीं है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन दावों पर विश्वास करने वालों में केवल कम पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित लोग भी शामिल हैं। कैमरे के सामने कोई व्यक्ति कहता है कि उसने बड़ी परीक्षा पास की है, वह विज्ञान पढ़ चुका है और फिर भी इस चमत्कारी उपचार से ठीक हो गया। दर्शक सोचता है कि जब पढ़ा-लिखा व्यक्ति विश्वास कर रहा है तो दावा सही ही होगा। यही मनोविज्ञान ऐसे वीडियो को वायरल बनाता है।
कई मामलों में यह भी आशंका व्यक्त की जाती है कि प्रचार के लिए पहले से तैयार किए गए लोगों को रोगी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और फिर कैमरे के सामने उन्हें “ठीक” दिखाया जाता है। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल धोखाधड़ी नहीं बल्कि समाज के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी है। किसी भी उपचार को प्रभावी सिद्ध करने के लिए मेडिकल जांच, वैज्ञानिक परीक्षण और स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होते हैं, न कि केवल वायरल वीडियो।
यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां, आयुर्वेद और अनेक औषधीय वनस्पतियां हमारे ज्ञान की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इन पर वैज्ञानिक शोध भी हुए हैं और कई औषधियां चिकित्सा में उपयोगी सिद्ध हुई हैं। समस्या वहां पैदा होती है जहां बिना प्रमाण हर बीमारी का इलाज बताकर लोगों को भ्रमित किया जाता है। परंपरा और अंधविश्वास में अंतर समझना समाज की जिम्मेदारी है।
देश में कैंसर, किडनी और लीवर संबंधी रोगों के बढ़ने के अनेक कारण हैं—मधुमेह, उच्च रक्तचाप, प्रदूषण, असंतुलित भोजन, संक्रमण, शराब, तंबाकू, आनुवंशिक कारण और कुछ मामलों में बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं या अप्रमाणित हर्बल उत्पादों का सेवन। इसलिए किसी एक पत्ती या एक रस को चमत्कारी इलाज बताना लोगों को गुमराह करना है।
सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को मंच दिया है, लेकिन मंच मिलने भर से कोई विशेषज्ञ नहीं बन जाता। स्वास्थ्य संबंधी सलाह देने का अधिकार उसी को होना चाहिए जिसके पास ज्ञान, प्रशिक्षण और प्रमाण हों। वायरल वीडियो चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं हो सकते।
आज आवश्यकता लोगों को डराने की नहीं, बल्कि जागरूक करने की है। किसी भी गंभीर बीमारी का इलाज इंटरनेट, रील या चमत्कार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। बीमारी होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें। यदि कोई हर्बल या पारंपरिक उपचार अपनाना चाहते हैं, तो भी विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
एक विकसित समाज वही है जो आस्था का सम्मान करता है, लेकिन स्वास्थ्य के प्रश्न पर प्रमाण को प्राथमिकता देता है। अंधविश्वास का सबसे बड़ा दुश्मन शिक्षा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच है। डिग्री लेने से व्यक्ति शिक्षित हो सकता है, लेकिन प्रमाण मांगने की आदत ही उसे वास्तव में जागरूक नागरिक बनाती है।
समय आ गया है कि हम वायरल वीडियो नहीं, सत्यापित तथ्यों पर विश्वास करें। चमत्कारों की भीड़ में विवेक की आवाज सबसे अधिक आवश्यक है। क्योंकि जीवन अनमोल है और उसका निर्णय किसी वायरल दावे के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
